13 टिप्पणियाँ

T-22/2 दो क़दम चल के ठहर जाना है-समर कबीर

दो क़दम चल के ठहर जाना है
सख़्त मुश्किल है मगर जाना है

जिन अंधेरों से गुज़र जाना है
रोशनी लेके उधर जाना है

हस्बे-मामूल तिरे क़दमों में
रात होते ही बिखर जाना है

मुझ पे लाज़िम है हिफ़ाज़त सबकी
आप लोगों को तो घर जाना है

कौन समझा है मेरी ग़ज़लों को
किस ने मेरा ये हुनर जाना है

पीके उन आँखों से सहबा-ए-वफ़ा
सरहदे-ग़म से गुज़र जाना है

उसकी ग़फ़लत का बयाँ कैसे करूँ
शाम को जिसने सहर जाना है

मालो दौलत हो कि हो इज़्ज़त-ए-नफ़्स
सब तेरे ज़ेर-ए -असर जाना है

किसने पाई है यहाँ ख़िज़्र की उम्र
एक दिन सबको “समर” जाना है

समर कबीर मो.9753845522

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13 comments on “T-22/2 दो क़दम चल के ठहर जाना है-समर कबीर

  1. बहुत खूबसूरत ग़ज़ल। दिल से दाद स्‍वीकार कीजिएगा।
    सादर
    नवनीत

  2. पीके उन आँखों से सहबा-ए-वफ़ा
    सरहदे-ग़म से गुज़र जाना है
    kya baat hai …. bahut khub kaha hai ….

  3. kya khoob ghazal huyi hai bhai wahhh…mubarakbaad

  4. Hasbe maaloom tire….
    Waah.
    Behatareen ghazal me like badhaai Samar bhai.

  5. जिन अंधेरों से गुज़र जाना है
    रोशनी लेके उधर जाना है…….. मतला और हुस्ने मतला दोनों लासानी है वाह…

    हस्बे-मामूल तिरे क़दमों में
    रात होते ही बिखर जाना है ……….क्या कहने

    मुझ पे लाज़िम है हिफ़ाज़त सबकी
    आप लोगों को तो घर जाना है………….. उम्दा बेहद उम्दा वाह….

    उसकी ग़फ़लत का बयाँ कैसे करूँ
    शाम को जिसने सहर जाना है…………बहुत ख़ूब

    पीके उन आँखों से सहबा-ए-वफ़ा
    सरहदे-ग़म से गुज़र जाना है…….वाह…… जान निकाल दी इस शेर ने तो साहब
    आदरणीय कबीर साहब ,क्या बात है ! हर एक शेर लाज़वाब है ,किस किस को कोट करूं ,किसे छोडूं |उम्दा ग़ज़ल के लिए तहेदिल से दाद कबूल फरमावें |सादर |

  6. दो क़दम चल के ठहर जाना है
    सख़्त मुश्किल है मगर जाना है
    वो खुद इक मौज है बहरे फना की
    तवक़्को है बहुत जिस ज़िन्दगी से
    इसलिये ये सफर , ” ज़िन्दगी “जिसकी इंतिहा ठहर जाना ही है बडा मुश्किल है लेकिन जाना है !!! बहुत ख़ूब बहुत ख़ूब कबीर साहब !!
    जिन अंधेरों से गुज़र जाना है
    रोशनी लेके उधर जाना है
    आइडियोलोजी है ज़िन्दगी की – तीरगी के सफर मे हम पर फर्ज़ यही है कि हम रोशनी ले के जायें –और रोशनी ईजाद चाहे जैसे करें –चाहे खुद को जला कर- चाहे मालिक से इम्दाद ले कर !!!
    हस्बे-मामूल तिरे क़दमों में
    रात होते ही बिखर जाना है
    आप चाहे सूरज के पैकर मे हों या इंसानी पैकर मे ये सच है
    मुझ पे लाज़िम है हिफ़ाज़त सबकी
    आप लोगों को तो घर जाना है
    क्योंकि शाइर के चेतना अदबी काज़ी की है जो शहर के अन्देशे से परेशान रहता है !! शबख़ून के अन्देशे से और उसका काम सिर्फ देखना हे नहीं सोचना भी होता है !!
    दुखिया दास कबीर है –जागै अरु रोवै !!!
    कौन समझा है मेरी ग़ज़लों को
    किस ने मेरा ये हुनर जाना है
    कमोबेश ये बयान हर शाइर के दिल की आवाज़ है !!
    पीके उन आँखों से सहबा-ए-वफ़ा
    सरहदे-ग़म से गुज़र जाना है
    मुबारक़ हो साहब !! अपके साक़ी को सलाम जिसकी आँखों मे सहबा ए वफा आज के दौर मे है !!
    उसकी ग़फ़लत का बयाँ कैसे करूँ
    शाम को जिसने सहर जाना है
    ये धुन्धलका खुल के बतलाता नहीं
    शाम है या सुबह का आगाज़ है
    &
    इक धुन्द है सहर की कहानी के नाम पर
    महफूज़ अब तलक है सियाही के बाब सब !!
    मालो दौलत हो कि हो इज़्ज़त-ए-नफ़्स
    सब तेरे ज़ेर-ए -असर जाना है
    उड जायेंगे ये होश किसी रोज़ आखिरश
    रह जायेगी ज़मी पे धरी आबो ताब सब !!!
    किसने पाई है यहाँ ख़िज़्र की उम्र
    एक दिन सबको “समर” जाना है
    समर कबीर साहब मालिक की मेहर है कि हमको ख़िज़्र की उम्र नही मिलती वगर्ना जैसे आदमी अमरत्व की दुआ मांगता है वैसे ही मौत के दुआ माँगता !! वो प्यास है कि जामे कज़ा माँगते हैं लोग
    वो हब्स है कि लू की दुआ माँगते हैं लोग !!! –हमारे अहद का सच यही है !!
    एक बेहतरीन गज़ल के लिये दिली दाद कुबूल कीजिये !!! –मयंक

  7. उसकी ग़फ़लत का बयाँ कैसे करूँ
    शाम को जिसने सहर जाना है..waahhh

  8. डर से डर के न ठहर जाना है १
    राह कैसी हो गुजर जाना है

    जिंदगी तेरा भरोशा कब तक २
    हर उठी मौझ ठहर जाना है

    तू खुदा से न लगे कम मुझको ३
    तू बताए मैं किधर जाना है

    खूब निकला तेरा हम से कहना ४
    हर मुसीबत से उभर जाना है

    फूल का साथ तलाशें हम भी ५
    संग कब खार ठहर जाना है

    रंग फूलों का नजारा हो जब ६
    तब उदासी का असर जाना है

    सोच के हम तुझे पाने निकले ७
    “आज हर हद से गुजर जाना है”

    मोहन बेगोवाल
    9463728153

  9. बहुत अच्छी ग़ज़ल हुई समर साहब
    दिली दाद क़ुबूल कीजिये

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