4 टिप्पणियाँ

T-21/17 फ़लक ने रोज़ किये अनगिनत दिये रौशन-असरार उल हक़ ‘असरार’

फ़लक ने रोज़ किये अनगिनत दिये रौशन
मुक़द्दरों के अँधेरे न हो सके रौशन

अगर पढ़ें भी तो कैसे पढ़ें किताबे-हयात
इबारतों में चमक है न हाशिये रौशन

वो कैसे लोग थे जो ग़र्क़े-तीरगी हो कर
हज़ारों राहगुज़र दिल की कर गये रौशन

दिलों के ज़ख़्म ही शायद दिलों की ज़ीनत हैं
बग़ैर अक्स न होते ये आइने रौशन

न तीरगी में लगा दिल न रौशनी से निभी
बहुत चराग़ बुझाये बहुत किये रौशन

ख़ुशा ऐ दिल कि है नज़दीक मंज़िले-जानां
हुए हैं ताज़ा जो पैरों के आबले रौशन

ग़ज़ल ग़ज़ल नहीं होती जो तू न हो शामिल
तिरे ही ज़िक्र से होते हैं क़ाफ़िये रौशन

इन आँधियों का गिला हो हमें तो क्यूँकर हो
वही दिये तो बुझाये हैं जो कि थे रौशन

हुजूम लाख अंधेरों के हैं घरोंदों में
ये कम नहीं हैं कि सारे हैं मक़बरे रौशन

कहाँ तलाश करे कोई ख़ुद को ऐ ‘असरार’
कोई चराग़ है घर में न रास्ते रौशन

असरार उल हक़ ‘असरार’ 09410274896

Advertisements

About Lafz Admin

Lafzgroup.com

4 comments on “T-21/17 फ़लक ने रोज़ किये अनगिनत दिये रौशन-असरार उल हक़ ‘असरार’

  1. मयङ्क साहब ने बजा फ़रमाया कि इस ग़ज़ल का एक-एक हर्फ़ क़ीमती है। तरही के एक स्वाभाविक लक्षण की तरह आप की ग़ज़ल का थर्ड-लास्ट शेर अपने मफ़हूम के ज़रीए मेरी तीसरी ग़ज़ल में भी है। आप की ग़ज़ल पहले आई मगर मैं ने आज पढ़ी। मेरी ग़ज़ल बाद में यानि कल पोस्ट हुई है। उस ख़याल पर ख़ुसूसन दाद। आप की जानिब से एक और शानदार, असरदार बयान।

  2. दिलों के ज़ख़्म ही शायद दिलों की ज़ीनत हैं
    बग़ैर अक्स न होते ये आइने रौशन
    असरार साहब अच्छी ग़ज़ल हुई है |ढेरों दाद कबूल फरमावें |

  3. न तीरगी में लगा दिल न रौशनी से निभी
    बहुत चराग़ बुझाये बहुत किये रौशन

    वो कैसे लोग थे जो ग़र्क़े-तीरगी हो कर
    हज़ारों राहगुज़र दिल की कर गये रौशन

    असरार साहब क्या ही अच्छी ग़ज़ल हुई है,
    भरपूर कलाम, मुबारकबाद कुबूल फ़रमाएँ

  4. फ़लक ने रोज़ किये अनगिनत दिये रौशन
    मुक़द्दरों के अँधेरे न हो सके रौशन
    जी साहब !! तसलीम !!
    हरिक मोड पे चाँद सूरज टंगे हैं
    ज़रूरत हमें फिर भी है रोशनी की –राजेन्द्र तिवारी कानपुर
    और फिराक भी कह गए –
    हज़ारो खिज्र पैदा कर चुकी है नस्ल आदम की
    ये सब तसलीम लेकिन आदमी अब भी भटकता है !!!
    लेकिन , आपके मतले का कायनाती मंज़र बेहतरीन है !!
    अगर पढ़ें भी तो कैसे पढ़ें किताबे-हयात
    इबारतों में चमक है न हाशिये रौशन
    मेरा अहसास तो ये है कि जब मेरे लहू मे शरार था और आंखों मे बीनाई तब मुझे किताबे हयात की तहरीर बड़ी ताबिन्दा दीखती थी !! अब अहसास जुदा है पहले से !!!
    वो कैसे लोग थे जो ग़र्क़े-तीरगी हो कर
    हज़ारों राहगुज़र दिल की कर गये रौशन
    वो मोमिन थे !! अब काफिरो की सल्तनत है !!
    दिलों के ज़ख़्म ही शायद दिलों की ज़ीनत हैं
    बग़ैर अक्स न होते ये आइने रौशन
    साहब कमाल किया है आपने !!
    न तीरगी में लगा दिल न रौशनी से निभी
    बहुत चराग़ बुझाये बहुत किये रौशन
    अचकचा दिया इस शेर ने कि क्या लिखूं !! लेकिन ये हम सबके साथ होता है !! हम रिश्ते बनाते हैं मरासिम शाल करते हैं रहने की जगह बदलते हैं परिवर्तनों के दौर से गुजारने के बावजूद जो भीतर का खला है वो भरता ही नहीं !! बहुत खूब शेर कहा है आपने !!
    इन आँधियों का गिला हो हमें तो क्यूँकर हो
    वही दिये तो बुझाये हैं जो कि थे रौशन
    गिरते हैं शहसवार ही मैदाने जंग मे !!!
    हुजूम लाख अंधेरों के हैं घरोंदों में
    ये कम नहीं हैं कि सारे हैं मक़बरे रौशन
    आखिर गज़ल का ताजमहल भी है मकबरा
    जो ज़िंदगी थी उसको किसी ने जिया नहीं –बशीर बद्र
    कहाँ तलाश करे कोई ख़ुद को ऐ ‘असरार’
    कोई चराग़ है घर में न रास्ते रौशन
    असरार उल हक़ ‘असरार’ साहब एक इक हर्फ कीमती है इस गज़ल का –मयंक

Your Opinion is counted, please express yourself about this post. If not a registered member, only type your name in the space provided below comment box - do not type ur email id or web address.

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s

%d bloggers like this: