6 टिप्पणियाँ

T-21/41 जो अपना नाम किसी फ़न में कर गये रौशन-देवेंद्र गौतम

जो अपना नाम किसी फ़न में कर गये रौशन
उन्हीं के नक़्शे-क़दम पर हैं क़ाफ़िले रौशन

ये कैसे दौर से यारब गुज़र रहे हैं हम
न आज चेहरों पे रौनक़ न आइने रौशन

किसी वरक़ पे हमें कुछ नज़र न आयेगा
किताबे-वक़्त में जब होंगे हाशिये रौशन

हवेलियों पे तो सबकी निगाह रहती है
किसी ग़रीब की कुटिया कोई करे रौशन

हरेक सम्त अंधेरों की सल्तनत है मगर
दिलों में फिर भी उमीदों के हैं दिये रौशन

हमारे पांव तो कब के उखड़ चुके हैं मगर
ज़मीं की तह में अभी तक हैं ज़लज़ले रौशन

सवाल सबके भरोसे का है ये मिरे भाई
‘क़लम संभाल अंधेरे को जो लिखे रौशन’

-देवेंद्र गौतम 08860843164

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6 comments on “T-21/41 जो अपना नाम किसी फ़न में कर गये रौशन-देवेंद्र गौतम

  1. हमारे पांव तो कब के उखड़ चुके हैं मगर
    ज़मीं की तह में अभी तक हैं ज़लज़ले रौशन
    umda sher !!!!

  2. जनाब देवेंद्र साहब। बहुत खूब। दाद स्‍वीकार करें।
    सादर

  3. तरही में बड़े दिनों के बाद आपकी ग़ज़ल पढने को मिली और क्या अच्छी ग़ज़ल हुई है. वाह! वाह!

  4. हवेलियों पे तो सबकी निगाह रहती है
    किसी ग़रीब की कुटिया कोई करे रौशन

    बहुत ख़ूब देवेन्द्र साहब

  5. बहुत खूब ग़ज़ल हुई देवेन्द्र साहब
    दाद कुबूल फरमाइए

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