25 टिप्पणियाँ

T-22/17 जो ये कहते थे कि मर जाना है-नवनीत शर्मा

जो ये कहते थे कि मर जाना है
उनसे जीने का हुनर जाना है

किसने सोचा था कि ख़ुद से मिलकर
अपनी आवाज़ से डर जाना है

हादसा मौत नहीं इन्सां की
हादसा, ख़ाब का मर जाना है

हज़रते-दिल को मनाना होगा
आज फिर उसकी डगर जाना है

कुछ हवा, आग, ज़मीं, आब, फ़लक
फिर मुझे लौट के घर जाना है

एक बालिश्त नहीं जिसकी छांव
तुमने उसको भी शजर जाना है

साथ रख मुझको बढ़ा ले की़मत
गो मुझे तूने सिफ़र जाना है

आज फिर तुमको नहीं ढूंढ़ सका
दिल को सहरा में पसर जाना है

आप भी सुनिए कहा है दिल ने
‘आज हर हद से गुज़र जाना है’

सिलसिला तोड़ रहे हो क्‍योंकर
सिलसिला ख़ुद ही बिखर जाना है

याद की घास तो गीली है बहुत
अब धुआं दिल पे पसर जाना है

दिल को सैराब किया अश्‍कों से
हमने रोने का हुनर जाना है

अपना जो भी था वो सब छूट गया
ये मगर वक्‍़ते-सफ़र जाना है

-नवनीत शर्मा 09418040160

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25 comments on “T-22/17 जो ये कहते थे कि मर जाना है-नवनीत शर्मा

  1. एक बालिश्त नहीं जिसकी छांव
    तुमने उसको भी शजर जाना है……….,वाह नवनीत भाई बहुत ख़ूब ग़ज़ल कही है दिली दाद

  2. वाह क्या ग़ज़ल हुई है…. दिल से दाद….
    हादसा मौत नहीं इन्साँ की…वाह
    सादर
    बिमलेंदु

  3. जो ये कहते थे कि मर जाना है
    उनसे जीने का हुनर जाना है
    ज़िन्दगी को शिकस्त दी गोया
    मरने वाले का हैसला देखो
    &
    बदन को छोड के जाना है आसमाँ की तरफ
    समन्दरों ने हमें ये सबक सिखाया था –बशीर
    वस्तुत: मृत्यु एक सरिता है !!! जिसमे .. इसलिये अगर हम धर्म को अपने बुनियादी अर्थों मे देखें तो वह मृत्यु का ही दर्शन होता है !!! – जिन्होने हमको ये दर्शन सिखाया उन्होने ही जीने का अस्ल हुनर सिखाया है !! मतला कंवे कर रहा है इस दर्शन को !!!
    किसने सोचा था कि ख़ुद से मिलकर
    अपनी आवाज़ से डर जाना है
    अपने मर्क़ज़ पर पहुंचना एक बडी उपलब्धि होती है !!! लेकिन खुद से मिलना –लख लख आकाशों को खुद मे देखना !! सूरज चाँद को खुद मे देखना होता है !!
    ये काइनात है मेरी ही ख़ाक का ज़र्र्रा
    मैं पने दश्त से गुज़रा तो भेद पाये बहुत !! –शिकेब !!
    हादसा मौत नहीं इन्सां की
    हादसा, ख़ाब का मर जाना है
    एक बर फिर इस शेर पर बार बार वाह वाह !!!
    हज़रते-दिल को मनाना होगा
    आज फिर उसकी डगर जाना है
    हज़रते दिल –जो है वो दिल को मज़हबे –परहेजी- शफ़्फ़ाफ रंग दे रहा है और शेर की कामयाबी इसी लफ़्ज़ मे छुपी है !! इसीख्याल को मैने भी कहा है –गो कि इतना खूबसूरती से नहीं — हम तो काबा भी चले जायें वले
    दिल ये जायेगा जिधर जाना है !!
    कुछ हवा, आग, ज़मीं, आब, फ़लक
    फिर मुझे लौट के घर जाना है
    बदन से बाहर बहुत दिनों तक नहीं जिया जा सकता !!! आप हे घर मे नहीं रहते घर भी आपमें रहता है !!
    मैं सिर्फ उसमे नहीं वो भी मुझमे रहता है
    जभी तो दूर नहीं जा सका कभी घर के –अखिलेश तिवारी
    एक बालिश्त नहीं जिसकी छांव
    तुमने उसको भी शजर जाना है
    भरम है –अक़ीदत का जो ज़र्रे को आफताब देखती है !!!!
    साथ रख मुझको बढ़ा ले की़मत
    गो मुझे तूने सिफ़र जाना है
    इस शेर पर भी फिर से वाह वाह –काफिये की नावेल्टी पर भी !!
    आज फिर तुमको नहीं ढूंढ़ सका
    दिल को सहरा में पसर जाना है
    जुज़ क़ैस कोई और न आया बरू ए कार
    सहरा मगर बतंगिये चश्मे हसूद था –ग़ालिब
    आप भी सुनिए कहा है दिल ने
    ‘आज हर हद से गुज़र जाना है’
    दिल ने कहा है इसलिये मुआमला गम्भीर है वगर्ना ज़ुबाँ कहती तो बात दीगर थी !!!
    सिलसिला तोड़ रहे हो क्यों कर
    सिलसिला ख़ुद ही बिखर जाना है
    कोई तर्तीब कभी भी ज़ाँविदानी सरहदों तक नहीं पहुंच सकी –सच है !!!
    याद की घास तो गीली है बहुत
    अब धुआं दिल पे पसर जाना है
    मंज़रकशी उम्दा है शेर की !!!
    दिल को सैराब किया अश्कों से
    हमने रोने का हुनर जाना है
    आज जी भर के जो रोये हैं तो यूँ खुश हैं फराज़
    चन्द लम्हों की ये राहत भे बडी हो जैसे ==अहमद फराज़
    अपना जो भी था वो सब छूट गया
    ये मगर वक़्थते-सफ़र जाना है
    मैं समय हूँ और अखण्ड और अहर्निश हूँ – अनादि हूँ अनंत हूँ और इतना सूक्ष्म कि मेरा भार विचार भी नहीं सह सकता !!
    नवनीत भाई !! इस ग़ज़ल पर बहुत बहुत मुबरकबाद कुबूल कीजिये !!! –मयंक

    • आदरणीय मयंक भाई साहब।
      सादर प्रणाम।
      बहुत शर्मिंदा हूं कि आपकी मसरूफि़यत को समझ नहीं सका। आपने हर ग़ज़ल को इतने ज़ावियों से देखने की और बहत खूबसूरती से देखने की आदत ऐसी डाल दी है कि… ।
      माता जी जल्‍द स्‍वस्‍थ्‍थ हों… ऐसी दिल से प्रार्थना है।
      आप पहले ही मेरे दिल में बहुत प्रतिष्ठित और सम्‍मानित स्‍थान पर हैं….आपकी इस विनम्रता, सदाशयता के ने उसमें और बढ़ोतरी की है।
      एक जि़द्दी मगर आपसे बहुत प्‍यार करने वाले छोटे भाई को क्षमा करेंगे ऐसा विश्‍वास है।

      बहुत आदर के साथ

      नवनीत

  4. हादसा मौत नहीं इन्सां की
    हादसा, ख़ाब का मर जाना है… अच्छा शेर… वाह….

  5. हादसा मौत नहीं इन्सां की
    हादसा, ख़ाब का मर जाना है
    बहुत सुन्दर नवनीत भाई !! ज़िन्दगी की सम्भावनाओं का मर जाना हादसा होता है !!! और एक पहलू ये भी है –हादसा मौत नहीं इंसाँ की /आँख के आब का मर जाना है !!!!
    साथ रख मुझको बढ़ा ले की़मत
    गो मुझे तूने सिफ़र जाना है
    “सिफर” -इस काफिये का इस्तेमाल पहली बार किया गया है और क्या खूब बात निकाली है !!!
    दीगर अशआर भी बहुत अच्छे कहे हैं !! ग़ज़ल के लिये बधाई !!! –मयंक

    • आदरणीय मयंक भाई साहब।
      प्रणाम।
      क्‍योंकि आपकी तवील टिप्‍पणियों की आदत हो चुकी है इसलिए ऐसा पता नहीं क्‍यों लगा कि ग़ज़ल आपको काफ़ी पसंद नहीं आई। और मेहनत करूंगा।
      आशीर्वाद बनाए रखें।
      सादर
      नवनीत

      • naheeनहीं नवनीत भाई !! ग़ज़ल मुकम्मल है और अशआर मे उतरने पर तादेर नावेल्टी का ताज़गी का और धनक का अहसास होता है !! वैचारिक गहराई और शिल्प भी बेशतर अश आर का बेहद खूबसूरत है !! मेरी माँ की तबीयत इन दिनों ठीक नहीं है और आफिस मे काम बहुत है –इसलिये जैसा चाहता हूँ वैसा कमेण्ट लिख नहीं पा रहा हूँ – जब भी वक़्त मिलेगा इस ग़ज़ल पर तवील कमेण्ट भी लिखूँगा !! सच बताऊँ मेरे पास नवीन सी चतुर्वेदी जी की किताब पिछले 20 दिनों से है और अभी मैं उसे भी पूरा पढ नहीं पाया – मेरी मजबूरी को समझिये !! मेरा गज़ल से लगाव ही आप भाइयों के प्रेम और स्नेह के कारण बना हुआ है !! दिल मे कोई शुबहा न रखिये !!! 8765213905 पर मुझे वक्त मिलने पर फोन कीजिये !! सस्नेह –मयंक

  6. हादसा मौत नहीं इन्सां की
    हादसा, ख़ाब का मर जाना है

    कुछ हवा, आग, ज़मीं, आब, फ़लक
    फिर मुझे लौट के घर जाना ह

    सिलसिला तोड़ रहे हो क्‍योंकर
    सिलसिला ख़ुद ही बिखर जाना है

    kya hia chhii gazal huii hai bhaiya waah waah
    maza aa gaya ..ye teeno sher to khas pasand aaye

    dili mubarakbad

    regards

  7. किसने सोचा था कि ख़ुद से मिलकर
    अपनी आवाज़ से डर जाना है

    हादसा मौत नहीं इन्सां की
    हादसा, ख़ाब का मर जाना है
    आदरणीय नवनीत भाईसाहब ,खुबसूरत मतले के साथ उम्दा ग़ज़ल हुई है |सभी अशआर लासानी हैं |
    इस शेर पर दिलोजान कुर्बान |
    साथ रख मुझको बढ़ा ले की़मत
    गो मुझे तूने सिफ़र जाना है
    ढेरों दाद कबूल फरमावें |सादर

  8. कुछ हवा, आग, ज़मीं, आब, फ़लक
    फिर मुझे लौट के घर जाना है

    Kya achha hai… Waah Waah Waah

    Kai din tak goonjta rahega ye sher zehan mein

    Bahut achhi ghazal hui hai Navneet ji

    Daad Haazir hai !!!

  9. बहुत सुन्दर ग़ज़ल हुई है Sir…

    बेहतरीन मतला
    और हर शेर धारदार
    मज़ा आ गया साहिब

    ये शेर बहुत ख़ास रहे…

    “हादसा मौत नहीं इन्सां की
    हादसा, ख़ाब का मर जाना है ”
    क्या खूब कहा…
    ज़िंदा शरीर नहीं दिल होना चाहिए

    “एक बालिश्त नहीं जिसकी छांव
    तुमने उसको भी शजर जाना है ”
    ये भी खूब कहा…
    आज यही सब दिखता है.. हालाँकि हालात बदल रहे है, लेकिन लम्बी दूरी तय करने में…

    साथ रख मुझको बढ़ा ले की़मत
    गो मुझे तूने सिफ़र जाना है
    भई वाह..
    क्या अंदाज़ है

    याद की घास तो गीली है बहुत
    अब धुआं दिल पे पसर जाना है
    ये भी बहुत खूब…
    और धुंआ वहीँ होगा जहां आग भी होगी…

    आनंद आ गया’
    मेरे आज के दिन की अच्छी शुरुआत हुई.
    शुक्रिया

  10. Kis kis sher ki tareef ki jae.. Murassa ghazal ke liye dili daad!!

    phir bhi in do ash’aar par alag se daad..

    हादसा मौत नहीं इन्सां की
    हादसा, ख़ाब का मर जाना है

    कुछ हवा, आग, ज़मीं, आब, फ़लक
    फिर मुझे लौट के घर जाना है

    waaaah!!

  11. waah bahut umdaa ghazal hai bhaiya…

    हादसा मौत नहीं इन्सां की
    हादसा, ख़ाब का मर जाना है

    हज़रते-दिल को मनाना होगा
    आज फिर उसकी डगर जाना है

    कुछ हवा, आग, ज़मीं, आब, फ़लक
    फिर मुझे लौट के घर जाना ह

    kya kehne hain..sadar

    -kanha

  12. Kuch hawa aag zamin….
    Kya achcha sher hai navneet bhai.
    Waah.
    Ek umda ghazal ke liye daad kubool karen.

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