6 टिप्पणियाँ

अश्वत्थामा -एक नज़्म-स्वप्निल तिवारी ‘आतिश’

गुज़िश्ता सदियाँ

बदन पे पहने भटक रहा है

उसे नहीं है तलाश कोई

तमाम भटकन है बेम’आनी

कुछ ऐसी अफ़वाह सी सुनी है

बदन को भट्टी ने कोढ़ की कुछ गला दिया है

यहां वहाँ से लटकता रहता है गोश्त उसका

जहां पे मणि थी वहाँ बस इक घाव है

कि जिससे लहू रिसा करता है मुसलसल

युगों से दुनिया से वो कटा है

युगों से दुनिया कटी है उससे…

मैं सोचता हूँ

कभी मिले तो मैं उससे पूछूँ

ज़ियादा किसकी है उम्र बोलो

तुम्हारी या फिर अकेलेपन की?…….

-स्वप्निल तिवारी ‘आतिश’ 08879464730

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6 comments on “अश्वत्थामा -एक नज़्म-स्वप्निल तिवारी ‘आतिश’

  1. बदन पे पहने भटक रहा है
    ahhaa…
    उसे नहीं है तलाश कोई
    तमाम भटकन है बेम’आनी
    waahhh
    ज़ियादा किसकी है उम्र बोलो
    तुम्हारी या फिर अकेलेपन की?……

    kya kehne dada…daad ..sadar
    -Kanha

  2. बहुत खूब स्वप्निल !! बहुत खूब !! नज़्म मे टाइटिल का एक अलग महत्व और असर होता है और इस नज़्म का उंवान चौंकाने वाला है !! अश्वत्थामा , प्रतिशोध अभीप्सा तडप बेचैनी और पराजय का अहर्निश प्रतीक है !! एक असाधारण योद्धा जिसे पराजयबोध ने अभिशप्त प्रेतात्मा बना दिया !! हमारे शरीर मे पस और पीप बनकर अश्वत्थामा आज भी जीवित है मनुष्य की प्रतिशोधात्मक तृषाग्नि का जीवंत ऐतिहासिक प्रतीक !!
    बहुत सुन्दर शब्द चयन है आपका और गज़ल से इतर विधाओ पर भी जो हस्तलाघव ईश्वर ने आपको दिया है उसमे दिनो दिन और निखार आये !! असीमित शुभकामनायें –मयंक

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