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T-21/28 न रौशनी थी क़लम में न लफ़्ज़ थे रौशन-आदिक भारती

न रौशनी थी क़लम में न लफ़्ज़ थे रौशन
बग़ैर फ़िक्र भला शेर कब हुए रौशन

ख़ुदा ही जाने ये कब सच को सच दिखायेंगे
ख़ुदा ही जाने कि कब होंगे आइने रौशन

तिरे ख़याल हैं या लपलपाते शोले हैं
कि फिर से बुझते हुए ज़ख़्म हो उठे रौशन

मिली है उसको ही मंज़िल जो अपनी राहों में
ख़ुदा के नाम के करता रहा दिये रौशन

सियासी धूप ने झुलसा दिया वतन अपना
मगर ये कर न सकी तीरा-रास्ते रौशन

तमाम शह्र को भर दूंगा मैं उजालों से
बस इक चिराग़ मुझे लाके दीजिये रौशन

किरन किरन है ग़ज़ल जैसे नूर का पैकर
वरक़ वरक़ पे ज़िया और हाशिये रौशन

आदिक भारती                    09255277788

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5 comments on “T-21/28 न रौशनी थी क़लम में न लफ़्ज़ थे रौशन-आदिक भारती

  1. NAVEEN BHAI
    ग़ज़ल आपको पसंद आयी
    जिस अंदाज़ में आपने ग़ज़ल की प्रशंसा की है
    उस के लिए और
    आपकी बेलौस मुहब्बत के लिए
    आपका तहेदिल से बहुत आभार

    आपने जो क़ाफियों को लेकर वज़ाहत की है
    वो दलील उचित मालूम होती है हालांकि
    उर्दू वाले इस पर राज़ी होंगे ये कहना मुश्किल है
    फिर भी मैं इस दलील से मुत्तफ़िक़ हूँ
    सलामत रहिये

  2. मयङ्क भाई ने उचित प्रश्न उठाया है। उस प्रश्न को थोड़ा सा और विस्तार देना चाहूँगा। यहाँ मेरा मन्तव्य बेशक़ कमेण्ट्स नहीं है। पोर्टल का एडमिन जिन-जिन के पास है वे सभी एक बार ये देखें कि तरही के पर्यटक तरही के बाद नहीं आते। ख़ैर।

    एक दम चुस्त-दुरुस्त ग़ज़ल पेश की है आप ने। और इस से कम की उमीद हम आप से करते भी नहीं। अक्सर कहा जाता है कि अरूज़ के जानकार लोग अच्छी ग़ज़लें नहीं कह पाते मगर इस बात को आप जैसे अदीब झुठलाते रहे हैं। अच्छी ग़ज़ल के लिये दाद हाज़िर है आदिक साहब।

    आप ने मेरी तीसरी ग़ज़ल के बारे में जो प्रश्न किया, वहाँ मैं ने ‘अनासिरे’रौशन’ देवनागरी के लिहाज़ से ही लिया है। जैसा कि मैं इस पोर्टल की किसी एक पहली बहस में भी लिख चुका हूँ – मेरा यह स्पष्ट मानना है कि क़ाफ़ियों में सिर्फ़ उच्चारण ही नहीं, शक्लों की भी अहमियत होती है। मुझे यह जान कर ख़ुशी हुई आप ने भी इस सिद्धान्त पर अपनी सहमति जताई है।

    एक और अच्छी ग़ज़ल के लिये ढेर सारी दाद हाज़िर है आदरणीय।

  3. कभी कभी तबीयत होती है अपने घर को आग लगा दूँ !! इस गज़ल पर अभी तक कमेण्ट नहीआये !! और उनके भी नहीं आये जो इस पोर्टल की ज़ीनत हैं उनको तो पबन्दी से इस ख़ला को अब तलक भर देना चाहिये था !!! सभी दोस्तो से मेरी गुज़ारिश है कि अच्छा शेर कहना ही अदब के लिये पर्याप्त नही है अच्छे शेर को भी अच्छा कहना बेहद ज़रूरी है !!! अगर सभी अपनी अना के हिसार मे महदूद रहेंगे तो क्या ख़ाक रौशन होंगे हर जगह दूद दूद दूद ही रहेंगे !! बहरहाल आदिक साहब !! आपके आने से जितनी खुशी मुझे मिलती है मैं बयान नहीं कर सकता !!!!
    न रौशनी थी क़लम में न लफ़्ज़ थे रौशन
    बग़ैर फ़िक्र भला शेर कब हुए रौशन
    यही फ़िक्र का तार तो उजाले लाता है कलम मे कलाम मे !! फ़िक्र का वसीला गमे दौराम हो या गमे जानाँ क्या फर्क पडता है –नशा शराब मे होता तो नाचती बोतल –इसलिये फ़िक्र ही अस्ल ईन्धन है शाइरी का !!!!
    ख़ुदा ही जाने ये कब सच को सच दिखायेंगे
    ख़ुदा ही जाने कि कब होंगे आइने रौशन
    अरे मालिक!! क्यों मेरा धन्धा चौपट करवा रहे हैं –मेरी दूकान ही सियाह आइनो की है जिनकी सिफत ही ये है कि आप जैसी चाहें वैसी शक़्ल ये आइने आपको दिखा सकते हैं !! लेकिन आपके शेर ने तो बिज़नेस पर ही प्रहार कर दिया –ये रौशन आइने वाला ख़याल मेरी दुक्कान के खिलाफ साज़िश है !! हा हा हा हा !!मज़ाक दर्किनार कर शेर पर यही कहना है कि — आदिक साहब !! बेहद बारीक पैरहन का ये शेर बेहद कारगर है !! एक बडी सामाजिक विडम्बना पर प्रहारी संकेतक है !! वाह वाह !!
    तिरे ख़याल हैं या लपलपाते शोले हैं
    कि फिर से बुझते हुए ज़ख़्म हो उठे रौशन
    पसमंज़र मे कौन है जिसका ज़िक्र है शेर मे आदिक साहब !! कोई बहुत अपना होगा यकीनन !!!
    मिली है उसको ही मंज़िल जो अपनी राहों में
    ख़ुदा के नाम के करता रहा दिये रौशन
    अपनी रहगुज़र आवारगी की रहगुज़र है जो मुझे अपने दश्त मे हर सम्त हासिल है और अपनी मंज़िल भी आवारगी है जो मुझे हर लम्हा हासिल है !! मैने भी ईशवर को हर लम्हा याद रखने की कोशिश की है और मुझे भी कदम कदम पर चराग़ाँ का अहसास हुआ है !!!ये शेर तो आपने मेरे लिये ही कहा है !!):
    सियासी धूप ने झुलसा दिया वतन अपना
    मगर ये कर न सकी तीरा-रास्ते रौशन
    फलक है सुर्ख़ मगर आफताब काला है
    अन्धेरा है कि मेरे शहर मे उजाला है ??!!!!
    बडे इम्कान थे इंकलाब के लेकिन हर बार यही सियासी धूप सब खा गई !!!
    तमाम शह्र को भर दूंगा मैं उजालों से
    बस इक चिराग़ मुझे लाके दीजिये रौशन
    दिल जलाओ मालिक और कहीं से कोई गुंजाइश नहीं है !! वैसे मुश्किल काम है ये क्योंकि पहले कभी भी ऐसी मुख़ालिफ हवा नहीं थी!!!
    किरन किरन है ग़ज़ल जैसे नूर का पैकर
    वरक़ वरक़ पे ज़िया और हाशिये रौशन
    इस अंतिम शेर मे आपने अपनी गज़ल पर खुद बयान दे दिया !!!
    आदिक भारती साहब !!! वक़्त सारी ज़िन्दगी मे दो ही गुज़रे हैं कठिन –इक तेरे आने से पहले इक तेरे जाने के बाद !! इसलिये आपकी आमद यहाँ ज़रूरी है !!! हमारी ख़ातिर !! सादर –मयंक

    • MAYANK BHAI….
      शायर जब ग़ज़ल कहता है तो इस उम्मीद में कि
      एक अच्छा समझने वाला श्रोता मिल जाए तो
      सौ नाअह्ल से बेहतर है
      इतने दिन ग़ज़ल कोई न पढ़े तो शायर अपनी
      ग़ज़ल हटा लेता है लेकिन यहाँ तो ये आज़ादी भी नहीं है
      हा हा हा हा
      ख़ैर….
      आपने जिस तफ़सील से ग़ज़ल को नवाज़ा है
      उसके लिए दिल की अमीक़ गहराइयों से आपका शुक्रिया
      हार्दिक आभार

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