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T-22/13 इश्क़ में जीना है मर जाना है-अहमद सोज़

इश्क़ में जीना है मर जाना है
आज हर हद से गुज़र जाना है

सामने और मिरे है कोई
आइना देखना डर जाना है

रास्ते का न पता मंज़िल का
मैं न जानूं कि किधर जाना है

खाक़ हो जाना है इक दिन सब को
ज़िंदगी का यही हरजाना है

ज़िंदगी आ मुझे गदगद कर दे
तेरे आग़ोश में भर जाना है

रोज़ होता है बहाना कोई
वस्ल से रोज़ मुकर जाना है

वो जहाँ लूटा गया था मुझको
फिर मुझे आज उधर जाना है

सो चुका शह्र भी थक हार के अब
चलिए अब “सोज़” जी घर जाना है

अहमद सोज़ 09867220699

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5 comments on “T-22/13 इश्क़ में जीना है मर जाना है-अहमद सोज़

  1. Bahut achhi Ghazal hui Sahab… Dili Mubaraqbaad

    Aur ye sher … Kya kehne :

    वो जहाँ लूटा गया था मुझको
    फिर मुझे आज उधर जाना है

  2. सोज़ साहब।
    सुंदर ग़ज़ल।
    दाद हाजि़र है।
    सादर

    नवनीत

  3. waahh ahmed soj sahab wah

    kya khuub

    dili daad qubul keejiye

  4. सामने और मिरे है कोई
    आइना देखना डर जाना है

    रास्ते का न पता मंज़िल का
    मैं न जानूं कि किधर जाना है

    खाक़ हो जाना है इक दिन सब को
    ज़िंदगी का यही हरजाना है
    आदरणीय सोज़ साहब , उम्दा ग़ज़ल हुई है ढेरों दाद कबूल फरमावें |सादर

  5. रोज़ होता है बहाना कोई….
    वो जहां लूटा गया था मुझको…वाह…
    क्या ख़ूब कहा है सोज़ साहब
    दिली दाद क़ुबूल करें
    सादर
    पूजा

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