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T-21/16 तिरे ही नूर से धरती प हैं दिये रौशन-अभय कुमार ‘अभय’

तिरे ही नूर से धरती प हैं दिये रौशन
तिरे ही नूर से शम्सो-क़मर हुए रौशन

हुए हयात के कब सारे ज़ाविये रौशन
कि रात-दिन के हुए जैसे सिलसिले रौशन

अजीब शख़्स से पाला पड़ा है क्या कीजे
कि उसका क़ुर्ब ही रौशन न फ़ासले रौशन

मसर्रतों के उजाले न रास आये तो क्या
हुजूमे-ग़म से हुए मेरे क़हक़हे रौशन

उन्हीं के नीचे अंधेरों की परवरिश होगी
जहां ग़ुरूर से करते हो तुम दिये रौशन

तिरी चमक से चमकता है फ़िक्र का सूरज
जहाँ में शेरो-अदब के हैं फ़लसफ़े रौशन

हमें न भाये उजाले कभी दिखावे के
हमारे चेहरे तो किरदार ने किये रौशन

घने अँधेरे मुसल्लत रहे सदा मुझ पर
बस एक ख़ाब तुम्हारे थे जो रहे रौशन

शऊरो-फ़िक्र का महताब यूँ बुझा अबके
कि आफ़ताब भी शायद न कर सके रौशन

उसी निगाह की है जुस्तजू ‘अभय’ को भी
कि जिस निगाह से होते हैं फ़ैसले रौशन

अभय कुमार ‘अभय’ 08171611298

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7 comments on “T-21/16 तिरे ही नूर से धरती प हैं दिये रौशन-अभय कुमार ‘अभय’

  1. बढ़िया ग़ज़ल, सेकण्ड-लास्ट शेर समय का सच है। दाद हाज़िर है।

  2. अजीब शख़्स से पाला पड़ा है क्या कीजे
    कि उसका क़ुर्ब ही रौशन न फ़ासले रौशन

    तिरी चमक से चमकता है फ़िक्र का सूरज
    जहाँ में शेरो-अदब के हैं फ़लसफ़े रौशन
    अभय साहब ,खुबसूरत ग़ज़ल हुई है |दाद हाज़िर है |सादर |

  3. उन्हीं के नीचे अंधेरों की परवरिश होगी
    जहां ग़ुरूर से करते हो तुम दिये रौशन

    ईमानदारी से कहूँ तो इससे सच्चा शेर इस तेजी में मैंने नहीं पढ़ा, बहुत देर तक साथ रहेगा आपका ये शेर

    शुक्रिया

    दिनेश

  4. सिर्फ एक रदीफ “रौशन” मोतबर शायर के दिलो जेहन से कितना लहू खींच लेती है कि मुरस्सा गज़ल का चराग रौशन क्या दमक रहा है !!!
    तिरे ही नूर से धरती प हैं दिये रौशन
    तिरे ही नूर से शम्सो-क़मर हुए रौशन
    इस मतले को शम्मे हरम हो या हो दिया सोमनाथ का .. के समतुल्य रखिये !!
    हुए हयात के कब सारे ज़ाविये रौशन
    कि रात-दिन के हुए जैसे सिलसिले रौशन
    अव्वल मिसरे का सवाल मुकम्मल है और खुद उसी मे उसकी तशरीह भी पिन्हा है !!!
    अजीब शख़्स से पाला पड़ा है क्या कीजे
    कि उसका क़ुर्ब ही रौशन न फ़ासले रौशन
    कमाल है कमाल है क्या ज़बरदस्त शेर कहा है !! रिश्ते का द्वंद्व कितना स्पष्ट किया है शेर मे .. इश्क पर जोर नहीं है ये वो आतिश ग़ालिब //कि लगाए न लगे और बुझाए न बने .. वाह !!
    मसर्रतों के उजाले न रास आये तो क्या
    हुजूमे-ग़म से हुए मेरे क़हक़हे रौशन
    ब्यूटी फुल !!
    उन्हीं के नीचे अंधेरों की परवरिश होगी
    जहां ग़ुरूर से करते हो तुम दिये रौशन
    यकीनन होती है !! सियासत हो या मज़हब – ब हीला ए मज़हब , बनाम ए वतन जितने भी चराग है बेशतर के नीचे यही सच है !!
    तिरी चमक से चमकता है फ़िक्र का सूरज
    जहाँ में शेरो-अदब के हैं फ़लसफ़े रौशन
    तसलीम !!
    हमें न भाये उजाले कभी दिखावे के
    हमारे चेहरे तो किरदार ने किये रौशन
    चाँद और सूरज की रोशनी मे फर्क है !!
    घने अँधेरे मुसल्लत रहे सदा मुझ पर
    बस एक ख़ाब तुम्हारे थे जो रहे रौशन
    ये भी मुहब्बत का प्रगाढ़ रंग है !!!
    शऊरो-फ़िक्र का महताब यूँ बुझा अबके
    कि आफ़ताब भी शायद न कर सके रौशन
    कमज़र्फो का अरूज़ है इसलिए ..
    उसी निगाह की है जुस्तजू ‘अभय’ को भी
    कि जिस निगाह से होते हैं फ़ैसले रौशन
    बहुत खूब साहब बहुत खूब !!! अदल के दिन का इंतज़ार हमारी सिरिश्त का शायद इनबिल्ट प्रोग्राम भी होता है !!
    अभय कुमार ‘अभय’ साहब !!! बहुत बहुत मुबारकबाद –मयंक

  5. Bahut umda gazal
    Dili daad kubool kijiye

  6. उनही के नीचे अँधेरों की परवरिश होगी …जहां गरुर से करते हो तुम दिये रौशन ……………सच्चा शेर

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