32 टिप्पणियाँ

T-21/12 सियाह कर गया वो मेरे रास्ते, रौशन-पूजा भाटिया

सियाह कर गया वो मेरे रास्ते, रौशन
किये थे जिसके लिये मैंने आबले रौशन

गुज़र गये वो गली से झलक दिखाते हुए
बस एक पल में हुए कितने वसवसे रौशन

वो ख़्वाब बन के हैं आये खुली निगाहों में
है मोजिज़े से इसी मेरे रतजगे रौशन

ग़ज़ल में क्या कोई जुगनू बुने हैं तुमने, हाँ ?
पढूं इसे तो लगे हैं ये क़ाफ़िये रौशन

जो लास्ट बैंच पे करते थे मस्तियां तौबा
वहीँ हुए थे न बचपन में क़हक़हे रौशन ?

अरे ये बाग़ में क्या फूल झिलमिलाते हैं ?
कि ख़ुशबुओं से हुए हैं ये सब दिये रौशन?

ख़बर मिली जो तिरे आने की उसी पल से
तमाम शह्र के सब रास्ते हुए रौशन

ये जगमगाते हुए लफ्ज़ हैं कि तारे हैं ?
उतर गये हैं जो करने को हाशिये रौशन

इसी से होंगे न लफ़्ज़ों के अर्थ भी बेहतर
“कलम संभाल अंधेरों को जो लिखे रोशन”

पूजा भाटिया 08425848550

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32 comments on “T-21/12 सियाह कर गया वो मेरे रास्ते, रौशन-पूजा भाटिया

  1. ग़ज़ल में क्या कोई जुगनू बुने हैं तुमने, हाँ ?
    पढूं इसे तो लगे हैं ये क़ाफ़िये रौशन…..

    इस बेहतरीन गजल के लिए ढेरों दाद पूजा जी….

  2. ये जगमगाते हुए लफ्ज़ हैं कि तारे हैं ?
    उतर गये हैं जो करने को हाशिये रौशन
    पूजा जी ,बहुत खुबसूरत ग़ज़ल कही है आपने |वास्तव में ग़ज़ल में जुगनू बुने हैं आपने
    ग़ज़ल में क्या कोई जुगनू बुने हैं तुमने, हाँ ?
    पढूं इसे तो लगे हैं ये क़ाफ़िये रौशन

    जो लास्ट बैंच पे करते थे मस्तियां तौबा
    वहीँ हुए थे न बचपन में क़हक़हे रौशन ? वा..ह क्या कहन की सादगी है |
    दिलीदाद कबूल फरमाएं |

  3. umda sher…
    umda aur munfarid andaaz
    umda aur asardaar mazaameen
    umda ghazal
    OOOJA JI…MUBARAKBAAD

  4. बहुत अच्छी ग़ज़ल
    दिली दाद
    क़ुबूल फरमाइए

  5. पूजा जी बहुत खूबसूरत ग़ज़ल हुई है,

    यूँ तो पूरी ग़ज़ल ही अच्छी है, पर आपका ये शेर ज़ह्न से उतर ही नहीं रहा

    ग़ज़ल में क्या कोई जुगनू बुने हैं तुमने, हाँ ?
    पढूं इसे तो लगे हैं ये क़ाफ़िये रौशन

    हाँ?? क्या कहने!!!

    क्या बात है कमाल का शेर है, वाह वाह

    दिनेश

  6. Bahut achhi ghazal hui hai puja ji .. matla aur last bench wala she’r khas tour pe pasand aaya.. daad
    -Kanha

  7. पूजा जी
    प्रणाम आपकी शेरी सलाहियतों का
    क्या खूब ग़ज़ल कही है
    हर शेर बेहतरीन

    गुज़र गये वो गली से झलक दिखाते हुए
    बस एक पल में हुए कितने वसवसे रौशन
    एक एहसास रौशन है इस शेर में !!!

    ग़ज़ल में क्या कोई जुगनू बुने हैं तुमने, हाँ ?
    पढूं इसे तो लगे हैं ये क़ाफ़िये रौशन
    वाह वाह !!!

    जो लास्ट बैंच पे करते थे मस्तियां तौबा
    वहीँ हुए थे न बचपन में क़हक़हे रौशन ?
    लास्ट बैंच पे करते थे मस्तियां तौबा …… क्या खूब बढ़िया शेर है ज़िंदाबाद

    ख़बर मिली जो तिरे आने की उसी पल से
    तमाम शह्र के सब रास्ते हुए रौशन
    आमद की ख़ुशी में रास्ते रौशन।

  8. पूजा इससे पहले भी आपकी तीन ग़ैरतरही ग़ज़लों को पढ़ कर मैं हैरत में पड़ गया था. वही अहसास फिर जाग रहा है. भरपूर ग़ज़ल, जीती रहिये

  9. सियाह कर गया वो मेरे रास्ते, रौशन
    किये थे जिसके लिये मैंने आबले रौशन

    ग़ज़ल में क्या कोई जुगनू बुने हैं तुमने, हाँ ?
    पढूं इसे तो लगे हैं ये क़ाफ़िये रौशन

    जो लास्ट बैंच पे करते थे मस्तियां तौबा
    वहीँ हुए थे न बचपन में क़हक़हे रौशन ?

    बहुत प्यारी ग़ज़ल आदरणीया पूजा जी

  10. पता नहीं आप उम्र में बड़ी हैं या छोटी लेकिन यह ग़ज़ल कह रही है कि आप बड़ी हैं। इसी नाते प्रणाम। सारी ग़ज़ल रौशन है लेकिन ये तीन शे’र साथ लिए जा रहा हूं।

    सियाह कर गया वो मेरे रास्ते, रौशन
    किये थे जिसके लिये मैंने आबले रौशन

    ग़ज़ल में क्या कोई जुगनू बुने हैं तुमने, हाँ ?
    पढूं इसे तो लगे हैं ये क़ाफ़िये रौशन

    जो लास्ट बैंच पे करते थे मस्तियां तौबा
    वहीँ हुए थे न बचपन में क़हक़हे रौशन ?

    सादर
    नवनीत

  11. उम्दा ग़ज़ल हुई है पूजा जी! बधाई और दाद!

  12. अज़ीम शाइरो की फेहरिस्त अदा ज़ाफरी , परवीन शाक़िर और सहबा अख़्तर के बगैर पूरी नही होती। कारन, कि वो आवाज़ें अहसासात के एक मुख़्तलिफ़ जजीरे की हैं जहाँ गालिब और मीर की रसाई भी इसलिये नही हो सकती कि उनको कुदरत ने वो जिस्म और पैकर ही नही दिया जो इन आवाज़ो का बाइस होता है – नारी की, स्त्री की शाइरी !! कुछ शेर सिर्फ और सिर्फ औरत ही कह सकती है। हिन्दुस्तान मे उस मेयार का बयान अभी नही आया –लेकिन आहटे कहती है कि इम्कान की तो इब्तिदा हो चुकी है और इसकी तस्दीक़ दौरे हाज़िर के जिन बयानात से हो सकती है उनमे आप इस बयान के कुछ अशार शुमार कर सकते हैं —
    सियाह कर गया वो मेरे रास्ते, रौशन
    किये थे जिसके लिये मैंने आबले रौशन
    अरूज़ के लिहाज से भी मतला बेहद खूबसूरत है रदीफ का दोनो मिसरो मे सहज इस्तेमाल और तसाद के रंग ने और कहन की रवानी ने बहुत बहुत मुतास्सिर किया है !!!
    गुज़र गये वो गली से झलक दिखाते हुए
    बस एक पल में हुए कितने वसवसे रौशन
    वसवसे लफ्ज़ उत्प्रेरक है और शेर की कहन का हौसला बढा रहा है रंग को प्रगाढ भी कर रहा है !!
    वो ख़्वाब बन के हैं आये खुली निगाहों में
    है मोजिज़े से इसी मेरे रतजगे रौशन
    सानी मिसरे की तर्तीब थोडी कम्ज़ोर है लेकिन कथ्य की सम्प्रेषणीयता मे कोई कमी नहीं
    ग़ज़ल में क्या कोई जुगनू बुने हैं तुमने, हाँ ?
    पढूं इसे तो लगे हैं ये क़ाफ़िये रौशन
    अपनी नावेल्टी के कारण शेर अच्छा लगा !!
    जो लास्ट बैंच पे करते थे मस्तियां तौबा
    वहीँ हुए थे न बचपन में क़हक़हे रौशन ?
    ये दौलत भी ले लो ये शुहरत भी ले लो भले छीन लो मुझसे मेरी जवानी … मे जो नास्टेल्जिया है वही इस शेर मे भी झमक रहा है !!!
    अरे ये बाग़ में क्या फूल झिलमिलाते हैं ?
    कि ख़ुशबुओं से हुए हैं ये सब दिये रौशन?
    एक शेर शाहिद कबीर का है उस पर गौर करें — लपक रहे हैं अन्धेरे , हवा सुराग़ मे है
    ये देखना है कि कितना लहू चराग़ मे है !! –स्व शाहिद कबीर
    शेर की सारी ज़ीनत लहू लफ़्ज़ से है –यही एक लफ़्ज़ इस शेर को मआनी दे रहा है !!किसी संघर्षशील व्यक्ति के अवसान के क्षणो मे भी उसका संघर्ष का जज़्बा जीवित है !! इसलिये शेर बेहद खूबसूरत है !!! पूजा आपका शेर पिक्चर पोर्ट्रेट है –एक अच्छी तस्वीर एक अच्छी सिमिली है !!!
    ख़बर मिली जो तिरे आने की उसी पल से
    तमाम शह्र के सब रास्ते हुए रौशन
    इसी से होंगे न लफ़्ज़ों के अर्थ भी बेहतर
    “कलम संभाल अंधेरों को जो लिखे रोशन”
    अच्छी गिरह है !!!
    पूजा !! आपको इस गज़ल के लिये बहुत बहुत मुबारकबाद !! –मयंक

  13. bahut accchi ghazal hui pooja ji… kai she’r mujhe behad pasand aaye…. bahut bahut mubarak

  14. लास्ट बेन्च – क्या बात है। स्वप्निल की सजीली राह को आप और भी रौशन करेंगी। बढ़िया ग़ज़ल। बहुत ख़ूब।

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