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T-21/23 मुझे भी करने है जज़्बों के क़ुमक़ुमे रौशन-अहमद ‘सोज़’-1

मुझे भी करने है जज़्बों के क़ुमक़ुमे रौशन
मैं करने आया हूँ मंज़र निगाह के रौशन

उस एक लम्हे का कब से है इंतज़ार मुझे
वो एक लम्हा जो दुनिया मिरी करे रौशन

भटक रही है अंधेरों में ज़िन्दगी मेरी
तिरे बग़ैर तो रस्ते न हो सके रौशन

क़रीब पहुंचा जब उनके बहुत अँधेरा था
जो लोग दूर से लगते रहे मुझे रौशन

ये मांद-मांद उजाला ये जलती-बुझती लौ
किये है किसने ये टूटे हुए दिये रौशन

नया ज़माना है आंधी से ये नहीं डरता
हवा के सामने भी बल्ब हो गये रौशन

तसव्वुरात के घोड़ों पे कस लगाम ज़रा
‘क़लम संभाल अँधेरे को जो लिखे रौशन’

तमाम उम्र अंधेरों ने घेर रक्खा ‘सोज़’
तमाम उम्र मिरे हौसले रहे रौशन

अहमद ‘सोज़’ 09867220699

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4 comments on “T-21/23 मुझे भी करने है जज़्बों के क़ुमक़ुमे रौशन-अहमद ‘सोज़’-1

  1. सोज़ साहब बढ़िया ग़ज़ल के लिये दाद हाज़िर है

  2. Bahut khoob Soz sahab.umda gazal.
    Sadar
    Pooja Bhatiya

  3. wah wah wah, kya kehne Ahmed Soz Sahab, kamaal ki ghazal kahi hai aapne, jitni daad dun kam hai

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