8 टिप्पणियाँ

T-21/26 हमारी फ़िक्र के होते हैं जब दिये रौशन-‘शफ़ीक़’ रायपुरी

हमारी फ़िक्र के होते हैं जब दिये रौशन
तो होने लगते हैं ग़ज़लों के सिलसिले रौशन

मिरे रसूल का साया तलाश कर न सके
ये आफ़ताब, सितारे, क़मर, दिये रौशन

यही तो बात उसे नागवार लगती है
मिरा चराग़ है तूफ़ाँ के सामने रौशन

ख़मोशियों के अंधेरों में थे उयूब निहां
खुले जो लब तो ज़माने पे हो गये रौशन

अँधेरी शब के सफ़र में था रौशनी का जुलूस
तिरे नुक़ूशे-क़दम से थे रास्ते रौशन

यही तो है तिरे ज़िक्रे-जमील का परतौ
हमारे घर के अँधेरे भी हो गये रौशन

चमक की आस लिये हर कोई क़तार में है
अब उसकी मर्ज़ी है चाहे जिसे करे रौशन

निशातो-ऐश की महफ़िल सजा गये ‘ग़ालिब’
क़ुलूबे-क़ौम को इक़बाल कर गये रौशन

ग़ज़ल है कैसी तिरी तब्सरे बतायेंगे
‘शफ़ीक़’ मत्न को करते हैं हाशिये रौशन

‘शफ़ीक़’ रायपुरी                                   09406078694

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8 comments on “T-21/26 हमारी फ़िक्र के होते हैं जब दिये रौशन-‘शफ़ीक़’ रायपुरी

  1. शफ़ीक़ साहब मयङ्क साहब ने बजा फ़रमाया, आप की ग़ज़ल पढ़ने का इन्तज़ार रहता है

  2. हमारी फ़िक्र के होते हैं जब दिये रौशन
    तो होने लगते हैं ग़ज़लों के सिलसिले रौशन
    बेशक !! हम गवाह है रोशनी के इस दयार के !! अर्से से !!
    मिरे रसूल का साया तलाश कर न सके
    ये आफ़ताब, सितारे, क़मर, दिये रौशन
    बहुत खूब !! ये एक शेर पूरे नातिया बयान की क्षमता रखता है !!!
    यही तो बात उसे नागवार लगती है
    मिरा चराग़ है तूफ़ाँ के सामने रौशन
    हसद भी बेहद तंग आसरे मे अपना घर तलाश लेती है लेकिन यहाँ तो –जलने वाले के लिये स्म्पूर्ण कारन मौजूद है !!! किसी का चराग़ तूफान मे रौशन रहे तो रकीबों के दिल पे क्या गुज़रती होगी !!
    ख़मोशियों के अंधेरों में थे उयूब निहां
    खुले जो लब तो ज़माने पे हो गये रौशन
    नज़र नवाज़ नज़ारा बदल न जाये कही
    ज़रा सी बात है मुँह से निकल न जाये कहीं –दुष्यंत कुमार
    अँधेरी शब के सफ़र में था रौशनी का जुलूस
    तिरे नुक़ूशे-क़दम से थे रास्ते रौशन
    यही तो है तिरे ज़िक्रे-जमील का परतौ
    हमारे घर के अँधेरे भी हो गये रौशन
    दोनो ऊपर के शेर हज़रत मुहम्मद साहब के काबील और उसकी शहादतो की नुमाइन्दगी करते हैं और ग़ज़ल के सरमाये मे इज़ाफा करते हैं !!!
    चमक की आस लिये हर कोई क़तार में है
    अब उसकी मर्ज़ी है चाहे जिसे करे रौशन
    कब इल्तिफात हो साक़ी का और किस पर हो
    कि मुंतज़िर हैं सभी के गिलास महफिल में
    हम एक ख्वाब हैं बेदारे चश्मे साकी के
    कोई न जान सका रूशनास महफिल मे
    निशातो-ऐश की महफ़िल सजा गये ‘ग़ालिब’
    क़ुलूबे-क़ौम को इक़बाल कर गये रौशन
    सानी मिसरे से पूर्णत: सहमत हूँ –लेकिन अव्वल से नही !!! इश्क था फ़ितनागर व सरकश व चालाक मेरा ।
    आसमान चीर गया नाला-ए-बेबाक मेरा ।

    पीर ए गरदू ने कहा सुन के, कहीं है कोई
    बोले सयादे, रस अर्श बर ईँ है कोई ।
    चाँद कहता था नहीं अहल-ए-ज़मीं है कोई ।
    कहकशाँ कहती थी पोशीदा यहीं है कोई ।

    कुछ जो समझा मेरे शकू-ए-कू तो रिज़्वान समझा ।
    मुझे जन्नत से निकाला हुआ इंसान समझा ।

    थी फ़रिश्तों को भी ये हैरत कि ये आवाज़ क्या है?
    अर्श डालों पे भी खिलता नहीं ये राज़ क्या है?
    क़दर शोख के अल्लाह से भी बरहम है ।
    था जो मस्जूद मलाएक ये वही आदम है
    इस आलिम ए गैर है सामां ए रूजे कम है ।
    हाँ मगर अजीज़ के असरार से मरहम है ।(इकबाल)
    लेकिन ग़ालिब के बारे मे !! निशातो ऐश का दायरा मुख्तसर दलील है इनका एक और भी किरदार है जिसने वो सवाल भी पूछे हैं जिनको और कोई पूछने की हिम्मत नही कर सका !! मैं आहट दे रहा हूँ — माना कि इक बुज़ुर्ग हमें हम्सफर मिले !!!
    हम भी क्या याद करेंगे कि खुदा रखते थे !!!
    काब मेरे पीछे है कलीसा मेरे आगे !!!
    इब्ने मरियम हुआ करें कोई !!
    और कुछ जो बेहद मस्लहत के साथ कहा गया है — जब कि तुझ बिन नहीं कोई मौजूद
    तो फिर ये हंगामा ए खुदा क्या है !!!
    लिहाजा शफ़ीक़ साहब !! माजरत!! ग़ालिब का कैंवास बहुत बडा है !!
    ग़ज़ल है कैसी तिरी तब्सरे बतायेंगे
    ‘शफ़ीक़’ मत्न को करते हैं हाशिये रौशन
    ‘शफ़ीक़’ रायपुरी साहब !! आपका शायर और आपका कलम तब्सरे और तनकीद से ऊपर की शै है !! आपको हम बहुत बहुत बहुत प्सन्द करते हैं और आपकी ग़ज़ल इस पोर्तल की ज़ीनत होती है !!! ग़ालिब और इकबाल के शेर मे हम वैचारिकता को व्रहत्तर आयाम दे सकते हैं इसलिये बयान क्वोट किया गया है !! –इस ग़ज़ल के लिये पूरी दाद !!! –मयंक

    • MAYANK SAHAB ! HAMARI GHAZAL KO TO AAP HI RAUSHAN KARTE HAI’N. SAHI MAANO ME’N AAP KA TABSIRA PADHNE KE BAAD HI HAME’N APNI GHAZAL KA MEYAAR PATA CHALTA HAI. AAP KA IZHAAR-E-KHAYAAL MUNFARID HOTA HAI. GHAZAL PAR BELAAG IZHAAR-E-KHAYAAL KE LIYE BAHUT BAHUT SHUKRIYA. ”आपको हम बहुत बहुत बहुत प्सन्द करते हैं और आपकी ग़ज़ल इस पोर्तल की ज़ीनत होती है” IS JUMLE SE AAP NE JO IZZAT-AFZAAYI KI HAI US KE LIYE BHI MAMNOON HU’N. ग़ालिब का कैंवास बहुत बडा है !! IS SACH SE KAUN INKAAR KAR SAKTA HAI MUHTARAM, IS HAQEEQAT KA HAME’N BHI ETIRAAF HAI.

      MISAAL MILTI NAHI’N HAI KALAAM JAISA HAI ADAB ME’N RUTBA-E-”GHAALIB” IMAAM JAISA HAI

      ADAB ME’N BAZM-E-TASAWWUF SAJA GAYE ”GHALIB”
      HUWE HAI’N UN SE MUHABBAT KE MAIKADE RAUSHAN

  3. यही तो बात उसे नागवार लगती है
    मिरा चराग़ है तूफ़ाँ के सामने रौशन

    ख़मोशियों के अंधेरों में थे उयूब निहां
    खुले जो लब तो ज़माने पे हो गये रौशन
    आदरणीय शफ़ीक़ साहब नायाब अशहार हुये हैं ,ढेरों दाद कबूल फरमावें |सादर

  4. Bahut khubsurat gazal hui.daad kubul kijiye

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