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सीना अश्कों से भर गया होता-प्रखर मालवीय ‘कान्हा’

सीना अश्कों से भर गया होता
मैं न रोता तो मर गया होता

खुद ही डूबा हूँ मैं तेरे ग़म में
चाहता तो उबर गया होता

ग़म की लौ और तेज़ होती तो
और थोडा निखर गया होता

फिर न आवारगी गले मिलती
गर कहीं मैं ठहर गया होता

बेहिसी ने बचा लिया वरना
आज मैं भी सिहर गया होता

जिस्म ज़ख्मों से ढँक गया वरना
बे-लिबासी में मर गया होता

उसकी आँखों ने मुखबिरी कर दी
वो तो फिर से मुकर गया होता

मेरी नादानियों पे बोलो ना
आज तो ये डफर गया होता

लौट आता अगर न ग़ज़लों में
और ‘कान्हा ‘ किधर गया होता

-प्रखर मालवीय ‘कान्हा’

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14 comments on “सीना अश्कों से भर गया होता-प्रखर मालवीय ‘कान्हा’

  1. kya kahne Prakhar…zindabad

  2. बहुत उम्दा ग़ज़ल हुई है बालक.. बेहिसी वाले शे’र का जवाब नहीं…

  3. बेहतरीन ग़ज़ल …बधाई

  4. बहुत उम्दा गजल कही आप जी ने – बधाई हो

  5. जिस्म ज़ख्मों से ढँक गया वरना
    बे-लिबासी में मर गया होता

    Waah Kanha Bhai waah…Lajawab.

  6. Bahut khub kanha bhai
    Maza aa gaya

  7. वाह प्रखर भाई खूब भरपूर ग़ज़ल कही है…..बहुत उम्दा…
    किस-किस शेर का ज़िक्र किया जाये सो पूरी ग़ज़ल लिए जा रही हूँ।
    सादर
    पूजा

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