22 टिप्पणियाँ

T-22/21 जिसको ताहद्दे-नज़र जाना है-डॉ मुहम्मद ‘आज़म’

जिसको ताहद्दे-नज़र जाना है
वो भी मंज़र है गुज़र जाना है

दिल में या दिल से उतर जाना है
‘आज हर हद से गुज़र’

शाम फिर आ गयी घर जाना है
जी नहीं करता मगर जाना है

रूह सहारा की तरफ़ जा निकली
अब लिए जिस्म ही घर जाना है

अव्वल-अव्वल जो लगे हैं मरबूत
आख़िर-आख़िर में बिखर जाना है

हर कोई राह नयी बतलाये
हूँ तज़बज़ुब में किधर जाना है

इक न इक रोज़ तिरा शीशा-ए-दिल
टूट जाना है बिखर जाना है

चश्मे-आशिक़ ने सुनो ऐ जानां
हुस्न को हुस्ने-नज़र जाना है

सबने मंज़िल को बनाया मक़सद
मैंने मंज़िल को सफ़र जाना है

आतिशे-इश्क़ में जलते-जलते
मुझको कुंदन सा निखर जाना है

इश्क़ की राहगुज़र में ‘आज़म’
मरने वालों को अमर जाना है

डॉ मुहम्मद ‘आज़म’ 09827531331

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22 comments on “T-22/21 जिसको ताहद्दे-नज़र जाना है-डॉ मुहम्मद ‘आज़म’

  1. शाम फिर आ गयी घर जाना है
    जी नहीं करता मगर जाना है

    Behtariin Ghazal kahi hai Bhai..Daad kaboolen

  2. Shaandar gazal….shaandar matla….

    रूह सहरा की तरफ़ जा निकली
    अब लिए जिस्म ही घर जाना है

    Waah…qaah…kya sher hua hai…dil se badhai….sahab

  3. सबने मंज़िल को बनाया मक़सद
    मैंने मंज़िल को सफ़र जाना है………………….वाह आज़म सर क्या ख़ूब ग़ज़ल कही है आपने दिली दाद

  4. Mohtaram Dr. Azam sb behetreen matla, kamyab tazmeen aur shandar ghazal ke liye dili mubarakbaad!! kehne waaaaah!!

  5. जिसको ताहद्दे-नज़र जाना है
    वो भी मंज़र है गुज़र जाना है
    नज़र अपनी रोशनी तक ही जा सकती है इसलिये ताह्द्दे नज़र जिस किसी भी शै को जाना है वो वक़्त के सफर मे छूट ही जाने वाला मरहला होगा !! वाह !!
    दिल में या दिल से उतर जाना है
    ‘आज हर हद से गुज़र जाना है”
    दिल इसी ज़िद पे अडा है किसी बच्चे की तरह
    या इसे चाहिये सब कुछ ही या कि कुछ भी नहीं –राजेश रेड्डी
    शाम फिर आ गयी घर जाना है
    जी नहीं करता मगर जाना है
    शादी ग़ज़ीदा लगते हैं आप भी मेरी तरह आज़म साहब !!!
    रूह सहारा की तरफ़ जा निकली
    अब लिए जिस्म ही घर जाना है
    वाह वाह !!! ख़ैर जितने रौनक शाइरी को क़ैस ने बख़्शी है उतनी किसी और ने नहीं !!! रूह सहरा की तरफ जा निकली ….
    हर कोई राह नयी बतलाये
    हूँ तज़बज़ुब में किधर जाना है
    चलता हूँ थोडी दूर हरिक तेज़ रौ के साथ
    पहचानता नहीं हूँ अभी राहबर को मैं –ग़ालिब
    इतनी राहें मुझे बुलाती हैं
    जुस्तजू राह भूल जाती है
    इक न इक रोज़ तिरा शीशा-ए-दिल
    टूट जाना है बिखर जाना है
    सच तो है –मालूम भी है –लेकिन काश जिसके हाथों से गिर कर टूटना चाहिये –उसी के हाथों से गिर कर टूटे – अगर ऐसा हो जाय तो किस्मत की बात है !!!
    चश्मे-आशिक़ ने सुनो ऐ जानां
    हुस्न को हुस्ने-नज़र जाना है
    बिल्कुल !!! ये अक़ीदत है जो पत्थर को भगवान बना सकती है !!!!
    परस्तिश कि याँ तक कि ऐ बुत तुझे
    नज़र मे सभू की खुदा कर चले !! –मीर
    सबने मंज़िल को बनाया मक़सद
    मैंने मंज़िल को सफ़र जाना है
    मयंक आवारगी की लाज रखना
    तुम्हारी ताक मे मंज़िल खडी है !!!
    आतिशे-इश्क़ में जलते-जलते
    मुझको कुंदन सा निखर जाना है
    वाह वाह !!! मुझे भी ये ख्याल बहुत अपील करता है आज़म साहब !!!
    इश्क़ की राहगुज़र में ‘आज़म’
    मरने वालों को अमर जाना है
    देख कि हर मज़ार वहाँ संगे मील था
    राहे वफा मे मौत कोई हादसा न थी-मयंक
    डॉ मुहम्मद ‘आज़म’ साहब !!! उस्ताद की गज़ल फिर उस्ताद की ग़ज़ल होती है !!! और क्या कहूँ !! मुबारकबाद कुबूल कीजिये –मयंक

  6. दिली मुबारकबाद। वाह.;वाह..। सारे शे’र बहुत अच्‍छे।
    मज़ा आ गया जनाब।
    सादर
    नवनीत

  7. आदरणीय आज़म साहब ,एक मुक़म्मल ग़ज़ल के लिए ढेरों ढेरों दाद कबूल फरमावें |सादर
    अव्वल-अव्वल जो लगे हैं मरबूत
    आख़िर-आख़िर में बिखर जाना है

    हर कोई राह नयी बतलाये
    हूँ तज़बज़ुब में किधर जाना है

    इक न इक रोज़ तिरा शीशा-ए-दिल
    टूट जाना है बिखर जाना है

    चश्मे-आशिक़ ने सुनो ऐ जानां
    हुस्न को हुस्ने-नज़र जाना है

    सबने मंज़िल को बनाया मक़सद
    मैंने मंज़िल को सफ़र जाना है
    वैसे सभी अशआर लासानी है ,,लेकिन इनकी तो बात ही निराली है <<<क्या ख़ूब वा…..ह

  8. उम्दा ग़ज़ल के लिए दाद क़ुबूल फरमाएं आज़म साहब..
    -कान्हा

  9. kya hi achhii gazal huii hai Muhammad aazam sahab

    wahhh waahh waahh

    regards

  10. Bahut achi gazal hui sir
    DIli daad kubul kijiye

  11. जिसको ताहद्दे-नज़र जाना है
    वो भी मंज़र है गुज़र जाना है.

    क्या ख़ूबसूरत मतला है आज़म भाई.

    Bahut achchi ghazal.
    Mubaarak.

  12. जिसको ताहद्दे-नज़र जाना है
    वो भी मंज़र है गुज़र जाना है

    रूह सहरा की तरफ़ जा निकली
    अब लिए जिस्म ही घर जाना है

    चश्मे-आशिक़ ने सुनो ऐ जानां
    हुस्न को हुस्ने-नज़र जाना है

    Kya achhi gazal kahi hai Azam sahab… Waah… Dili Mubaraqbaad

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