6 टिप्पणियाँ

उसके दयारे-दिल में,कभी मेरा घर न था-इमरान हुसैन ‘आज़ाद’

उसके दयारे-दिल में,कभी मेरा घर न था
यूँ तो वो हमसफर था,मगर मोतबर न था

दो बातें दो घड़ी को ज़रा कर न पाए तुम
लम्हा मिलन का,इतना भी तो मुख़्तसर न था

अरमान सारे घुट गये अंदर ही दिल के, क्यूँ
दीवारे-दिल में दोस्तो क्या कोई दर न था

इस भाग दौड़ ने भी किये हैं कई अनाथ
इलज़ाम अबके बार,फ़क़त मौत पर न था

माना तुम्हारी जीत का चर्चा हुआ बहुत
लेकिन हमारी हार का भी कम असर न था

मेरे ही दिल में बस गयीं,वो सब उदासियाँ
दुनिया में जिनका यार कोई अपना घर न था

उस पार मंजिलें थी मिरे इंतजार में
दरिया को काटने ही का मुझमे हुनर न था

तारे फलक से तोड़के बच्चों में बाँट दूँ
थी आरजू मिरी भले मुझमे हुनर न था

इमरान हुसैन ‘आज़ाद’

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6 comments on “उसके दयारे-दिल में,कभी मेरा घर न था-इमरान हुसैन ‘आज़ाद’

  1. Waah waah……mujhe aisi hi gazlen jyada pasand hai….kya sher hue hain….waah…

    लेकिन हमारी हार का भी कम असर न था…..ज़िन्दाबाद भाई…

  2. Tare falak se tod kar bachhon mein baant duun… wah …bahut khoob
    Umda gazal Aazad ji
    Daad kubool karein
    Sadar
    Pooja

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