11 टिप्पणियाँ

T-21/9 बस इक चराग़ सही, ख़ुद कभी करे रौशन-शाज़ जहानी

बस इक चराग़ सही, ख़ुद कभी करे रौशन
जो चाहता है मिलें उस को रास्ते रौशन

कहो न उस को सहाफ़त , वो बस तिजारत है
”क़लम सम्हाल अन्धेरे को जो लिखे रौशन”

तिलिस्मख़ेज़ हैं दीवाने-मीर के सफ़्हे
सुख़न के नूर से रहते हैं हाशिये रौशन

गुज़ार देते हैं बेदार रात दानिस्ता
तिरे ख़याल से रहते हैं रतजगे रौशन

बताओ कौन मुनव्वर ज़िया से है किसकी
इधर है शम्अ फ़रोज़ाँ , उधर रुख़े-रौशन

वो मरहला है नज़र में जहाँ से मंज़िल तक
न शाहराह मिलेगी, न क़ाफ़िले रौशन

शनाख़्त एक बनाओ अवाम से हट कर
है जैसे बीच सितारों के वो महे-रौशन

न शर्मसार कभी होगा वो ज़माने में
ज़मीर से हैं किये जिसने फ़ैसले रौशन

हमारे पास बुज़ुर्गों की कुछ दुआएं थीं
नसीब ख़ुद ही फ़रिश्तों ने कर दिए रौशन

संभाल पाएँ न शायद ये नस्ले-आइन्दा
रखे हैं हम ने अभी तक जो सिलसिले रौशन

वो नूर एक है जिस से हैं इस जहाँ भर के
कलीसे , दैरो-हरम और मैकदे रौशन

रहे-ख़ुलूस के जो राहरौ हैं ‘शाज़’ मियां
दुआ करो कि रहें उनके हौसले रौशन

आलोक कुमार श्रीवास्तव शाज़ जहानी 9350027775

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11 comments on “T-21/9 बस इक चराग़ सही, ख़ुद कभी करे रौशन-शाज़ जहानी

  1. संभाल पाएँ न शायद ये नस्ले-आइन्दा
    रखे हैं हम ने अभी तक जो सिलसिले रौशन ” HAQUE HAI”

  2. शाज़ साहब आपकी ग़ज़ल पर क्या लिक्खूं। आप कभी भी दाद वसूल करने के लिये आते तो हैं नहीं

  3. बढ़िया ग़ज़ल। दाद कुबूल करें। मौक़ा मिले तो तरही की अन्य ग़ज़लों को भी पढ़िएगा।

  4. आदरणीय शाज़ साहब |ढेरों दाद कबूल फरमावें |वाह……वाह
    सादर

  5. बस इक चराग़ सही, ख़ुद कभी करे रौशन
    जो चाहता है मिलें उस को रास्ते रौशन
    वाह वाह !! शाज़ साहब !! शिकेब का शेर याद आया — क्यों रो रहे हो राह के अन्धे चराग़ को
    क्या बुझ गया हवा से लहू का शरार भी –शिकेब !!
    जिसे उजाला चाहिये वो अपना चराग़ खुद जलाये !! ये बात अना की भी है और ज़मीर की भी !! मतले पर भरपूर दाद !!!

    कहो न उस को सहाफ़त , वो बस तिजारत है
    ”क़लम सम्हाल अन्धेरे को जो लिखे रौशन”
    ये एक मुख़्तलिफ ज़ाविया है इस गिरह पर आजमाइश का –ये दलील काइल कर रही है !!

    तिलिस्मख़ेज़ हैं दीवाने-मीर के सफ़्हे
    सुख़न के नूर से रहते हैं हाशिये रौशन
    बिल्कुल मीर के शेर की रसाई –दिलो जेहन के गैर आबाद हल्कों तक है और इनके शेर के पसमंज़र की वुसअत काइनात की सरहदों तक है !!

    गुज़ार देते हैं बेदार रात दानिस्ता
    तिरे ख़याल से रहते हैं रतजगे रौशन
    अच्छा कहा है !!

    बताओ कौन मुनव्वर ज़िया से है किसकी
    इधर है शम्अ फ़रोज़ाँ , उधर रुख़े-रौशन
    सभी को पस्न्द आयेगा शेर !! रिवायतपसन्द सामईन तो कुर्बान हो जायेंगे इस कहन पर !!!

    वो मरहला है नज़र में जहाँ से मंज़िल तक
    न शाहराह मिलेगी, न क़ाफ़िले रौशन
    आखिर को थक के बैठ गई इक मुकाम पे
    कुछ दूर चली साथ मेरे रहगुज़ार भी –शिकेब
    मरहला नज़र मे है !! यहाँ से रहगुज़र ख़त्म होती है और अब अपना रास्ता खुद बनाना है !!!

    शनाख़्त एक बनाओ अवाम से हट कर
    है जैसे बीच सितारों के वो महे-रौशन
    खूबसूरत शेर है और क़्वोटेबल है

    न शर्मसार कभी होगा वो ज़माने में
    ज़मीर से हैं किये जिसने फ़ैसले रौशन
    अना की सताइश से पगा है शेर का मफ्हूम और आज के दौर मे बहुत प्रासंगिक भी है !!

    हमारे पास बुज़ुर्गों की कुछ दुआएं थीं
    नसीब ख़ुद ही फ़रिश्तों ने कर दिए रौशन
    दाद दाद !!तालियाँ !!!

    संभाल पाएँ न शायद ये नस्ले-आइन्दा
    रखे हैं हम ने अभी तक जो सिलसिले रौशन
    सहमत हूँ –ये नई नस्ल है और बकौल इफ़्तिखार आरिफ — हर नई नस्ल को इक ताज़ा मदीने की तलाश
    साथियों अब कोई हिज्रत नहीं होने वाली – इ आ

    वो नूर एक है जिस से हैं इस जहाँ भर के
    कलीसे , दैरो-हरम और मैकदे रौशन
    श्म्मे हरम हो या हो दिया सोमनाथ का सभी मे उसे के करम से नूर झमके है –वाह वाह !!!

    रहे-ख़ुलूस के जो राहरौ हैं ‘शाज़’ मियां
    दुआ करो कि रहें उनके हौसले रौशन
    जिया है इस मरहले पर इस ख्याल को मैने भी — मत छेडिये हमारे चरागे ख़ुलूस को
    शायद कोई शरार ही मुँह पे उछल पडे
    शाज़ जहानी साहब !! इस तरही की बेहतरीन गज़ल कही है आपने –बधाई –मयंक

  6. शाज़ साहब

    तिलिस्मख़ेज़ हैं दीवाने-मीर के सफ़्हे
    सुख़न के नूर से रहते हैं हाशिये रौशन
    मीर साहब की ख़िदमत में क्या खूब कहा आपने !

    शनाख़्त एक बनाओ अवाम से हट कर
    है जैसे बीच सितारों के वो महे-रौशन
    पुरज़ोर मश्विरा है साहब !!!

    संभाल पाएँ न शायद ये नस्ले-आइन्दा
    रखे हैं हम ने अभी तक जो सिलसिले रौशन
    आने वाली नस्ल से आपने जो उम्मीद रखी है वो चुनौती तो है मगर शायद ज़रूरी भी है !

  7. बहुत अच्छी ग़ज़ल हुई है आलोक जी, पढ़ कर मज़ा आ गया,

    हमारे पास बुज़ुर्गों की कुछ दुआएं थीं
    नसीब ख़ुद ही फ़रिश्तों ने कर दिए रौशन

    वाह वाह, क्या बात है,

  8. न शर्मसार कभी होगा वो ज़माने में
    ज़मीर से हैं किये जिसने फ़ैसले रौशन

    इस उम्दा कलम को पढवाने के लिए लफ्ज़ एडमिन व शाज़ साहब का शुक्र गुज़ार हूँ…

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