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T-21/20 हवा के चेहरे पे छींटे हैं ख़ून के रौशन-सौरभ शेखर

हवा के चेहरे पे छींटे हैं ख़ून के रौशन
हवा चबाती हुई आयी है दिये रौशन

वहां तो नूर निगाहों का काम आता है
किसे मिले हैं भला बन के रास्ते रौशन

हमारे क़ुर्ब से ऐ जलने वाले ख़ुश हो जा
हमारे बीच के हैं देख फ़ासले रौशन

कमाल ये है कि सालिम नहीं अँधेरा भी
सियाह शब है कहीं पर, कहीं लगे रौशन

हम एक काम तो कर सकते हैं अँधेरे का
निकाल सकते हैं कुछ इससे तजरुबे रौशन

मुआमले में ज़रा सा मैं घर के जिद्दी हूँ
ठिकाना चाहिये हर हाल में मुझे रौशन

इसी घड़ी का उन्हें इंतज़ार था जैसे
गिरी सिपर जो मिरी तेग़ हो गये रौशन

ख़याल, ख्व़ाब, तसव्वुर समेट ला ‘सौरभ’
“क़लम संभाल अँधेरे को जो लिखे रौशन”.

सौरभ शेखर 09873866653

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16 comments on “T-21/20 हवा के चेहरे पे छींटे हैं ख़ून के रौशन-सौरभ शेखर

  1. हम एक काम तो कर सकते हैं अँधेरे का
    निकाल सकते हैं कुछ इससे तजरुबे रौशन…..bahut khoob sher hue hain bhai

  2. Matla aur
    कमाल ये है कि सालिम नहीं अँधेरा भी
    सियाह शब है कहीं पर, कहीं लगे रौशन is she’r ke to kya kehne bhaiya..tamaam ghazal behad umdaa..waah ..sadar
    _kanha

  3. ख़याल की परवाज़, ज़बान की आसानी और बयान तीनों ही लिहाज़ से कमाल दिखाती है यह ग़ज़ल। ढेरों दाद हाज़िर हैं। ख़ुश रहिये।

  4. कमाल ये है कि सालिम नहीं अँधेरा भी
    सियाह शब है कहीं पर, कहीं लगे रौशन

    हम एक काम तो कर सकते हैं अँधेरे का
    निकाल सकते हैं कुछ इससे तजरुबे रौशन
    सौरभ साहब ,उम्दा ग़ज़ल हुई है |बधाई स्वीकार करें |

  5. हवा के चेहरे पे छींटे हैं ख़ून के रौशन
    हवा चबाती हुई आयी है दिये रौशन

    कमाल ये है कि सालिम नहीं अँधेरा भी
    सियाह शब है कहीं पर, कहीं लगे रौशन

    कमाल की ग़ज़ल हुई. है भैय्या, कई नये जाविए नज़र आए इस ग़ज़ल में , यही इस ग़ज़ल की कामयाबी है, वाह मज़ा आ गया

  6. हम एक काम तो कर सकते हैं अँधेरे का
    निकाल सकते हैं कुछ इससे तजरुबे रौशन

    मुआमले में ज़रा सा मैं घर के जिद्दी हूँ
    ठिकाना चाहिये हर हाल में मुझे रौशन

    kya kahne bhaiya Laazwaab gazal…matla bhi behad pasand aaya
    dili mubarakbaad

    regards

  7. हवा के चेहरे पे छींटे हैं ख़ून के रौशन
    हवा चबाती हुई आयी है दिये रौशन
    सौरभ जितने भी मतले इस ज़मीन पर अभी तक पढ़े हैं उनमे से मेरी पहली पसंद अब आपका मतला है!! मुझे भयावहता से भय लगता है –लेकिन जब वो दर हकीकत हो तब उसमे झाँकना पडता ही है और आप तो यार !! लहू के रंग से कैसी भी तस्वीर बना लेते हो गुलाबी, नीली ज़र्द कैसी भी !! अब समकालीन पेशावरी हवा हो या सर्वकालीं अजल की हवा हो ये शेर बहुत खूब है !!
    वहां तो नूर निगाहों का काम आता है
    किसे मिले हैं भला बन के रास्ते रौशन
    And there is no short-cut in the forest of life !!
    हमारे क़ुर्ब से ऐ जलने वाले ख़ुश हो जा
    हमारे बीच के हैं देख फ़ासले रौशन
    एक शेर शिकेब का है –
    तूने कहा न था कि मैं कश्ती पे बोझ हूं
    अब मुंह उधर न ढांप मुझे डूबते भी देख – शिकेब
    वैसा ही उपालंभ आपके शेर मे भी है !!
    कमाल ये है कि सालिम नहीं अँधेरा भी
    सियाह शब है कहीं पर, कहीं लगे रौशन
    अहले-ज़र रात सजाते है तवाइफ़ की तरह
    अपने दिन भी किसी बेवा के बदन जैसे हैं ( शायर का नाम भूल गया हूं लेकिन शेर याद है अभी तक)
    हम एक काम तो कर सकते हैं अँधेरे का
    निकाल सकते हैं कुछ इससे तजरुबे रौशन
    वाह वाह !!! सानी मिसरा तो लाजबाव गिरह बनता तरही मिसरे पर !!
    निकाल सकता है कुछ इससे तजरुबे रौशन
    कलम सम्हाल अँधेरे को लिखे रौशन (??!!)
    मुआमले में ज़रा सा मैं घर के जिद्दी हूँ
    ठिकाना चाहिये हर हाल में मुझे रौशन
    घर चरागे -ख़ुलूस पर फूंक मारने वाले बहुत होते हैं क्या किया जाए !!
    ख़याल, ख्व़ाब, तसव्वुर समेट ला ‘सौरभ’
    “क़लम संभाल अँधेरे को जो लिखे रौशन”.
    अच्छा कहा है !!! सौरभ हमेशा की तरह बहुत उम्दा बयान –बधाई –मयंक

    • भैया आपकी टिप्पणी के लिए शुक्रिया का कोई भी लफ्ज़ अदना है. बस हार्दिक आदर!

  8. बहुत अच्छी गज़ल
    दाद कुबूल फरमाइए

    सादर
    इमरान

  9. कमाल ये है कि सालिम नहीं अंधेरा भी…

    वाह…बहुत ख़ूब सौरभ भाई.
    ख़ूबसूरत ग़ज़ल के लिये बधाई !

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