20 टिप्पणियाँ

T-21/11-2 भटक न जाये कहीं और ये दिले-रौशन-नवीन सी. चतुर्वेदी

भटक न जाये कहीं और ये दिले-रौशन
ज़रा इधर भी नज़र डाल मञ्ज़िले-रौशन

सियाह-शब में सफ़ीने कहाँ-कहाँ भटके
ये जानता ही कहाँ है वो साहिले-रौशन

उजास भरते हैं लम्हों में फ़ैसले इस के
तभी तो वक़्त को कहते हैं आदिले-रौशन

तमाम उम्र सियापों से क्यों उजाली जाय
जहाँ में और भी तो हैं मसाइले-रौशन

हमें नहीं तो किसी और को मिले मौक़ा
किसी के काम तो आये ये महफ़िले-रौशन

नवीन सी. चतुर्वेदी 9967024593

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20 comments on “T-21/11-2 भटक न जाये कहीं और ये दिले-रौशन-नवीन सी. चतुर्वेदी

  1. IZAAFAT WALE QAAFIYE KI KHOOB SOOJHI AAP KO…TAREEF KARNI PADEGI JNB NAVIN JI
    ye alag baat ki TARHI ki rawayat ke bar khilaaf hai…magar aap ki ye mukhalifat…bahut achchhi lagi…sher bhi khoob nikale haiN..daad hi daad haazir hai

  2. नवीन आप सबसे अलग चलने की धुन में नयी-नयी जिहतें तलाश करते हैं. दोहरी पाबंदी के क़ाफ़िये, वाह-वाह, दाद क़ुबूल फ़रमाइये

  3. नवीन भाई आपकी प्रयोगधर्मिता ग़ज़ल की विधा पर आपकी पकड़ का मुकम्मल बयान है. एक और उम्दा ग़ज़ल पर दाद क़ुबूल हो.

  4. Aapne qavafi tang karke apni mushkilen aur badha li then.. par acchi ghazal hui hai… matle aur aakhiri she’r par bataure-khaas daad..

  5. नवीन भाई
    ख़ूबसूरत अंदाज़ में कही गई बेहतरीन ग़ज़ल है
    सभी अशआर बहुत सलीक़े से कहे गए हैं
    एक शानदार ग़ज़ल के लिए मेरी बधाई स्वीकार कीजिये
    यहाँ इज़ाफ़त के क़ाफियों का इस्तेमाल यकसर दुरुस्त है
    क्यूंकि सभी क़ाफियों में इज़ाफ़त है
    वरना तो हर्फ़े-रवी का मसअला पेश आ जाता है
    (आदिक भारती )

  6. उजास भरते हैं लम्हों में फ़ैसले इस के
    तभी तो वक़्त को कहते हैं आदिले-रौशन
    आदरणीय नवीन भाईसाहब ,यह ग़ज़ल भी क्या ख़ूब कही है आपने |ढेरों दाद कबूल फरमावें |

  7. उजास भरते हैं लम्हों में फ़ैसले इस के
    तभी तो वक़्त को कहते हैं आदिले-रौशन
    बहुत ही उम्दा शेर है….. सलाम आपकी सलाहियतों का।

  8. वाह…नवीन भाई। बहुत उम्‍दा कलाम।
    शुक्रिया।
    सादर
    नवनीत

  9. नवीन भाई साहब।
    बहुत उम्‍दा।
    वाह…वाह..।

  10. भटक न जाये कहीं और ये दिले-रौशन
    ज़रा इधर भी नज़र डाल मञ्ज़िले-रौशन
    बडा प्यारा मतला कहा है नवीन भाई !! एक गज़ल रोशन के नाम आप कह चुके दूसरी अरूज़ के लिहाज से पहली से मीलों आगे है !! बहुत खूब !!! ये मतला मंज़िल को वार्निंग है बडे ही शऊरी अन्दाज़ मे !!
    सियाह-शब में सफ़ीने कहाँ-कहाँ भटके
    ये जानता ही कहाँ है वो साहिले-रौशन
    मुम्किन है जानता हो साहिले रोशन !! क्योंकि नद्दी भी वही समन्दर भी वही साहिल भी वही और कश्ती भी वही है और खुद की शिनाख़्त करो तो हम भी उसी की परछाई भर ही तो हैं !!
    उजास भरते हैं लम्हों में फ़ैसले इस के
    तभी तो वक़्त को कहते हैं आदिले-रौशन
    काश !! मेरा अहसास भी इस शेर को तस्लीम करें !! वगर्ना !!! तारीख़ पे तारीख़ लगती जाती है मुंसिफे वक़्त के इजलास मे फैसले की घडी को भी पुनर्जन्म की संकल्पना से बाँध दिया जाता है
    तमाम उम्र सियापों से क्यों उजाली जाय
    जहाँ में और भी तो हैं मसाइले-रौशन
    बात तो कायदे की कही है –पहले क्यों नही कही ?!!
    हमें नहीं तो किसी और को मिले मौक़ा
    किसी के काम तो आये ये महफ़िले-रौशन
    अना का बोझ भी रक्खा था मेरे शानो पे
    ये हाथ काँप रहा था सलाम करते हुये
    शिकस्त खाई तो इक तंज़ कर के लौट आया
    तमाम शहर रकीबों के नाम करते हुये –मरहूम अहमद कमाल परवाज़ी
    नवीन भाई बहुत उम्दा और बहुत रवाँ शेर कहे हैं – मयंक

    • भैया प्रणाम

      आप की टिप्पणियों को पढ़-पढ़ कर तमाम लोग ग़ज़ल के और क़रीब पहुँच सके, मैं भी उन सौभाग्य-शालियों में से एक हूँ। आप किसी भी ग़ज़ल को ऐसी ऊँचाइयों पर पहुँचा देते हैं कि शेर कहने वाला ख़ुद भी भौंचक्का रह जाता है। आप का अध्ययन, चयन, स्मरण-शक्ति और इन सब के अलावा बल्कि इन सब से ऊपर सकारात्मक टिप्पणियों ने कई नये पथिकों के लिये ग़ज़ल की राह आसान की है। बहुत-बहुत साधुवाद।

  11. नवीन भाई
    प्रणाम !

    सियाह-शब में सफ़ीने कहाँ-कहाँ भटके
    ये जानता ही कहाँ है वो साहिले-रौशन
    रौशन को रौशन करने के बाद एक नए तेवर वाली ग़ज़ल !!!

  12. वाह वाह भैय्या अब इसे क्या कहा जाए

    इज़ाफ़तों वाली ग़ज़ल? ?

    ग़ज़ल बेहद पसंद आई

    अापका

    दिनेश

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