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T-22/33 तख़्त पर बारे-दिगर जाना है-प्रकाश सिंह अर्श

तख़्त पर बारे-दिगर जाना है
और फिर जा के ठहर जाना है

ख़ुद से होने लगी है नफ़रत सी
ख़ुद को अब छोड़ के घर जाना है

उसकी बातें वही जाने-समझे
हमने जो कह दिया कर जाना है

तुझसे लेनी है मुझे बेदारी
तुझको बेदार भी कर जाना है

इससे पहले कि निचोड़ूँ ख़ुश्बू
मुझसे ख़ुश्बू का असर जाना है

रूह तक जिस्म की इस चौखट से
कुफ़्र तो है ही मगर जाना है

उसके घर जा के पुकारूँ उसको
‘आज हर हद से गुज़र जाना है’

आँख से टपके हुए आंसू में
सिर्फ अहसास का मर जाना है

मुख़्तसर हूँ मैं तमाशे वालों,
क्या मुझे तुमने सफ़र जाना है

प्रकाश सिंह अर्श 09718481234

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20 comments on “T-22/33 तख़्त पर बारे-दिगर जाना है-प्रकाश सिंह अर्श

  1. ख़ुद से होने लगी है नफ़रत सी
    ख़ुद को अब छोड़ के घर जाना है

    Prakash tum lajawab ho …Jiyo

  2. badhiya gazal huii hai bhaii
    kai sher purasar

    waahh

    dili daad

    Alok

  3. आँख से टपके हुए आंसू में
    सिर्फ अहसास का मर जाना है

    रूह तक जिस्म की इस चौखट से
    कुफ़्र तो है ही मगर जाना है

    Prakash bhai waah…kua sher hue hain…puri gazal umda hui hai..bahut bahut badhai..

  4. ख़ुद से होने लगी है नफ़रत सी
    ख़ुद को अब छोड़ के घर जाना है

    वाह सर बहुत खूब ग़ज़ल कही है

  5. Arsh bhai umda ghazal hui hai aapki lekin in do ash’aar par alag se daad..

    आँख से टपके हुए आंसू में
    सिर्फ अहसास का मर जाना है

    रूह तक जिस्म की इस चौखट से
    कुफ़्र तो है ही मगर जाना है

    kya kehne.. waaaah!!

  6. अहसास के ‘अर्श’ पर प्रकाशित इस ग़ज़ल के लिए मुबारकबाद स्‍वीकार करें।
    सादर
    नवनीत

  7. तख़्त पर बारे-दिगर जाना है
    और फिर जा के ठहर जाना है
    बिल्कुल !! इस बार 5 साल केजरीवाल !!!
    ख़ुद से होने लगी है नफ़रत सी
    ख़ुद को अब छोड़ के घर जाना है
    प्रभावशाली शेर है !!! सानी की गढन और गिरह ने एक अलग रंगत बख़्श दे है शेर को !!! लगा चुनरी मे दाग़ जैसी बात है शेर में !!!
    उसकी बातें वही जाने-समझे
    हमने जो कह दिया कर जाना है
    हाँ साहब !! योगेश्वर जानें कि उनकी शस्त्र न उठाने की प्रतिज्ञा का सच क्या है लेकिन हम सियासी नहीं हम तो भीष्म हैं –जो कह दिया कर जाना है !!!
    रूह तक जिस्म की इस चौखट से
    कुफ़्र तो है ही मगर जाना है
    कगज केरा नावदी पानी केरा गंग // कह कबीर कैसे तजूँ पंच कुसंगी संग !!!
    आँख से टपके हुए आंसू में
    सिर्फ अहसास का मर जाना है
    हसिले ग़ज़ल ख्याल इसी शेर में है लेकिन “सिर्फ” लफ़्ज़ असर के दायरे को कम कर रहा है क्योंकि अहसास का मर जाना सब कुछ ख़त्म होना है !!!
    प्रकाश सिंह अर्श साहब !! बहुत खूबसूरत शेर कहे आपने –मयंक

  8. शुक्रिया पूजा जी … इस तरह से हौसलाफ्ज़ाई के लिए ….

  9. Arsh Bhai… Ghazal behad pasand aayi ….

    Aur ye Sher :

    आँख से टपके हुए आंसू में
    सिर्फ अहसास का मर जाना है

    Bahut Mubarqbaad 🙂

  10. रूह तक जिस्म की इस चौखट से
    कुफ़्र तो है ही मगर जाना है

    उसके घर जा के पुकारूँ उसको
    ‘आज हर हद से गुज़र जाना है’

    Kya khoob . Waahh

  11. आँख से टपके हुए आंसू में
    सिर्फ़ अहसास का मर जाना है……
    बहुत बढ़िया कहन है प्रकाश जी
    दाद क़ुबूल करें
    सादर
    पूजा

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