12 Comments

एक ग़ज़ल हज़रते जौन एलिया की नज़्र-स्वप्निल तिवारी

ये ख़्वाहिश है के जब निकलूं मैं घर से
इन आँखों पर तेरा दीदार बरसे

यहाँ पर मुन्तज़िर है हिज्र मेरा!!
सदा तो उसकी आई थी इधर से

मुझे लहरों के चंगुल से छुडाने
हज़ारों कश्तियाँ निकली भंवर से

तेरा चेहरा तो ज़िद्दी रंग निकला
उतरता ही नहीं मेरी नज़र से

मैं उसकी याद में तब मुन्जमिद था
गिरी तस्वीर जब दीवार पर से

मुझे धोका तो साए का हुआ था
मगर आसेब उतरा था शजर से

उसे पहली नज़र कहते हैं जानां
मैं तुमको देखता हूँ जिस नज़र से

ये सारे फूल गोया आग के हों
के लौ उठती है देखो गुलमोहर से

मिले जो ख़्वाब कल तो पूछ बैठे
अरे तुम!  इस गली में तुम किधर से?

थकन सीलन के जैसे आ बसी है
दरारें पड़ गईं मुझ में सफ़र से

न जाने रंग आगे क्या हो इनका
शुआएँ तोड़ लूँ कुछ मैं सहर से

-स्वप्निल तिवारी

08879464730

Advertisements

12 comments on “एक ग़ज़ल हज़रते जौन एलिया की नज़्र-स्वप्निल तिवारी

  1. बहुत खूब, सारे शेर एक से बढ कर एक

  2. mind blowing .i cant think lyk dis

  3. मुझे धोका तो साए का हुआ था
    मगर आसेब उतरा था शजर से

    उसे पहली नज़र कहते हैं जानां
    मैं तुमको देखता हूँ जिस नज़र से

    ये सारे फूल गोया आग के हों
    के लौ उठती है देखो गुलमोहर से

    मिले जो ख़्वाब कल तो पूछ बैठे
    अरे तुम! इस गली में तुम किधर से?

    Ahaaaa..kya ghazal hai dada ..daad daad daad
    sadar pranam
    -Kanha

  4. मैने आज लौंग और नीम्बू और हरे मिर्च पुडिया मे रख कर सडक पर डाल दिये हैं कि “चश्मे -बद्दूर !! स्वप्निल के कलम को नज़र न लगे !!”लेकिन भई ! ऐसे शेर न कहो – मैं अहसासे कमतरी से लबालब भर गया हूँ कि अब मुझे शेर कहने मे डर लगता है ऐसे शेर सुनने के बाद मुझे कौन सुनेगा ??!!
    मुझे लहरों के चंगुल से छुडाने
    हज़ारों कश्तियाँ निकली भंवर से
    मैं उसकी याद में तब मुन्जमिद था
    गिरी तस्वीर जब दीवार पर से
    मुझे धोका तो साए का हुआ था
    मगर आसेब उतरा था शजर से
    उसे पहली नज़र कहते हैं जानां
    मैं तुमको देखता हूँ जिस नज़र से
    थकन सीलन के जैसे आ बसी है
    दरारें पड़ गईं मुझ में सफ़र से
    न जाने रंग आगे क्या हो इनका
    शुआएँ तोड़ लूँ कुछ मैं सहर से
    कहते हैं शायर की रूह भी माजी के ग़म मे मुब्तिला रहती है –लेकिन मरहूम जान एलिया की रूह यकीनन पुरसुकून होगी !! क्यों न हो उनकी ज़मीन को और ज़रखेज कर दिया है स्वप्निल आपने –मयंक

  5. zbardast gazal huii hai bhaiyaa. zabardazst…wahhh wahhh
    dili mubarakbaad

  6. उसे पहली नज़र कहते है जाना
    मैं तुमको देखता हूँ जिस नज़र से…!!!

    मिले जो ख़्वाब कल तो पूछ बैठे
    अरे तुम!  इस गली में तुम किधर से?

    “स्टेंडिंग ओवेशन” लीजिये शायर शाब…

Your Opinion is counted, please express yourself about this post. If not a registered member, only type your name in the space provided below comment box - do not type ur email id or web address.

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out /  Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  Change )

w

Connecting to %s

%d bloggers like this: