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T-22/8 ख़ुद की नज़रों से उतर जाना है-शाज़ जहानी

ख़ुद की नज़रों से उतर जाना है ?
इस से बेहतर कहीं मर जाना है

आस्ताँ तक तो तिरे आ गये हैं
अब भला हम को किधर जाना है

दस्ते-शफ़क़त है हमारे सर पर
बख़्त अज़ख़ुद ही संवर जाना है

मेरे हिस्से में पड़ेगी ज़िल्लत
मर्तबा आप के सर जाना है

अब्रे तीरा में महे-कामिल सा
रुख़ पे ज़ुल्फ़ों का बिखर जाना है

कल सहर देख न हम पाएँगे
क़ौल से उसको मुकर जाना है

कोई बच्चों का तमाशा है यह ?
वह डराए जो तो डर जाना है ?

इस ख़ता पर कि मिरा घर भी है
शाम को लौट के घर जाना है

कल तो रुस्वा हैं वहाँ से आए
आज भी बारे-दिगर जाना है

क्यों है क़ुद्रत में दख़्ल-अंदाज़ी
इसका अंजाम, बशर, जाना है ?

कुछ तो दो वक़्त, अभी बिगड़ा है
ख़ुद ब ख़ुद इसको सुधर जाना है

शाज़, सब छूट यहाँ जाएगा
ले के क्या रख़्ते-सफ़र जाना है

शाज़ जहानी               09350027775

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12 comments on “T-22/8 ख़ुद की नज़रों से उतर जाना है-शाज़ जहानी

  1. Murassa ghazal ke liye mubarkbaad!!

  2. ख़ुद की नज़रों से उतर जाना है ?
    इस से बेहतर कहीं मर जाना है UMDA MATLA

  3. मेरे हिस्से में पड़ेगी ज़िल्लत
    मर्तबा आप के सर जाना है…. वाह… क्या बात है…

  4. शाज़ साहब।
    कोई एकाध शे’र नहीं सारी ग़ज़ल बहुत खू़ब।
    दाद…दाद…दाद..।

  5. umda ghazal wahhh….kya khoob ashaar nikaale haiN….wahhh

  6. Be had khoobsoorat ghazal kahi hai shaaz bhai.
    Ek ek sher behatareen.
    Dad kubool Karen.

  7. कल सहर देख न हम पाएँगे
    क़ौल से उसको मुकर जाना है

    कोई बच्चों का तमाशा है यह ?
    वह डराए जो तो डर जाना है ?

    इस ख़ता पर कि मिरा घर भी है
    शाम को लौट के घर जाना है
    आदरणीय शाज़ साहब, बहुत खुबसूरत ग़ज़ल हुई है ,दिली दाद कबूल फरमावें |सादर

  8. कोई बच्चों का तमाशा है यह
    वह डराए जो तो डर जाना है ?

    मेरे हिस्से में पड़ेगी ज़िल्लत
    मर्तबा आप के सर जाना है

    शाज़ साहब एक मुकम्मल ग़ज़ल के लिए बहुत बहुत बधाई

  9. ख़ुद की नज़रों से उतर जाना है ?
    इस से बेहतर कहीं मर जाना है
    बिल्कुल !! अव्वल मिसरे को प्रश्नचिन्ह के साथ पढना होगा !!बकौल शिकेब — मुझको गिरना है तो मैं अपने ही कदमो मे गिरूं
    जिस तरह साया ए दीवार पे दीवार गिरे –शिकेब
    अना का परस्तार शेर है !! वगर्ना जो खुद की नज़रों मे गिर गया उसे कोई उठा नहें सकता !! और अगर ज़मीर का कतरा भी ऐसे शख़्स मे बाकी रहा तो खुदकुशी करेगा !!!
    आस्ताँ तक तो तिरे आ गये हैं
    अब भला हम को किधर जाना है
    दायम पडा हुआ तेरे दर पे नहीं हूँ मैं –ग़ालिब ,,,उसके आस्ताँ के बाद कहाँ जाना है !! सच है !!
    दस्ते-शफ़क़त है हमारे सर पर
    बख़्त अज़ख़ुद ही संवर जाना है
    किसका करम है ??!! बहर्क़ैफ शेर खूबसूरत है !!! मालिक का ही हाथ है ये दस्ते शफक़त !!
    मेरे हिस्से में पड़ेगी ज़िल्लत
    मर्तबा आप के सर जाना है
    अच्छा तंज़ है और इस ज़मीन पर कामयाब शेर कहा है !!!
    अब्रे तीरा में महे-कामिल सा
    रुख़ पे ज़ुल्फ़ों का बिखर जाना है
    वाह वाह !! पीता हूँ रोज़े अब्रोक़दे माहताब में –शायद इसी साकी का दीदार तो नहीं छुपा है ??!! और सिर्फ काइनाती मंज़र पर गौर किया जाय तो बेहद वुसअत के साथ तुफैल साहब का शेर है –अब्र का टुकडा रुपहला हो गया // चान्दनी फूटेगी पक्का हो गया !!
    बाकी शाज़ साहब आपका शेर श्रंगार और रूमान की बुलन्दी पर है !!!
    कल सहर देख न हम पाएँगे
    क़ौल से उसको मुकर जाना है
    बडी बात कही !!! उनके क़ौल से मुकरने मे हमारी इंतेहा ए हयात भी है !!!
    इस ख़ता पर कि मिरा घर भी है
    शाम को लौट के घर जाना है
    घर और मकान का फर्क़ !!! मर्क़ज़ दायरे के बाहर नहीं ही होगा सच है !!
    कल तो रुस्वा हैं वहाँ से आए
    आज भी बारे-दिगर जाना है
    मजबूरी है महबूब की गली जो ठहरी !!
    क्यों है क़ुद्रत में दख़्ल-अंदाज़ी
    इसका अंजाम, बशर, जाना है ?
    जाना है –से प्रभाव पैदा किया है !!!
    शाज़, सब छूट यहाँ जाएगा
    ले के क्या रख़्ते-सफ़र जाना है
    सब ठाठ धरा रह जायेगा –जब लाद चलेगा बंजारा !!! सभी जानते हैं लेकिन फिर भी आदमी सिरिश्तन संचय करता है !!!
    शाज़ साहब !! अरूज़ पर भी और ख्याल पर भी बेहद अच्छी गज़ल कही है आपने !! मुबारकबाद कुबूल कीजिये –मयंक

  10. shaz sahab..bahut umda ghazal hui hai… कोई बच्चों का तमाशा है यह ?
    वह डराए जो तो डर जाना है ?

    इस ख़ता पर कि मिरा घर भी है
    शाम को लौट के घर जाना है
    in do ashaar par bataure khaas daad qubulen

  11. मर्तबा आपके सर जाना है….खूब कहा शाज़ साहब आपने।
    उम्दा ग़ज़ल के लिए बधाई हो।
    सादर
    पूजा

  12. Bahut achi gazal hui shaz sahab.
    Dili daad kubul kijiye

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