6 टिप्पणियाँ

ग़ज़ल- हमारे दिल में रह कर थक न जाएं-राज़िक़ अंसारी

हमारे दिल में रह कर थक न जाएं
तुम्हारे ग़म यहाँ पर थक न जाएं

हमें तो ख़ैर आदत हो चुकी है
चला के लोग पत्थर थक न जाएं

हमारी दास्तां पर रोते रोते
तुम्हारे दीदा ए तर थक न जाएं

निकाला है दिलों ने काम इतना
कहीं दस्ते रफ़ूगर थक न जाएं

चरागों में ग़ज़ब का हौसला है
हवा ! तेरे ये लश्कर थक न जाएं

राज़िक़ अंसारी                           09827616484

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6 comments on “ग़ज़ल- हमारे दिल में रह कर थक न जाएं-राज़िक़ अंसारी

  1. राज़िक़ अंसारी साहब बहुत उम्दा ग़ज़ल हुई है..क्या कहने…
    निकाला है दिलों ने काम इतना
    कहीं दस्ते रफ़ूगर थक न जाएं
    इस शे’र के तो कहने ही क्या..हज़रते-मुसहफ़ी याद आ गए..दाद क़ुबूल करें..

  2. राजिक जी, सभी अशआर अच्छे कहे – बधाई

  3. बहुत खूब ग़ज़ल
    दाद कुबूल फरमाइए

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