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T-21/8 सवाल दिल के इसी बात पर रखे रौशन-प्रखर मालवीय ‘कान्हा’

सवाल दिल के इसी बात पर रखे रौशन
कभी तो होंगे जवाबों के सिलसिले रौशन

कभी जो लौट के आयेंगे वो मिरी जानिब
चराग़ मुंतज़िर आँखों के पायेंगे रौशन

सभी की शक्ल चमकदार ही नज़र आये
रखो न शह्र में इतने भी आइने रौशन

कहो सुनो भी किसी रात अपनी-मेरी बात
करो कभी तो हमारे ये रतजगे रौशन

वगरना दिन के उजाले में खो भी सकते हो
रखो चराग़ हर इक वक़्त ज़ह्न के रौशन

रदीफ़ छुप रही है जा के एक कोने में
ग़ज़ल में बांधे हैं हमने भी क़ाफ़िये रौशन

न कर सकेगा अँधेरा कोई तुझे अँधा
‘क़लम सम्हाल अँधेरे को जो लिखे रौशन ‘

प्रखर मालवीय ‘कान्हा’ 09911568839

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24 comments on “T-21/8 सवाल दिल के इसी बात पर रखे रौशन-प्रखर मालवीय ‘कान्हा’

  1. कान्हा जीते रहिये। ये एक अकेला शेर जंगल के इक्कड़ हाथी की तरह झूमता-झामता नज़र आ रहा है. बला का शेर….. एक शेर ही काफ़ी है आँखें चौंधियाने के लिये। बहुत उम्दा, वाह वाह.……अगर शराब पिटे हैं तो फ़ौरन सिंगल मॉल्ट का इनआम लेने आ जाइये।

    कभी जो लौट के आयेंगे वो मिरी जानिब
    चराग़ मुंतज़िर आँखों के पायेंगे रौशन

  2. Bahut khoob prakhar
    bahut khuub

  3. कान्हा ख़ुश रहिये। बढ़िया ग़ज़ल। शाब्बाश। मयङ्क भैया की टिप्पणी के आलोक में आप देख सकते हैं कि आप के ख़याल की परवाज़ किस अरूज़ पर है। जीते रहिये।

  4. कभी जो लौट के आयेंगे वो मिरी जानिब
    चराग़ मुंतज़िर आँखों के पायेंगे रौशन

    सभी की शक्ल चमकदार ही नज़र आये
    रखो न शह्र में इतने भी आइने रौशन
    आदरणीय कान्हा जी ,तमाम शेर नायाब हैं |मुकम्मल ग़ज़ल हुई है |ढेरों दाद कबूल फरमावें |
    सादर

  5. प्रिय प्रखर जी,
    बहुत उम्‍दा ग़ज़ल।
    दिल से निकली दाद दिल से स्‍वीकार करो भाई।

    तुम्‍हारा
    नवनीत

  6. सवाल दिल के इसी बात पर रखे रौशन
    कभी तो होंगे जवाबों के सिलसिले रौशन
    बेहतरीन मतला है !! इंतज़ार , हिज्रत , समर्पण उमीद सब मुहब्बत के एक धागे मे पिरो दिये हैं कान्हा आपने !!
    कभी जो लौट के आयेंगे वो मिरी जानिब
    चराग़ मुंतज़िर आँखों के पायेंगे रौशन
    जू ए खूँ आँखों से बहने दो कि है शामे फिराक़
    मै ये सम्झूंगा कि दो शम्मे फरोज़ाँ हो गईं -ग़ालिब
    सभी की शक्ल चमकदार ही नज़र आये
    रखो न शह्र में इतने भी आइने रौशन
    अंतर्विष्लेषण के लिये बाध्य करता हुआ शेर !! शुजाअ ख़ाबर के शेर जैसा ही असरदार
    इन तेज़ उजालों से बीनाई को खतरा है
    जैसे भी बने फौरन ख़्वाबों का मकाँ छोडो –शुजाअ ख़ाबर

    कहो सुनो भी किसी रात अपनी-मेरी बात
    करो कभी तो हमारे ये रतजगे रौशन
    खूब !! खूब !! वाह !!
    वगरना दिन के उजाले में भी खो सकते हो
    रखो चराग़ हर इक वक़्त ज़ह्न के रौशन
    एक बडी बात मश्वरे की शक्ल मे है !! लेकिन तस्लीम !! अच्छा कहा है !!!
    न कर सकेगा अँधेरा कोई तुझे अँधा
    ‘क़लम सम्हाल अँधेरे को जो लिखे रौशन ‘
    बहुत उम्दा और करागर गिरह लगाई है !!
    ‘कान्हा’ !!!!! — बहुत सुन्दर गज़ल है बधाई और शुभाशीष !!! –मयंक

  7. प्रखर बहुत सधी हुई और उम्दा ग़ज़ल हुई है. तुम्हारी कहन में आ रहा निखार क़ाबिले गौर है! कीप इट अप ब्रदर !

  8. badhiya ghazal hui hai balak.. jio…

  9. बहुत अच्‍छी ग़ज़ल प्रखर जी। खूब लिखो और लिखते रहो भाई। वाह…वाह…।

  10. यूँ तो पूरी ग़ज़ल ही शानदार है मगर इन दो शेरों को कितनी भी बार पढ़िए,प्यास ही नहीं मिटती.
    कभी जो लौट के आयेंगे वो मिरी जानिब
    चराग़ मुंतज़िर आँखों के पायेंगे रौशन
    उम्दा है……
    सभी की शक्ल चमकदार ही नज़र आये
    रखो न शह्र में इतने भी आइने रौशन
    दाद क़ुबूल करें।

  11. खूबसूरत ग़ज़ल हुई है प्रखर जी
    दाद क़ुबूल करें।

    सादर
    पूजा भाटिया

  12. कभी जो लौट के आयेंगे वो मिरी जानिब
    चराग़ मुंतज़िर आँखों के पायेंगे रौशन

    सभी की शक्ल चमकदार ही नज़र आये
    रखो न शह्र में इतने भी आइने रौशन

    वाह मेरी जान क्या अच्छे शेर कहें हैं, तबीयत खुश हो गई.

    दिनेश

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