32 टिप्पणियाँ

T-22/1 चाक़ पर मिट्टी को मर जाना है-दिनेश नायडू

चाक़ पर मिट्टी को मर जाना है ? ?
ख़ाबे-तामीर बिखर जाना है ?

हमको इस दश्त में जाना होगा
वहशतों का यही हरजाना है

साहिबो ! हम हैं उसी सफ़ के लोग
जिनसे सहरा को सँवर जाना है

सामने शह्र की हद है साहब
अब हमें लौट के घर जाना है

क़ब्रगाहें हैं सदाओं की यहां
बस यहीं हमको भी मर जाना है

कैसे कैसे मुझे आते हैं ख़याल
अब के लगता है कि मर जाना है

क्या है ये जी का डरा सा रहना
क्या ये अपने से मुकर जाना है

तुमको ख़ोने का तुम्हें पाने का
हमने हर क़िस्म का डर जाना है

कोई भी राह नहीं है उस तक़
हमको मालूम है पर जाना है

लो नज़र आने लगा उसका शह्र
क़ाफ़िले वालो ! ठहर जाना है

किस लिए तैरना अश्कों में सदा
अब तहे-दीदा-ए-तर जाना है

वो ‘दिनेश’ उसकी गली है आगे
देख़ लो तुमको किधर जाना है

दिनेश नायडू 09303985412

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32 comments on “T-22/1 चाक़ पर मिट्टी को मर जाना है-दिनेश नायडू

  1. बहुत खूब दिनेश भाई।
    आपको पढ़ना सुखद अनुभव है।
    सादर
    नवनीत

  2. Shandar Gazal ke liye bharpur daad kubul kijiye Aadarniy Dinesh ji.

  3. umda ghazal se nawaaza hai bhai Dinesh sb..poori ghazal tareef ke qaabil hai…wahhhh

  4. Dinesh Bhai ghazal suni hui hai aapse, abhi padhi hai dobara, maza doguna ho gya..

    साहिबो ! हम हैं उसी सफ़ के लोग
    जिनसे सहरा को सँवर जाना है

    तुमको ख़ोने का तुम्हें पाने का
    हमने हर क़िस्म का डर जाना है

    वो ‘दिनेश’ उसकी गली है आगे
    देख़ लो तुमको किधर जाना है

    waaaaaaah!!!

  5. कमाल के शे’र हैं दिनेश भाई !
    बहुत मुबारकबाद.

  6. आदरणीय दिनेश सा, उम्दा गजल हुई है।मतला ता मक्ता मुकम्मल गजल हुई है।मजा आ गया।क्या कहने।वाह !काफियों की बौछार कर दी आपने तो।दिली दाद कबूल फरमावें।सादर।

  7. सामने शह्र की हद है साहब
    अब हमें लौट के घर जाना है

    वाह, हरेक शेर खूबसूरत है भाई ! मुबारकबाद !!

  8. दिनेश साहब को पढ़कर असीम आनंद प्राप्त होता है….

  9. waaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaah waaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaah kya kahne

  10. अच्छी ग़ज़ल हुई है दिनेश साहब…..

  11. Kya ghazal hui hai bhaiya..waahh waahh..tarah ki shandar shuruaat hui …zindabad ghazal..daad
    -Kanha

  12. वाह वाह बहुत उम्दा अश्आर पिरोये हैं आपने ग़ज़ल में।
    ढेरों दाद क़ुबूल करें।

  13. zindabaad…dinesh… kya zabardast ghazal kahi hai… har she’r kamaal hua hai…matle se lekar maqte tak har she’r se raushni phoot rahi hai… kamaal kar diya pyaaare….

  14. Bahut achi gazal hui sir
    DIli daad kubul kijiye

    SAdar

  15. इस तरही का आग़ाज़ बहुत खूबसूरत गज़ल से हो रहा है !!!
    चाक़ पर मिट्टी को मर जाना है ? ?
    ख़ाबे-तामीर बिखर जाना है ?
    दोनो मिसरों के प्रश्नचिन्ह पर गौर करना होगा !! शेर का भावार्थ इन्हीं प्रश्नचिन्हो मे छुपा है – मिटा दे अपनी हस्ती को अगर कुछ मर्तबा चाहे // कि दाना ख़ाक मे मिल कर गुले गुलज़ार होता है !! –जैसी बात है !!
    हमको इस दश्त में जाना होगा
    वहशतों का यही हरजाना है
    “इस दश्त” और “इक दश्त” दोनो पर शेर खूबसूरत बनता है !!
    साहिबो ! हम हैं उसी सफ़ के लोग
    जिनसे सहरा को सँवर जाना है
    पिछले शेर को अपने आगोश मे समेटे हुये है ये शेर !! क़ैस की तस्वीर इस शेर मे पिन्हा और नुमाया है !!
    सामने शह्र की हद है साहब
    अब हमें लौट के घर जाना है
    सवाल ये है कि आप ये शेर शहर के अन्दर खडे हो कर कह रहे हैं या बाहर खडे हो कर – अगर बाहर खडे हो कर कह रहे हैं तो ज़बर्दस्त तंज़ है शेर मे !!
    क़ब्रगाहें हैं सदाओं की यहां
    बस यहीं हमको भी मर जाना है
    ये शेर खामुशी का जीता जागता पैकर है !!!
    तुमको ख़ोने का तुम्हें पाने का
    हमने हर क़िस्म का डर जाना है
    बहुत खूब !! बहुत खूब !! उसी को देख कर जीते हैं जिस क़ाफिर पे दम निकले !!
    कोई भी राह नहीं है उस तक़
    हमको मालूम है पर जाना है
    ये मसाइले तस्व्वुफ़ !! ये तेरा बयान याराँ !!!
    किस लिए तैरना अश्कों में सदा
    अब तहे-दीदा-ए-तर जाना है
    बडा खूबसूरत शेर है और नस्र करने पर इसका भेद नहीं खुलता !!!लफ़्ज़ों को बहुत अच्छा बर्ता गया है !!! गम गया सारी काइनात गई !! इसलिये गम को और उसके मूल्य को समझना होगा !!
    दिनेश भाई !! एक बेहतरीन गज़ल के लिये मुबारकबाद कुबूल कीजिये !!! –मयंक

  16. zabardast bhaii zabardast……kya hi umda gazal huii hai Dinesh bhaiii …waahhh waahh wahhh

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