7 टिप्पणियाँ

T-21/35 तू कह रहा है तिरे सब हैं ज़ाविए रौशन-द्विजेन्द्र द्विज

तू कह रहा है तिरे सब हैं ज़ाविए रौशन
`क़लम सम्भाल अँधेरे को जो लिखे रौशन’

चमक-दमक में तू बीनाई बख़्शना मौला
हर एक गाम पे मिलते हैं आइने रौशन

वगरना इनको अँधेरा निगल चुका होता
हमारे अज़्म ने रक्खे हैं हौसले रौशन

बहुत सँभाल के रखता हूँ अपने अश्कों को
ये मेरी आँखों में रखते हैं क़हक़हे रौशन

सियाहकारों को अकसर बहुत अखरते हैं
चराग़ रखते है जो अपने ज़ेह्न के रौशन

ग़मों की धूप भी उसको निखार आती है
वो चेह्रा आज भी करता है आइने रौशन

ये मोजिज़ा है तसव्वुर के नूर का वरना
कभी मिले हैं अँधेरे में रास्ते रौशन ?

फिर आज धूप टहलती दिखी पहाड़ों पर
बुझे दिये फिर उम्मीदों के हो गये रौशन

वो सिर्फ़ तेरे ही कहने से तो नहीं होता
चराग़ वो है ज़माना जिसे कहे रौशन

द्विजेन्द्र द्विज 09418465008

Advertisements

About Lafz Admin

Lafzgroup.com

7 comments on “T-21/35 तू कह रहा है तिरे सब हैं ज़ाविए रौशन-द्विजेन्द्र द्विज

  1. इस पोर्टल को रौशन करने वाला भी ईद का चाँद हो रहा है –बहुत कम दिखाई देते हैं आप अब द्विज साहब –लेकिन जब आप नुमूँ होते हैं तो देखने वालो की दीवानगी देखते बनती है !!
    चमक-दमक में तू बीनाई बख़्शना मौला
    हर एक गाम पे मिलते हैं आइने रौशन
    सुन्दर शेर कहा है !! आँखों की बीनाई ही अस्ल शै है इसी के चलते किसी को कोई शै पत्थर लगती है और किसी को भगवान !!! लेकिन इस शेर मे नज़र पर भावना का आरोप न रखने का मश्वरा दिया गया है जो कि बहुत उत्तम विचार है !!
    इन तेज़ उजालो से बीनाई को ख़तरा है
    जैसे भी बने फौरन ख़्वाबो का मकाँ छोडो –शुजाअ ख़ाबर

    वगरना इनको अँधेरा निगल चुका होता
    हमारे अज़्म ने रक्खे हैं हौसले रौशन
    बेशक –उस ख़्वाब की सरहद को कोई छू नही सकता // जिस ख़्वाब की सूरत की निगहबान हैं आँखे !!
    बहुत सँभाल के रखता हूँ अपने अश्कों को
    ये मेरी आँखों में रखते हैं क़हक़हे रौशन
    रुलाओ नही मेरे भाई !!! तुम इतना जो मुस्कुरा रहे हो // क्या गम है जिसको छुपा रहे हो!!!! और हम जानते ही हैं कि — अब वक़्त बतायेगा मैं शोला हूँ या शबनम // आँसू हूँ, अभी ख़ाब की पलकों पे रुका हूँ
    सियाहकारों को अकसर बहुत अखरते हैं
    चराग़ रखते है जो अपने ज़ेह्न के रौशन
    कोई चराग़ जहाँ रोशनी का ज़िक्र करें
    सियाह रात का चेहरा वहीं उतर जाये –मयंक
    ग़मों की धूप भी उसको निखार आती है
    वो चेह्रा आज भी करता है आइने रौशन
    इस शेर का कुछ त आल्लुक कहकहे कफिये वाले शेर से भी है !!!
    ये मोजिज़ा है तसव्वुर के नूर का वरना
    कभी मिले हैं अँधेरे में रास्ते रौशन ?
    नूर – बीनाई , रौशन , लफ़्ज़ बर्तने मे तो आप उस्ताद हैं ही !! तस्व्वुर का नूर !! क्या बात है !
    फिर आज धूप टहलती दिखी पहाड़ों पर
    बुझे दिये फिर उम्मीदों के हो गये रौशन
    पहला शेर है जिसने इस मुसल्सल गज़ल से थोडा बाहर रसाई की !! वगर्ना हर शेर तरही मिसरे के मर्कज़े ख्याल को कमोबेश बर्त रहा था –बहरहाल उत्तराखण्ड के इस अख़ण्ड गौरव के कलम को नमन !!
    वो सिर्फ़ तेरे ही कहने से तो नहीं होता
    चराग़ वो है ज़माना जिसे कहे रौशन
    द्विजेन्द्र द्विज साहब ज़माना वही कहेगा जो आप कहेंगे !! आप मान्य हैं किसी विधा मे तो आप ही आदर्श के प्रतिमान को स्थापित करेंगे !! यकीन न हो तो किसी नशिस्त मे आजमा कर देख लीजिये !! किसी फूहड शेर पर तपाक से वाह वाह कीजिये !! कई लोग इसी दहशत मे वाह वाह करेंगे कि शायद अच्छा शेर है जिसे द्विज साहब समझते हैं लेकिन हम नहीं समझ पाये –फिर ज़माना भी उस पर वाह वाह करेगा !! एक शेर है निदा फाज़ली साहब का !!
    सूरज को चोंच मे लिये मुर्गा खडा रहा
    खिडकी के पर्दे खींच दिये रात हो गई
    इस शेर को तब्सरानिगारों ने नई जदीद शाइरी की ज़ीनत कहा और इसका खूब चर्चा रहा !! बाद मे 20-30 बरस बाद इस शेर को कहने पर जब खुद निदा साहब ने अफसोस जताया तब इस शेर का भरम फना हुआ !! हा हा हा हा है !! ख़ैर चुहुल अपनी जगह शेर बिल्कुल खरा सोना है और इस विचार पर मैं आपसे पूर्णत: सहमत हूँ !! गज़ल के लिये आपको बधाई –मयंक

  2. द्विज जी सादर प्रणाम
    बहुत ही खूबसूरत ग़ज़ल !!!

    बहुत सँभाल के रखता हूँ अपने अश्कों को
    ये मेरी आँखों में रखते हैं क़हक़हे रौशन
    हासिले ग़ज़ल शेर है !!

  3. ये मोजिज़ा है तसव्वुर के नूर का वरना
    कभी मिले हैं अँधेरे में रास्ते रौशन ?

    क्या बात है द्विज साहब। बढ़िया ग़ज़ल पेश की है। बहुत ख़ूब। दाद हाज़िर है।

  4. बहुत सँभाल के रखता हूँ अपने अश्कों को
    ये मेरी आँखों में रखते हैं क़हक़हे रौशन

    सियाहकारों को अकसर बहुत अखरते हैं
    चराग़ रखते है जो अपने ज़ेह्न के रौशन

    ग़मों की धूप भी उसको निखार आती है
    वो चेह्रा आज भी करता है आइने रौशन

    ये मोजिज़ा है तसव्वुर के नूर का वरना
    कभी मिले हैं अँधेरे में रास्ते रौशन ?

    फिर आज धूप टहलती दिखी पहाड़ों पर
    बुझे दिये फिर उम्मीदों के हो गये रौशन

    बहुत शानदार ग़ज़ल आदरणीय

  5. shandar gazal huii h sir..
    tamaam gazal hi umda hai

    dili mubarakbad

    regards

  6. प्रणाम Sir,

    बेहतरीन ग़ज़ल हुई है, हमेशा की तरह |
    एक अलग विचारधारा

    वगरना इनको अँधेरा निगल चुका होता
    हमारे अज़्म ने रक्खे हैं हौसले रौशन

    बहुत सँभाल के रखता हूँ अपने अश्कों को
    ये मेरी आँखों में रखते हैं क़हक़हे रौशन

    फिर आज धूप टहलती दिखी पहाड़ों पर
    बुझे दिये फिर उम्मीदों के हो गये रौशन

    वो सिर्फ़ तेरे ही कहने से तो नहीं होता
    चराग़ वो है ज़माना जिसे कहे रौशन

    क्या खूब शेर कहे हैं.
    वाह!

Your Opinion is counted, please express yourself about this post. If not a registered member, only type your name in the space provided below comment box - do not type ur email id or web address.

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s

%d bloggers like this: