19 टिप्पणियाँ

कोई वजूद का अपने निशाँ बनाता जाऊं-इरशाद ख़ान ‘सिकन्दर’

कोई वजूद का अपने निशाँ बनाता जाऊं
मैं चाहता हूँ तुझे आसमां बनाता जाऊं

अगर मैं आ ही गया भूले भटके मकतब में
तो क्यों न तख़्तियों पे तितलियाँ बनाता जाऊँ

मिरे बग़ैर भी मिलना है तुझको दुनिया से
सो लाज़मी है तुझे काइयाँ बनाता जाऊं

मैं बन गया तो हूँ हिस्सा तुम्हारे क़िस्से का
मज़ा तो जब है कि जब दास्ताँ बनाता जाऊं

जहाँ जहाँ से मैं गुज़रूँ अँधेरे छंटते जाँय
ज़मीं पे नूर भरी कहकशाँ बनाता जाऊं

न मेरे बाद सफ़र में किसी को दिक़्क़त हो
ये मेरा फ़र्ज़ है पगडंडियाँ बनाता जाऊं

ज़मीनो-आसमां के दरमियाँ मुहब्बत की
मिरा जुनून है कुछ सीढ़ियाँ बनाता जाऊं

इरशाद ख़ान ‘सिकन्दर’                 09818354784

Advertisements

About irshadkhansikandar

मैं मूलतः शायर हूँ . हाँ रोज़ी-रोटी के लिए फिल्म,धारावाहिक,म्युज़िक एल्बम में गीत लिखता हूँ

19 comments on “कोई वजूद का अपने निशाँ बनाता जाऊं-इरशाद ख़ान ‘सिकन्दर’

  1. Hamesha ki tarah umdaa ghazal ..shandar ash’aar ..wahh Waahh..kya kehne dada ..sadar
    -Kanha

  2. न मेरे बाद सफ़र में किसी को दिक़्क़त हो
    ये मेरा फ़र्ज़ है पगडंडियाँ बनाता जाऊं.

    बहुत ही सुँदर भाव….

  3. मैं बन गया तो हूँ हिस्सा तुम्हारे क़िस्से का
    मज़ा तो जब है कि जब दास्ताँ बनाता जाऊं…….

    ……..क्या बात भाई जी खुश हो गया।।।।।।।।मन

  4. सिकंदर साहब
    तरही मुशायरे के बाद जैसे duty पूरी हुई हो ,यूं आराम से बैठ लिए थे। आपका कहा पढ़ा। कमाल है ,और ये भी की इस तरह के कलाम हम सीखने वालों के लिए ,सच पगडंडियों से कम नहीं। जैसा की आपने फ़रमाया है।…..पगडंडियां बनाता जाऊं।
    🙂 आपके उम्दा कहन के लिए दाद और इतना उम्दा कहने का शुक्रिया।क़ुबूल करें।
    सादर
    पूजा भाटिया

  5. bahut bahut bahut umda ghazal hai irshaad bhai… titliyon wala she’r to door talak rang udaayega… dher saari daad….

  6. Irshad Bhai, ghazal khoob hai. Kahkashaa’n k saath noor bhari, samajh se baahar ki baat hai. Daad qubool farmayen. SHAHID HASAN ‘SHAHID’

    • मोहतरम शाहिद हसन ‘शाहिद’ साहब ग़ज़ल पसंद फ़रमाने के लिए मशकूर हूँ.रहा सवाल ‘नूर भरी कहकशाँ का’ तो इस सिलसिले में पहली बात मैं ये अर्ज़ कर दूं कि मैं अभी तालिबे-इल्म हूँ !सो मुमकिन है मेरा सोचा हुआ दुरुस्त न हो ,बहरहाल मैं अपना ख़याल जूँ का तूँ आपके साथ साझा कर रहा हूँ ..मैंने सोचा कि जिस तरह- आग- भीसण आग,. ठंड-कड़ाके की ठंड, गर्मी-बला की गर्मी, सितारा-चमकता सितारा, कहकशाँ-ताबिन्दा कहकशाँ है ! उसी तरह कहकशाँ -नूरभरी कहकशाँ कयों न हो?
      अब अगर मेरी सोच दुरुस्त नहीं है तो मैं आपसे और अपने बड़ों से गुज़ारिश कर रहा हूँ कि इस मौज़ू पर रौशनी डालें…..

  7. nihayat hi umda gazal huii h dada..
    matla to bhoolne se raha…
    naye saal ki shaandaar shuruaat

    regards
    Alok

  8. अस्सलाम अलैकुम दादा
    बहुत अच्छी ग़ज़ल।मज़ा आ गया
    दिली दाद क़ुबूल कीजिये

    सादर
    इमरान

  9. नए साल की क्या अच्छी शुरुआत इस ग़ज़ल के हवाले से हुई है इरशाद भाई! बहुत उम्दा! दिली दाद!

Your Opinion is counted, please express yourself about this post. If not a registered member, only type your name in the space provided below comment box - do not type ur email id or web address.

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s

%d bloggers like this: