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तेरे बदन मे और कई खुश्बुयें थीं दोस्त —मयंक अवस्थी

बिस्तर था, हम थे, और हया की क़बा न थी
वो उम्र की ख़ता थी हमारी ख़ता न थी

क्या क़ुर्बतें थीं जिनमें कहीं गुम थे दो बदन
क्या गुफ़्तगू थी जिसमें लबों की सदा न थी

जो दर्द शहरे–हिज्र के बासी के दिल में था
उस दर्द की दवा तो तुम्हारे सिवा न थी

तेरे बदन में और कई ख़ुश्बुएं थीं दोस्त
तेरे बदन में सिर्फ़ वो बू-ए-वफ़ा न थी

मालिक तिरी निगाहे-करम बर्क़ सी थी क्यूँ
शायद मिरे लबों पे ही सच्ची दुआ न थी

ये इक कमी रही है सदा इश्तिहार में
बाँके तो हम बहुत थे प बाँकी अदा न थी

बुझ कर चराग़े-दिल ने कहा मुझसे ऐ “मयंक”
पहले कभी भी ऐसी मुख़ालिफ़ हवा न थी

मयंक अवस्थी 0 8765213905

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7 comments on “तेरे बदन मे और कई खुश्बुयें थीं दोस्त —मयंक अवस्थी

  1. क्या क़ुर्बतें थीं जिनमें कहीं गुम थे दो बदन
    क्या गुफ़्तगू थी जिसमें लबों की सदा न थी

    जो दर्द शहरे–हिज्र के बासी के दिल में था
    उस दर्द की दवा तो तुम्हारे सिवा न थी

    तेरे बदन में और कई ख़ुश्बुएं थीं दोस्त
    तेरे बदन में सिर्फ़ वो बू-ए-वफ़ा न थी

    kya hi umda gazal huii hai bhaiya waahh waahh

    regards

  2. bhaiya poori ghazal hi bemisaal hai… waah waah.. ghazal kya meethe paani ki jheel hai.. waah

    • स्वप्निल बहुत बहुत आभार !! दर अस्ल मैं भी बहुत बार कोशिश कर चुका हूँ कि जो धनक आपकी शाइरी मे दिल को मोहती है वैसा कुछ मैं भी कह सकूँ –लेकिन तस्वीर बनाता हूँ तस्वीर नहीं बनती …. लेकिन दिल इस बात से बहुत शाद रहता है कि जो मैं नही कर सकता वो मेरा अपना कोई बार बार कर के दिखा रहा है और अब तो वो स्थापित भी है इस बात के लिये –जीते रहिये –मयंक

  3. Aha ha kya kahen ? Lafz hi nahin soojh rahe…SUBHAN ALLAH….

    • नीरज भाई !! आपके अलफाज़ का लम्स मुझे गतिज ऊर्जा से भर देता है –आप मुहब्बत और खुलूस से लबरेज़ हैं और ये मोगरे की डाली आपके हर बयान मे खुश्बू देती है!! आभार – मयंक

  4. क्या बात है मयंक जी,
    बहुत खूब ग़ज़ल कही है..
    बहुत अलग, और ख़ास

    – क्या गुफ़्तगू थी जिसमे लबों की सदा न थी
    बहुत सुन्दर –

    इक दर्द शहरे –दिल के मरीज़ों के दिल में था
    उस दर्द की दवा भी तुम्हारे सिवा न थी
    -ये शे’र बहुत खूब ख़ास रहा
    क्या बात है

    तेरे बदन मे और कई खुश्बुयें थीं दोस्त
    तेरे बदन में सिर्फ वो बू-ए-वफा न थी
    – हसीनों की इन्ही अदाओं से तो बचना ज़रूरी है

    मालिक तिरी निगाहे-करम बर्क़ सी थी क्यूँ
    शायद मेरे लबों पे ही सच्ची दुआ न थी
    – बहुत खूब, बहुत सच्चा शे’र

    बुझकर चरागे -दिल ने कहा मुझसे ऐ “मयंक”
    पहले कभी भी ऐसी मुख़ालिफ़ हवा न थी
    – उम्दा. बहुत उम्दा साहिब.. क्या बात है

    • भुवन भाई !! तहे दिल से शुक्रगुज़ार हूँ कि आपने इतनी शिद्दत से इस गज़ल को पढा और ऐसा तफ्सीली बयान दिया जिससे मेरा हौसला भी बढा और विश्वास भी !! भाई बार बार आभार –मयंक

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