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T-21/31 तुम्हारी याद के होते हैं जब दिये रौशन-डॉक्टर मुहम्मद आज़म

तुम्हारी याद के होते हैं जब दिये रौशन
तभी ग़ज़ल के भी होते हैं मोजज़े रौशन

अगरचे बज़्म में हर सू थे क़ुमकुमे रौशन
तुम्हारे आने से ये और हो गये रौशन

ये कौन गुज़रा है नक़्शे-क़दम हैं ये किस के
महक रही है हवा भी, हैं रास्ते रौशन

ज़िया में उनकी ही नाम आप का भी चमकेगा
कि आप जितने चराग़ों को कर गये रौशन

भले ही नाम हो महताबो-आफ़ताब तो क्या
कि नाम होगा फ़क़त अच्छे काम से रौशन

दिये जलाने की तौफ़ीक़ जो नहीं तुम को
उन्हें बचाओ करें जिन को दूसरे रौशन

उन्हें हुकूमते-ज़ुल्मत अज़ीज़ है शायद
बुझा दिये हैं तभी जो चराग़ थे रौशन

तिरे उजाले भी इक रोज़ ये निगल लेगा
“क़लम संभाल अँधेरे को जो लिखे रौशन”

अजब है दिन भी हमारे सियाह होते हैं
ग़ज़ब है रात तुम्हारी है शाम से रौशन

तुम्हारी याद के लम्हे कुछ इस तरह आयें
कि जैसे फूल खिलें, जैसे हों दिये रौशन

डॉक्टर मुहम्मद आज़म 09827531331

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6 comments on “T-21/31 तुम्हारी याद के होते हैं जब दिये रौशन-डॉक्टर मुहम्मद आज़म

  1. ज़िया में उनकी ही नाम आप का भी चमकेगा
    कि आप जितने चराग़ों को कर गये रौशन
    भरपूर ग़ज़ल ……….वाह…वाह।

    आदरणीय आज़म साहब। बहुत उम्‍दा ग़ज़ल के लिए दाद…दाद और दाद।

  2. Umdaa ghazal ke liye dhero;n daad..waah
    -Kanha

  3. अच्छी ग़ज़ल पेश की है डाक्टर साहब , दाद हाज़िर है

  4. तुम्हारी याद के होते हैं जब दिये रौशन
    तभी ग़ज़ल के भी होते हैं मोजज़े रौशन
    कोई तो कारण होगा जो कोई शायर हुआ !! मैं शायर तो नही मगर ऐ … इसलिये ग़ज़ल मे मोज्ज़े तभी रोशन होंगे तभी 2+2=4 नही कुछ और होगा !! वाह !! आज़म साहब !! सादगी भरा मतला लेकिन दिल से जिगर तक उतरने वाला !!!
    अगरचे बज़्म में हर सू थे क़ुमकुमे रौशन
    तुम्हारे आने से ये और हो गये रौशन
    डब्ल फेज की पावर लाइन है आज़म साहब आपकी ग़ज़ल– और भी रोशन हो गये पहले से आजमाये गये काफिये !!!
    ये कौन गुज़रा है नक़्शे-क़दम हैं ये किस के
    महक रही है हवा भी, हैं रास्ते रौशन
    वो चाँदनी का बदन खुश्बुओं का साया है
    बहुत अज़ीज़ हमें है मगर पराया है –बशीर बद्र
    ज़रूर वही गुज़रा है !!!!!)::
    ज़िया में उनकी ही नाम आप का भी चमकेगा
    कि आप जितने चराग़ों को कर गये रौशन
    बेशक !!! परम्परा है और इरशाद भाई का शेर यहाँ ज़रूर क्वोट करूंगा — मैं चराग़ से जला चराग़ हूँ
    रोशनी है पेश ख़ानदान का –इरशाद ख़ान सिकन्दर
    भले ही नाम हो महताबो-आफ़ताब तो क्या
    कि नाम होगा फ़क़त अच्छे काम से रौशन
    तस्लीम !! वगर्ना बालम ब्रहमचारी जो थे वो 12 बच्चो के बाप थे और नैनसुख नाबीना थे इसलिये what is in a name ??!! काम बोलना चाहिये !!!
    दिये जलाने की तौफ़ीक़ जो नहीं तुम को
    उन्हें बचाओ करें जिन को दूसरे रौशन
    ये तो हम पर फर्ज़ है कि –
    जिन चराग़ो को हवाओ का कोई ख़ौफ़ नही
    उन चरागो को हवाओ से बचाया जाये –निदा
    उन्हें हुकूमते-ज़ुल्मत अज़ीज़ है शायद
    बुझा दिये हैं तभी जो चराग़ थे रौशन
    सिपाहे शाम के नेज़े पे आफताब का सर
    किस एहतिमाम से परवरदिगारे शब निकला –फराज़
    तिरे उजाले भी इक रोज़ ये निगल लेगा
    “क़लम संभाल अँधेरे को जो लिखे रौशन”
    अलग हट कर कहा है– व्यावहारिक है ये विचार !!!
    अजब है दिन भी हमारे सियाह होते हैं
    ग़ज़ब है रात तुम्हारी है शाम से रौशन
    अहले ज़र रात सजाते है तवाइफ की तरह . अपने दिन भी किसी बेवा के बदन जैसे हैं –( शाइर का नाम भूल गया हूँ )
    तुम्हारी याद के लम्हे कुछ इस तरह आयें
    कि जैसे फूल खिलें, जैसे हों दिये रौशन
    क्या सिमिली है !! वाह !!
    डॉक्टर मुहम्मद आज़म साहब मैं जानता हूँ ये ग़ज़ल आपने बायें हाथ से लिखी है क्योंकि आप उस्ताद है !!! बहरहाल आपके बगैर ये नशिस्त गुलज़ार नही हो पाती बहुत बहुत मुबारकबाद –मयंक

  5. अगरचे बज़्म में हर सू थे क़ुमकुमे रौशन
    तुम्हारे आने से ये और हो गये रौशन

    तुम्हारी याद के लम्हे कुछ इस तरह आयें
    कि जैसे फूल खिलें, जैसे हों दिये रौशन

    ये कौन गुज़रा है नक़्शे-क़दम हैं ये किस के
    महक रही है हवा भी, हैं रास्ते रौशन

    आज़म साहब शानदार ग़ज़ल हुई है, बहुत बहुत मुबारकबाद

  6. अगरचे बज़्म में हर सू थे क़ुमकुमे रौशन
    तुम्हारे आने से ये और हो गये रौशन

    ये कौन गुज़रा है नक़्शे-क़दम हैं ये किस के
    महक रही है हवा भी, हैं रास्ते रौशन
    आदरणीय आज़म साहब ,खुबसूरत अशहार हुये हैं |ढेरों दाद कबूल फरमावें |सादर |

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