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T-22/20 दश्ते-माज़ी में उतर जाना है-मुमताज़ नाज़ां

दश्ते-माज़ी में उतर जाना है
आख़िरश लौट के घर जाना है

हाँ, ज़रा देर अज़ीयत देगा
ये भी इक ज़ख़्म है, भर जाना है

जुर्मे-उलफ़त में था वो भी शामिल
लेकिन उसको तो मुकर जाना है

तुझ को कब तक मैं मनाऊँ आख़िर
जा चला भी जा, अगर जाना है

ज़ीस्त गिरदाबे-जहदे-पैहम है
पार कर के ये भँवर जाना है

रास्ता ख़त्म हुआ और हम लोग
सोचते हैं कि किधर जाना है

ज़ब्त की हद भी कोई हो आख़िर
“आज हर हद से गुज़र जाना है”

ज़िन्दगी ख़्वाब ही ठहरी “मुमताज़”
सुब्ह होगी तो बिखर जाना है

मुमताज़ नाज़ां 09867641102

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9 comments on “T-22/20 दश्ते-माज़ी में उतर जाना है-मुमताज़ नाज़ां

  1. वाह माँ मुमताज़ नाज़ां जी क्या कहने हैं उम्दा ग़ज़ल हुई है दाद ही दाद

  2. मुमताज़ साहिबा बहुत अच्छी ग़ज़ल हुई है….बहुत बहुत बधाई….

  3. मुमताज़ साहिबा,
    बहुत अच्‍छी ग़ज़ल।
    वाह..वाह..।

  4. जुर्मे-उलफ़त में था वो भी शामिल
    लेकिन उसको तो मुकर जाना है
    कुछ शेर specific होते हैं जिनको हर कोई नहीं कह सकता !!! जो शेर परवीन , अदा, सहबा कह सकती हैं उन्हें ग़ालिब और मीर भी नहीं कह सकते क्योंकि अहसासात को भी मालूम है कि औरत का जिस्मानी और रूहानी पैकर मर्द से भिन्न है –यकीनन इज़हार भी !!
    तुझ को कब तक मैं मनाऊँ आख़िर
    जा चला भी जा, अगर जाना है
    आज से 30 बरस पहले इस शेर के सानी मिसरे को कहने से शाइरा परहेज करती !! लेकिन अब अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और दौरे हाज़िर की तरक्की ने ये मुमकिन किया है !!!
    ज़ब्त की हद भी कोई हो आख़िर
    “आज हर हद से गुज़र जाना है”
    बात से बात निकली गई है और उम्दा गिरह है !!! बन्दिशें तोडने का भाव अपनी अना के मर्क़ज़ पर वापस लौटने का भाव !!! ख़ूब !!!
    ज़िन्दगी ख़्वाब ही ठहरी “मुमताज़”
    सुब्ह होगी तो बिखर जाना है
    सूफियाना शेर है !! सुबह यहाँ भी मीर वाली सुबह है !!!
    अहदे -जवानी रो रो काटी पीरीं में लीं आँखे मूँद
    यानी रात बहुत जागे थे सुबह हुई आराम किया –मीर
    मुमताज़ नाज़ां साहबा !! इस गज़ल के लिये डाद कुबूल कीजिये और लफ़्ज़ के ताज़ा अंक की गज़लों के लिये भी –सादर –मयंक

  5. Mumtaaz bhai, umda ashaar k liye mubarakbad qubool farmayen. Wah.

  6. पूरी ग़ज़ल बेहद ख़ूबसूरत हुई है मुमताज़ जी ..बहुत बहुत बधाई आपको
    -कान्हा

  7. दश्ते-माज़ी में उतर जाना है
    आख़िरश लौट के घर जाना है

    हाँ, ज़रा देर अज़ीयत देगा
    ये भी इक ज़ख़्म है, भर जाना है

    puri gazal hi umda hai Mumataz nazan sahiba
    waahh wahhh waahhh

  8. Khoob gazal hui hae Mumtaaz ji
    Daad kubool karein
    Sadar
    Pooja

  9. दश्ते-माज़ी में उतर जाना है
    आख़िरश लौट के घर जाना है

    हाँ, ज़रा देर अज़ीयत देगा
    ये भी इक ज़ख़्म है, भर जाना है

    तुझ को कब तक मैं मनाऊँ आख़िर
    जा चला भी जा, अगर जाना है

    ज़ीस्त गिरदाबे-जहदे-पैहम है
    पार कर के ये भँवर जाना है

    ब्त की हद भी कोई हो आख़िर
    “आज हर हद से गुज़र जाना है”

    Ek kaamyaab Ghazal ke liye bahut bahut mubaraqbaad Mumtaaz ji… Har sher ek se badh kar ek …

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