4 टिप्पणियाँ

कोई मुझसे ख़फ़ा है इस लिये ख़ुद से ख़फ़ा हूँ-नवनीत शर्मा

कोई मुझसे ख़फ़ा है इस लिये ख़ुद से ख़फ़ा हूँ
उबलते-खौलते मौसम के नेज़े पर रखा हूँ

मिरे अंदर मिरा कुछ भी नहीं बस तू है बाक़ी
तिरे अंदर बता प्‍यारे मैं अब कितना बचा हूँ

मेरी सांसों के सन्नाटे में कैसा शोर, क्यूँ मैं
कई सदियाँ गुज़र जाने पे भी ख़ुद से ख़फ़ा हूँ

कुल्‍हाड़ी का मुझे अब डर नहीं आदत है उसकी
गये वो दिन मैं कहता था, कोई जंगल घना हूँ

मिलूँ ख़ुद से मैं क्‍या फ़ुर्सत नहीं मुझको तुम्हीं से
मैं ख़ुद में होके भी बस तुम में रहने की रज़ा हूं

शराफ़त को मिरी, कमज़ोरियां माना सभी ने
मैं ख़्वाबे-अम्‍न बुनता था लहू में सन गया हूँ

मुझे मुझ तक पहुंचने में लगेंगे जन्म कितने
ज़मीं से टूट कर छिटका जज़ीरा हो गया हूँ

यही क़िस्मत है उनके ख़ाब से रहना नदारद
मैं जागा हूं, मैं जिनकी नींद में तकिया बना हूँ

बिलोते हैं मुझे जज़्बात, अहसासात मेरे
मुझे तपना है मैं ‘नवनीत’ होने की सज़ा हूँ

नवनीत शर्मा 09418040160

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4 comments on “कोई मुझसे ख़फ़ा है इस लिये ख़ुद से ख़फ़ा हूँ-नवनीत शर्मा

  1. आदरणीय दादा का हार्दिक आभार कि इन ग़ज़लों को आशीर्वाद दिया। श्रीवास्‍तव जी, इरशाद भाई और आलोक भाई… आपका भी बहुत मशकूर हूं।
    करम बना रहे।

  2. नवनीत जी
    खूब ग़ज़ल कही है आपने। दाद क़ुबूल करें।
    सादर

  3. bahut achchi ghazal hui bhai mubarakbaad qubool farmaaiye

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