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T-21/38 जो दिल के ताक़ पे रक्खे हैं कुछ दिये रौशन-आलोक मिश्रा

जो दिल के ताक़ पे रक्खे हैं कुछ दिये रौशन
उन्हीं से हैं मिरी साँसों के सिलसिले रौशन

इक आफ़ताब का टुकड़ा था दिल हमारा कभी
थे इसके नूर से हस्ती के दायरे रौशन

बहुत अज़ीज़ मुझे है ये ख़स्तगी अपनी
इसी सबब तो हुए मेरे मर्सिये रौशन

अभी भी ख़ुद से मैं बातें तवील करता हूँ
अभी भी हैं तिरे ख़ाबों के तज़किरे रौशन

तू कब तलक यूँ उजालों की राह देखेगा
“कलम संभाल अंधेरे को जो लिखे रौशन

मुझे बुलंदी पे मजबूरियों ने पहुँचाया
ज़ुरुरतों ने रखे मेरे हौसले रौशन

आलोक मिश्रा 09876789610

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10 comments on “T-21/38 जो दिल के ताक़ पे रक्खे हैं कुछ दिये रौशन-आलोक मिश्रा

  1. जो दिल के ताक़ पे रक्खे हैं कुछ दिये रौशन
    उन्हीं से हैं मिरी साँसों के सिलसिले रौशन
    klya khoob manzarkashi hai ….. umda sher !!!!

  2. Kya kehne Alok bhai ..bahut umda ghazal ..waaahh
    -Kanha

  3. जो दिल के ताक़ पे रक्खे हैं कुछ दिये रौशन
    उन्हीं से हैं मिरी साँसों के सिलसिले रौशन
    खूबसूरत !! खूबसूरत मतला है !!
    इक आफ़ताब का टुकड़ा था दिल हमारा कभी
    थे इसके नूर से हस्ती के दायरे रौशन
    जब दिल रौशन था तब हयात भी रौशन ठीक और दिल की आफताब के टुकडे से सिमिली बहुत खूब है आलोक भाई !!
    बहुत अज़ीज़ मुझे है ये ख़स्तगी अपनी
    इसी सबब तो हुए मेरे मर्सिये रौशन
    इस काफिये का कम इस्तेमाल किया गया है तरही मे और यहाँ इसका बहुत सुन्दर प्रयोग किया गया है !!! रुख़्सती के बाद का मंज़र –दाद !!
    अभी भी ख़ुद से मैं बातें तवील करता हूँ
    अभी भी हैं तिरे ख़ाबों के तज़किरे रौशन
    जिस स्थिति और जिस मन;स्थिति का ज़िक्र है वो तस्वीर बडी दिलकश है आलोक !!
    तू कब तलक यूँ उजालों की राह देखेगा
    “कलम संभाल अंधेरे को जो लिखे रौशन
    अच्छी गिरह !!
    मुझे बुलंदी पे मजबूरियों ने पहुँचाया
    ज़ुरुरतों ने रखे मेरे हौसले रौशन
    नेसेसिटी इस द मदर आफ डिस्कवरी चैनल ): बधाई हो आलोक हर शेर पसन्द आया और अर्रोज़ के लिहाज से भी गज़ल बेहद अच्छी कही है आपने !!! और आलोक रौशन रदीफ़ पर ऐसे ही गज़ल कहेगा ऐसी हमारी उमीद भी थी !! खुश रहिये और ऐसे ही कलम को रौशन रखिये –मयंक

  4. Alok bhai.aapki ghazal ka intzaar tha. kya baat. ye style bahut alag hai bhai. khhob jeeyen.

  5. क्या कहने आलोक भाई! एक पुरअसर ग़ज़ल पर भरपूर दाद लीजिये!

  6. बढ़िया ग़ज़ल आलोक। अच्छा काम है आप का। बहुत ख़ूब। जीते रहिये।

  7. बहुत उम्दा ग़ज़ल हुई आलोक भाई साहब
    दिली दाद क़ुबूल कीजिये

  8. उम्दा ग़ज़ल वाह वाह

  9. तू कब तलक यूँ उजालों की राह देखेगा
    “कलम संभाल अंधेरे को जो लिखे रौशन

    मुझे बुलंदी पे मजबूरियों ने पहुँचाया
    ज़ुरुरतों ने रखे मेरे हौसले रौशन

    वाह बहुत खूब …शानदार ग़ज़ल आलोक जी

  10. सुन्दर ग़ज़ल आलोक जी।
    मुझे बुलंदी पे मजबूरियों ने पहुँचाया…वह खूब कहा आपने
    दिली दाद क़ुबूल करें
    सादर
    पूजा भाटिया

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