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वो मिरे सीने से आख़िर आ लगा- प्रखर मालवीय ‘कान्हा’

वो मिरे सीने से आख़िर आ लगा
मर न जाऊं मैं कहीं ऐसा लगा

रेत माज़ी की मेरी आँखों में थी
सब्ज़ जंगल भी मुझे सहरा लगा

खो रहे हैं रंग तेरे होंट अब
हमनशीं ! इनपे मिरा बोसा लगा

लह्र इक निकली मेरे पहचान की
डूबते के हाथ में तिनका लगा

कर रहा था वो मुझे गुमराह क्या?
हर क़दम पे रास्ता मुड़ता लगा

कुछ नहीं..छोड़ो ..नहीं कुछ भी नहीं ..
ये नए अंदाज़ का शिक़वा लगा

गेंद बल्ले पर कभी बैठी नहीं
हर दफ़ा मुझसे फ़क़त कोना लगा

दूर जाते वक़्त बस इतना कहा
साथ ‘कान्हा’ आपका अच्छा लगा

प्रखर मालवीय ‘कान्हा ‘

09911568839

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13 comments on “वो मिरे सीने से आख़िर आ लगा- प्रखर मालवीय ‘कान्हा’

  1. रेत माज़ी की मेरी आँखों में थी
    सब्ज़ जंगल भी मुझे सहरा लगा

    बहुत बढ़िया लगा ये शेर…शब्द कम हैं इसकी तारीफ़ के लिए…

  2. kya baat hai Prakhar…puri gazal hi umda hai mere bhai…
    dili daad

  3. वाह्ह क्या खूब ग़ज़ल है
    दाद कुबूल करें

  4. प्रखर जी
    सुदर ग़ज़ल कही है आपने। मतला पढ़ते ही एक बारगी इरशाद जी की ग़ज़ल “वो अचानक ही गले से आ लगा” याद हो आई।
    रेत माज़ी की मेरी आँखों में थी
    सब्ज़ जंगल भी मुझे सहारा लगा
    ये शेर खास तौर पे अच्छा लगा।
    दाद क़ुबूल करें।
    सादर
    पूजा भाटिया

  5. बेहतरीन गजल हुई है… कान्हा भाई ……आपका अंदाज ए सुखनवरी हमे बेहद ही उम्दा लगा …. दिली मुबारकबाद …

  6. क्या बात है कान्हा साहब बहुत खूब
    दाद कुबूल कीजिये

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