9 टिप्पणियाँ

T-21/43 बुझे हैं ऐसे कि हो कर भी नईं हुए रौशन-नवीन सी. चतुर्वेदी-3

बुझे हैं ऐसे कि हो कर भी नईं हुए रौशन
न जाने किस के हुनर से चराग़ थे रौशन

जो उस का काम है उस ने वही किया साहब
बुझे हुओं को जला कर बुझा-दिये……. रौशन

शबे-विसाल तो आँखों पे ख़्वाब हावी थे
शबे-फ़िराक़ भी दीदे न हो सके रौशन

किसी के दिल में जो सपने थे, इक इशारे पर
हमारी पलकों से झर-झर के हो गये रौशन

दुआएँ ऐसे ही दी जाती हैं मुहब्बत में
उदासियों का ठिकाना सदा रहे रौशन

हम उस असर के बशर हैं जिसे सितमगर ने
इनायतों में नवाज़े अनासिरे-रौशन

कुछ ऐसे झूल रहे हो ‘नवीन’ तुम जैसे
तुम्हारे शानों पे रक्खे हों क़ाफ़िये रौशन

नवीन सी. चतुर्वेदी 09967024593

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9 comments on “T-21/43 बुझे हैं ऐसे कि हो कर भी नईं हुए रौशन-नवीन सी. चतुर्वेदी-3

  1. नवीन भाई क्या कहने! जिस जमीन में एक ग़ज़ल कहना मुश्किल हो उसमे
    में तीन-तीन ग़ज़ल!
    zindabbad !!!!

  2. बुझे हैं ऐसे कि हो कर भी नईं हुए रौशन
    न जाने किस के हुनर से चराग़ थे रौशन..waahh kya kehne dada ..sadar
    _kanha

  3. नवीन भाई क्या कहने! एक तरही में तीन-तीन ग़ज़ल! नए साल में आपकी रचनाशीलता यूँ ही उरूज़ पर रहे!

  4. नवीन भाई साहब। तीसरी ग़ज़ल ? बहुत बधाई और दाद।
    सादर
    नवनीत

  5. नवीन जी
    प्रणाम
    जिस मुश्किल ज़मीन पर एक ग़ज़ल कहने में अमूमन सब पूरे हो जाते हैं वहीँ आप की तीन लहलहाती ग़ज़लें…भई कमाल है। दिली दाद क़ुबूल करें।
    सादर
    पूजा भाटिया

  6. लाजवाब अन्दाज़ो फ़िक्र से आरास्ता ख़ूबसूरत ग़ज़ल
    ये जो शेर कहने की मशीन है आपके पास
    कुछ दिनों के लिये मुझे उधार दे दीजिये
    हा हा हा हा….लाजवाब

    • जनाब हम तो ख़ुद ही आप के मुरीद हैं। एक व्यक्ति और इतनी सारी विधाएँ, अद्भुत क्षमता है आप की। प्रणाम। आप से फोन पर जो बात हुई, उसे दोहराना चाहूँगा कि मैं ने “अनासिरे-ग़ज़ल” को अपनी उस समझ को मानते हुये लिया है जिस के मुताबिक़ “लफ़्ज़ के आख़िर में कवाफ़ी की शक्लें मिलना भी ज़रूरी होता है”। मुझे ख़ुशी है कि आप ने मेरी इस सोच को अपनी सहमति प्रदान की।

  7. Daadaa praNaam. ghazal ko tarhi m sthaan dene k lie bahut bahut aabhaaree huN.

    Aap kee ghazal ka intzar h.

    Tarhi khaasee qaamyaab h. Ek do din m saaree posts attend karta huN.

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