4 टिप्पणियाँ

T-21/27 दिये ख़ुलूस के जब हमने कर दिये रौशन-‘शरीफ़’ अंसारी

दिये ख़ुलूस के जब हमने कर दिये रौशन
तो हो गये हैं दिलो-जां के हाशिये रौशन

बहुत हसीन है ये तर्ज़े-ज़िन्दगी लेकिन
हुए न फिर भी मुहब्बत के दायरे रौशन

मिरी निगाह में रंगत तिरी निगाह की है
मिरा ख़याल है तेरे ख़याल से रौशन

अब इससे क्या कि ग़रीबों के घर चराग़ नहीं
घर-आँगन आपके अपने तो हो गये रौशन

ये माँ की गोद नहीं दर्सगाहे-फ़ितरत है
यहीं से होते हैं दुनिया के मरहले रौशन

अजब नहीं कि ज़माने में इंक़लाब आये
अगर हैं दिल में तिरे जोशो-वलवले रौशन

बनेगी बात न ग़ैरों की ऐबजूई से
मिज़ाजो-फ़िक्र को अपने भी कीजिये रौशन

ये अश्के-ग़म नहीं तुह्फ़े हैं तेरी यादों के
शबे-फ़िराक़ हैं आँखों में क़ुमक़ुमे रौशन

वफ़ा की राह में सजदे बिछा के हमने ‘शरीफ़’
किये हैं इश्क़ो-मुहब्बत के तजरूबे रौशन

‘शरीफ़’ अंसारी 09827965460

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4 comments on “T-21/27 दिये ख़ुलूस के जब हमने कर दिये रौशन-‘शरीफ़’ अंसारी

  1. दिलोदिमाग़ को काम पर लगाती हुई बढ़िया ग़ज़ल के लिये दाद हाज़िर है जनाब।

  2. ये अश्के-ग़म नहीं तुह्फ़े हैं तेरी यादों के
    शबे-फ़िराक़ हैं आँखों में क़ुमक़ुमे रौशन..kya hi achha sher hai waahh
    bharpoor gazal …waahh waahh

    dili daad qubule karen

  3. दिये ख़ुलूस के जब हमने कर दिये रौशन
    तो हो गये हैं दिलो-जां के हाशिये रौशन
    कुण्डलिनी जागरण के विशेषज्ञ बताते हैं कि मनुष्य की ऊर्जा सुषुम्ना के चक्रों तक उठती है !! जिनकी ऊर्जा मूलाधार तक ही सीमित है वो महज काम क्रोध लोभ और मोह मे अपना जीवन व्यतीत करते है –इसके बाद मणिपूर और स्वाति आज्ञा चक्र वगैरह हैं जिन तक जिनकी ऊर्जा है वो दया क्षमा करुणा जैसे मानवीय गुणो के उत्सर्जक और पोषक होते हैं और साहित्य संगीत कला जैसे विषयों का उत्थान करते हैं !! ख़ुलूस का चराग़ उसी व्यक्ति मे रौशन हो सकता है जिस्मे उच्च मानवीय मूल्य हों और इसके बाद दिलो जान के गैर आबाद हल्कों तक आपकी चेतना की रसाई हो सकती है –इसलिये ये मतला अदब के लिहाज से ही नहीं तर्क और तंत्र के ज़ाविये से भी एकदम दुरुस्त है और क्यों न हो ये उस शायर के ग़ज़ल का मतला है जिनके हर इक शेर ने मुझे दाँतों तले उंगलियाँ दबाने को बार बार विवश किया है !!!!
    बहुत हसीन है ये तर्ज़े-ज़िन्दगी लेकिन
    हुए न फिर भी मुहब्बत के दायरे रौशन
    मुहब्बत मेरे देखे मालिक की मेहर है !! इंसानी पैकर की कुव्वत इसे अर्जित करने की क्षमता खुद की कोशिशों से रखती है या नहीं –ये एक बेहद दिल्चस्प सवाल है !! पुरानी कहन पर आस्था रखना उचित है कि इश्क किया नहीं जाता हो जाता है और बेशक ये तर्ज़ ए ज़िन्दगी बहुत हसीन है लेकिन हमारी कोशिशों से मुहब्बत के दायरे रौशन हो ये ज़रूरी नहीं !!!
    मिरी निगाह में रंगत तिरी निगाह की है
    मिरा ख़याल है तेरे ख़याल से रौशन
    शेर मे समर्पण है और ईश्वरत्व पर पूर्ण समर्पण का भाव है –शम्मे हरम हो या हो दिया सोमनाथ का सभी मे उसी के करम से नूर झमकता है !! प्रस्ंगवश यह भी सहीएह है कि दीवाने मुहब्बत का नाम खुदा रखते हैं !!
    अब इससे क्या कि ग़रीबों के घर चराग़ नहीं
    घर-आँगन आपके अपने तो हो गये रौशन
    अब तलक सुर्ख़ और सियह सदियों के साये के तले
    आदम और हव्वा की संतान पे क्या गुज़री है –इस सच को शायरों से बेहतर कौन बयाँ कर सकता है !!!
    ये माँ की गोद नहीं दर्सगाहे-फ़ितरत है
    यहीं से होते हैं दुनिया के मरहले रौशन
    वाह वाह शरीफ़ अंसारी साहब !! वाह वाह !! माम के लिये कहे गये अशआर के सरमाये मे इज़ाफा हुआ – माँ के पानों के नीचे जन्नत है –माँ की आँखे आइना हैं और मँ की गोद दर्सगाहे -फितरत है !!!
    अजब नहीं कि ज़माने में इंक़लाब आये
    अगर हैं दिल में तिरे जोशो-वलवले रौशन
    लहू मे शरार हो तो इंकलाब की इब्तिदा से इंकार नहीं किया जा सकता !!! आपको ज़हेर काश्मीरी के दो शेर सुनाता हूँ — लौहे मज़ार देख के दिल दंग रह गया
    हर सिर के साथ एक फकत संग रह गया
    कितने ही इंकलाब शिकन दर शिकन मिले
    कल अपनी शक्ल देख के मैं दंग रह गया
    अपने गले मे अपनी ही बाँहों को डालिये
    जीने का अब तो सिर्फ यही ढंग रह गया
    बनेगी बात न ग़ैरों की ऐबजूई से
    मिज़ाजो-फ़िक्र को अपने भी कीजिये रौशन
    किसी को ख़ारिज करना आपका अरूज़ नहीं – अपने मिजाज़ो –फिक्र भी रौशन होने चाहिये वाह वाह !! तस्लीम !!
    ये अश्के-ग़म नहीं तुह्फ़े हैं तेरी यादों के
    शबे-फ़िराक़ हैं आँखों में क़ुमक़ुमे रौशन
    बहुत उम्दा सिमिली है सानी मिसरे मे !!
    वफ़ा की राह में सजदे बिछा के हमने ‘शरीफ़’
    किये हैं इश्क़ो-मुहब्बत के तजरूबे रौशन
    ‘शरीफ़’ अंसारी साहब !! –इस ताज़ातरीन गुलदस्ते की खुश्बू से दिलो जेहन मुआत्तर था , है और रहेगा –आपके कलम को सलाम !!! – मुझे इस ग़ज़ल का इंतज़ार भी था !! –मयंक

  4. ये माँ की गोद नहीं दर्सगाहे-फ़ितरत है
    यहीं से होते हैं दुनिया के मरहले रौशन

    अजब नहीं कि ज़माने में इंक़लाब आये
    अगर हैं दिल में तिरे जोशो-वलवले रौशन
    आदरणीय शरीफ़ साहब ढेरों दाद कबूल फरमावें |

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