26 टिप्पणियाँ

T-22/14 जीते जी काम ये कर जाना है-इरशाद ख़ान “सिकंदर”

जीते जी काम ये कर जाना है
जिस्म के पार उतर जाना है

आपकी बात अलग हो शायद
ख़ैर हम सबको तो मर जाना है

अबके सोचा है उसे देखूँ तो
मुस्कुराना है गुज़र जाना है

कैसे भरपाई ख़ला की होगी
बाक़ी ज़ख़्मों को तो भर जाना है

सबने रोका है जिधर जाने से
ये तो निश्चित है उधर जाना है

मस्लेहत इश्क़ में हो इतनी बस
कोई पूछे तो मुकर जाना है

मसअला ये है मिरे शहज़ादे
तुमने दीवार को दर जाना है

साँस दर साँस मैं भरता आया
ज़िन्दगी है कि ये हरजाना है

अपनी मंज़िल तो गली है उसकी
सोचिये आप, किधर जाना है

तुमने ये कहके मुक़र्रर हद की
“आज हर हद से गुज़र जाना है”

इरशाद ख़ान “सिकंदर”                        09818354784

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26 comments on “T-22/14 जीते जी काम ये कर जाना है-इरशाद ख़ान “सिकंदर”

  1. वाहहहह जनाब बहुत उम्दा ग़ज़ल है

  2. Nae lawazmaat talashne ka silsila aapke yahaaN badastoor jari hai.. kya hi achchi ghazal hui hai.. waaaah!!

  3. आपकी बात अलग हो शायद
    ख़ैर हम सबको तो मर जाना है

    अबके सोचा है उसे देखूँ तो
    मुस्कुराना है गुज़र जाना है
    इन दो शेरो पर तो उस दिन रु-ब-रु बात कर पाए हम कि कैसे ये ख़याल किसी और तरह मन में आ रहे थे कि आपकी ग़ज़ल सामने आ गई! बाकी शेरो पर ढेर सारी दाद कुबुल कीजिए.. बेहतरीन कहा है और कितनी सादगी से!

  4. तुमने ये कहके मुक़र्रर हद की
    “आज हर हद से गुज़र जाना है” UMDA AUR ACHHOOTI GIRAH, WAAH WAAH

  5. आपकी बात अलग हो शायद
    ख़ैर हम सबको तो मर जाना है

    अबके सोचा है उसे देखूँ तो
    मुस्कुराना है गुज़र जाना है

    मसअला ये है मिरे शहज़ादे
    तुमने दीवार को दर जाना है
    इरशाद भाई आपके अशआर हमेशा निराले होते हैं |इस खुबसूरत ग़ज़ल में भी इनकी बानगी है |वही काफ़िये मगर शेरियत बेमिसाल …क्या कहने ..ढेरों दाद कबूल फरमावें |सादर

  6. Irshad bhai, ghazal wah kya ghazal hai. Matla to kamal hai. mubarakbad qubool farmayen.

  7. irshad bhai bahut umda ghazal hui hai… matla beinteha khoobsurat hai…mukurna hai guzar jana hai..bahut maheen lamhe ko qaid kar liya aapne is she’r men..zindagi hai ke ye harjana hai ka bhi jawaab nahi… girah bhi khoob lagaai hai aapne.. dher saari daad…

  8. भाई इरशाद जी,

    हमेशा की तरह बहुत उम्‍दा ग़ज़ल।
    आदरणीय मयंक भाई साहब ने जो कहा है, उससे अधिक कहने को रह जाता है।
    वाह….वाह…
    दाद दिल से।
    नवनीत

  9. मुकम्मल ग़ज़ल है हमेशा की तरह इरशाद भाई लेकिन सबसे पहले एक बात कह दूं —
    साँस दर साँस मैं भरता आया
    ज़िन्दगी है कि ये हरजाना है
    इस शेर पर मैं इस नशिस्त की इंतेहा कर देता !! क्या बात है !!!! क्या कमाल का शेर कहा है और मैं खुशनसीब हूँ कि सबसे पहले इस शेर को पढने वालों मे एक मैं भी हूँ !! अब ग़ज़ल पर बात की जा सकती है ..
    जीते जी काम ये कर जाना है
    जिस्म के पार उतर जाना है
    ये मरतबा जिन को हासिल हुआ है उनमे से कुछ नाम , क़ृष्ण , पैगम्बर मुहम्मद साहब , जीसस , बुद्ध हैं !!!जैसे एक पौधे मे फूल का निकलना उसकी सम्भावना की पराकाष्ठा है वैसे ही इस शेर का मफ़्हूम जो बोल रहा है उसके मतलब हैं !! बहुत खूब !!!
    आपकी बात अलग हो शायद
    ख़ैर हम सबको तो मर जाना है
    Common sense is most uncommon thing in the world !!! और ये साधारण सी बात इसीलिये असाधारण है कि जानते हुये भी लोग इसे मानते नहीं !!!
    अबके सोचा है उसे देखूँ तो
    मुस्कुराना है गुज़र जाना है
    मैं तेरे पास से गुज़रूँ तुझे न पहचानूँ
    मेरी नज़र भी अगर इंतेकाम ले तो -क़ैसर उल ज़ाफरी
    कैसे भरपाई ख़ला की होगी
    बाक़ी ज़ख़्मों को तो भर जाना है
    बेहतरीन कहा है !! किसी का अभाव ही नहीं भरता जीवन में बाकी रब रफू हो सकता है !!!
    सबने रोका है जिधर जाने से
    ये तो निश्चित है उधर जाना है
    जो चौथी सम्त न जाये वो शाहज़ादा क्या !!! ??!!
    मस्लेहत इश्क़ में हो इतनी बस
    कोई पूछे तो मुकर जाना है
    रंग आया है शेर मे और गुलाबी रंग आया है !! गीता मे योगेश्वर ने कहा भी है कि गुप्त रखने योग्य भावों मे मैं “मौन” हूँ
    साँस दर साँस मैं भरता आया
    ज़िन्दगी है कि ये हरजाना है
    अह्ह्ह्ह्ह्ह्ह!! अह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह!! वाह वाह वाह !!!!
    तुमने ये कहके मुक़र्रर हद की
    “आज हर हद से गुज़र जाना है”
    बहुत जानदार गिरह है बहुत ही जानदार !!!
    इरशाद भाई !!! बहुत खूब !! जान डाल दी है आपने लफ़्ज़ों में –मयंक

  10. Bhaiyya,

    Kya haseen ghazal hai, Har sher pe bas waah waah waah nikalte chale ja rahi hai,

    Aur is sher ke baare me kya kahun

    साँस दर साँस मैं भरता आया
    ज़िन्दगी है कि ये हरजाना है

    Kamaal Kamaal Kamaal…. Waah Maza aa gaya….

  11. जीते जी काम ये कर जाना है
    जिस्म के पार उतर जाना है

    आपकी बात अलग हो शायद
    ख़ैर हम सबको तो मर जाना है

    अबके सोचा है उसे देखूँ तो
    मुस्कुराना है गुज़र जाना है

    साँस दर साँस मैं भरता आया
    ज़िन्दगी है कि ये हरजाना है

    kya baat hai dada ..waahh waahh

    kya hi achhii gazal huii hai

    dili mubarakbad

  12. Puri ghazal behad umdaa hui hai dada…

    अबके सोचा है उसे देखूँ तो
    मुस्कुराना है गुज़र जाना है

    कैसे भरपाई ख़ला की होगी
    बाक़ी ज़ख़्मों को तो भर जाना ह

    ye do she’r khas taur pe pasand aaye ..daad qubule’n …sadar
    -kanha

  13. निश्चित लफ़्ज़ इस्तेमाल किये जाने के बाद भी मिस्रे की रवानी कायम है..बहुत अच्छा प्रयोग.
    पूरी गज़ल अच्छी है इरशाद भाई.
    मुबारकबाद कुबूल करें.

  14. Wahhh wahhh
    BAhut khub dada.maza aa gaya
    Dili daad kubul kijiye

    SAdar
    IMran

  15. इरशाद जी
    कमाल ग़ज़ल कही है आपने ,शेर दर शेर नए मंज़र उकेरे हैं आपने। ढेरों दाद क़ुबूल करें।
    इतने खूबसूरत कहन के लिए शुक्रिया।
    कैसे भरपाई ख़ला की होगी…..
    मस्लेहत इश्क़…..
    ये दो शेर लिए जा रही हूँ।
    सादर
    पूजा

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