41 टिप्पणियाँ

T-21/7 पुकारती है मुझे दिल की वादी-ए-रौशन-स्वप्निल तिवारी

पुकारती है मुझे दिल की वादी-ए-रौशन
सदा भी वो है कि रखती है रतजगे रौशन

दयारे-हिज्र को छू कर भी कुछ गुज़रती है
तिरे विसाल की वो एक वुसअते-रौशन

मुझे ही देखेगी दुनिया ये एकटक इक दिन
झपक-झपक के पलक होंगे कैमरे रौशन

कोई तो होगा तेरे बाद लौ ख़ुशी की लिए
तिरे बग़ैर भी होंगे ये क़हक़हे रौशन

सियाहियों के लिये जुगनुओं से हाथ मिला
“क़लम संभाल..अँधेरे को जो लिखे रौशन”

बहुत सुकूँ से बहा जाता है अँधेरा पर
नदी की सतह पे याँ वाँ हैं बुलबुले रौशन

तिरी कहानी अधूरी सुना के लौट आये
ज़बाँ पे होने लगे इतने ज़ायके रौशन

महक रहा है मिरा कमरा जिस उदासी से
उसी से लॉन में हैं मेरे मोगरे रौशन

बुझे-बुझे से चराग़ों में एक हम भी थे
तिरी निगाह में आते ही हो गये रौशन

तमाम सफ़्हे पे फैला रहे थे किरणों को
कुछ ऐसे नुक़्ते के जिनसे थे दायरे रौशन

शिकायतें जो तिरी हैं …. सो साफ़ हैं मंज़र
रखे हुए हैं मरासिम को ये गिले रौशन

किसी की याद है अब दिल के पार जाती हुई
लो आज रात हैं इस बन के रास्ते रौशन

सभी ने अपनी तरह के दिये जलाये हैं
कहीं पे जुगनू कहीं पर हैं मोगरे रौशन

स्वप्निल तिवारी 08879464730

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41 comments on “T-21/7 पुकारती है मुझे दिल की वादी-ए-रौशन-स्वप्निल तिवारी

  1. बहुत अच्छी ग़ज़ल..स्वप्निल भाई.
    मुबारक.

  2. KYA ZABARDAST GHAZAL HUYI HAI..JNB SWAPNIL JI…AHA!!!!!!

    AIK BAAT ZAROOR ARZ KARNA CHAHUnGA..
    IZAAFAT WALE QAAFIYE..AUR PHIR YE ke harf e rawi waale qaafiye…meri nazar me bilkul durust nahiN…arooz hi nahi balki zabaan bhi is ki ijazat nahiN deti…NAVNEET ji ne achchha prayog kiya…phonetic aitabaar se unhon ne saare qawaafi liye magar..zabaan ka khayal rakhkha hai…ki saare qawaafi aik hi qabeel ke chune haiN..go ki TARHI GHAZAL ke usool par use bhi saheeh nahiN thehraya ja sakta…kyuN ki ..MISRA E TARAH MEn harf e rawi.. YE hai jis ki pabandi laazmi hai…
    ab khudara koi ye na kahe…ke ye usool wo usool…arooz me hi bandhe rahe to ghazal khaak kahi jaayegi….maiN bhi arooz ke bahut se impractical usooloN se parhez karta huN…magar…bilkul aazaad bhi hona nahin chahta…
    bahar haal…mere khayaalaat the…pesh kar diye…ummeed hai GIRAAN NA HONGE

  3. बुझे-बुझे से चराग़ों में एक हम भी थे
    तिरी निगाह में आते ही हो गये रौशन UMDA WAAH KYA KAHNE JANAAB, BADHAAYI

  4. मुझे ही देखेगी दुनिया ये एकटक इक दिन
    झपक-झपक के पलक होंगे कैमरे रौशन

    amen …

    aisa bilkul hoga ak din bhaiya
    nihayat hi khoonsoorat gazal k liye dili daad

    regards

  5. तरही मिसरे का ऐलान होते ही हम इंतज़ार करने लगते हैं स्वप्निल की जगमगाती ग़ज़ल का। और हर बार आप पढ़वाते हैं एक शानदार ग़ज़ल। दादा वाली टिप्पणी में जिस ‘वादिये-रौशन” का ज़िक्र है उस पर थोड़ा और प्रकाश डालना ज़रूरी लग रहा है। बढ़िया ग़ज़ल, शानदार ग़ज़ल। बहुत-बहुत बधाई। बतौरे-ख़ास “झपक-झपक के पलक” वाले शेर में अनुप्रास का प्रयोग। तमाम विरोध और आलोचना के बावुजूद यह मेरा प्यारा शग्ल रहा है और मैं ने इस “पिङ्गल के अनुप्रास” को जिसे “अरूज़ ने अनुप्रास की बजाय तकरारे-हुस्न” कह कर इस्तेमाल किया और सराहा भी, को भरपूर use किया है। बहुत बहुत बधाई स्वप्निल। जीते रहिए और ऐसे ही शानदार ग़ज़लें पढ़वाते रहिए।

  6. नये अंदाज़ में बहुत शिगुफ़्ता ग़ज़ल हुई है स्वप्निल भाई
    सभी शेर एक से बढ़कर एक हुए हैं
    एक शानदार जानदार ग़ज़ल के लिए ढेरों दादों तह्सीं पेश है

  7. तमाम सफ़्हे पे फैला रहे थे किरणों को
    कुछ ऐसे नुक़्ते के जिनसे थे दायरे रौशन

    शिकायतें जो तिरी हैं …. सो साफ़ हैं मंज़र
    रखे हुए हैं मरासिम को ये गिले रौशन
    आदरणीय आतिश साहब ,उम्दा ग़ज़ल हुई है |दरों दाद कबूल फरमावें |मोगरे वाला काफ़िया ख़ूब रौशन हुआ है |दिलीमुबारकबाद |
    सादर

  8. स्वप्निल बहुत उम्दा ग़ज़ल. आपकी ग़ज़ल की तारीफ़ करूँगा तो लोग कहेंगे कि स्वप्निल को ज़ियादा चाहते हैं, इस लिए ख़ास तौर पर ऐसा लिखते हैं. बस एक बात कहनी है. अरबी और मूल अरूज़ में इज़ाफ़त को क़ाफ़िया बनाने पर दो राय हैं. कुछ ऐसे ग़लत मानते हैं कुछ ठीक मानते हैं. हम लोग इसे जायज़ मानते और बरतते हैं. आप ख़ुद देखिये ‘वादिये-रौशन’ कितना खूबसूरत बिम्ब बन रहा है. वाह वाह

  9. Kya khoob ghazal hai dada… naye naye kafiye kya ghazab nibhaye hai aapne ….lajawab ..sare ash’aar ek se badhkar ek hain..din ban gaya ..waahh..pranam
    -Kanha

  10. स्वप्निल जी
    आपकी ग़ज़ल का बेसब्री से इन्तिज़ार था
    सारे शेर मज़े के हैं…

    मुझे ही देखेगी दुनिया ये एकटक इक दिन
    झपक-झपक के पलक होंगे कैमरे रौशन
    आह … क्या कहने !!!

    बहुत सुकूँ से बहा जाता है अँधेरा पर
    नदी की सतह पे याँ वाँ हैं बुलबुले रौशन
    क्या तस्वीर खींची है आपने !!

    सभी ने अपनी तरह के दिये जलाये हैं
    कहीं पे जुगनू कहीं पर हैं मोगरे रौशन
    और
    महक रहा है मिरा कमरा जिस उदासी से
    उसी से लॉन में हैं मेरे मोगरे रौशन
    इन अशआर से नज़र हटने का नाम ही नहीं ले रही। … वाह वाह वाह वाह वाह।

  11. बहुत ख़ूब स्वप्निल भाई! हमेशा की तरह ताज़ा तश्बीहात और अनूठे इस्तआरे! भरपूर दाद लीजिये!

  12. वाह स्‍वप्निल भाई। बहुत खू़ब ग़ज़ल। क्‍या बात । क्‍या बात। भरपूर दाद हाजि़र है।

  13. आदरणीय स्वप्निल भाई आपकी ग़ज़ल की जितनी भी तारीफ़ करे कम ही होगा । बस ये कहूँगा की बार बार पढ़ने को मन कर रहा है । दाल क़बूल करें ।

  14. पुकारती है मुझे दिल की वादी-ए-रौशन
    सदा भी वो है कि रखती है रतजगे रौशन
    दमदार आगाज़ है गज़ल का !! मतला मोह रहा है !!
    दयारे-हिज्र को छू कर भी कुछ गुज़रती है
    तिरे विसाल की वो एक वुसअते-रौशन
    मेरा भी यही मानना है कि हिज्र –विसाल का आफशूट ही तो है !!! और उसका वज़ूद भी विसाल के बगैर नही –ये दीगर है कि विसाल हकीकत है या तसव्वुर की उपज है !!
    मुझे ही देखेगी दुनिया ये एकटक इक दिन
    झपक-झपक के पलक होंगे कैमरे रौशन
    अरे भई क्या बात है !!! कितना प्यारा शेर है इस ज़मीन पर और इस शेर का लहजा !! उमीद की पुलक और विश्वास की किलक कितनी साफ सुनाई दे रही है इस शेर मे और स्वप्निल ये तो होगा भी तुम्हारे साथ –मेरा विश्वास है !!!
    कोई तो होगा तेरे बाद लौ ख़ुशी की लिए
    तिरे बग़ैर भी होंगे ये क़हक़हे रौशन
    येस !!! यही एलीमेण्ट होना चाहिये अपकी शख़्सीयत मे – मुहब्बत कोई गुलामी या बन्दगी नही होती !! अरे वो दर्दे मुहब्बत सही तो क्या मर जायें ??!! (फिराक )
    तिरी कहानी अधूरी सुना के लौट आये
    ज़बाँ पे होने लगे इतने ज़ायके रौशन
    ये रंग अच्छा है !!!
    महक रहा है मिरा कमरा जिस उदासी से
    उसी से लॉन में हैं मेरे मोगरे रौशन
    स्वप्निल आप कुदरत के जब भी नज़दीक जते हैं बहुत उजली और बहुत खूबसूरत तस्वीर शेर मे ले कर आते हैं !! वाह !!
    बुझे-बुझे से चराग़ों में एक हम भी थे
    तिरी निगाह में आते ही हो गये रौशन
    अच्छा है अच्छा है !!!
    सभी ने अपनी तरह के दिये जलाये हैं
    कहीं पे जुगनू कहीं पर हैं मोगरे रौशन
    अच्छा शेर है और इसके सानी मिसरे पर एक शेर शाहिद कबीर का जो मुझे बहुत अपील करता है !!
    सब अपने अपने उजालो को ले के चलते हैं
    तुम्हारी शम्म: मे लौ है हमारे दाग़ मे है –शाहिद कबीर

    स्वप्निल !!! बहुत खूब !! हर बार की तरह !! वाह वाह !! –मयंक

  15. स्वप्निल जी
    क्या कहने!!

    नीरज सर से शब्दशः सहमत हूँ
    मतले से मक़ते तक बेहतरीन ग़ज़ल कही है

    बहुत बहुत बधाई

  16. कोई तो होगा तेरे बाद लौ ख़ुशी की लिए
    तिरे बग़ैर भी होंगे ये क़हक़हे रौशन

    सियाहियों के लिये जुगनुओं से हाथ मिला
    “क़लम संभाल..अँधेरे को जो लिखे रौशन”

    महक रहा है मिरा कमरा जिस उदासी से
    उसी से लॉन में हैं मेरे मोगरे रौशन

    शिकायतें जो तिरी हैं …. सो साफ़ हैं मंज़र
    रखे हुए हैं मरासिम को ये गिले रौशन

    मैंने ही कहा था कि ” किसी एक शेर को अलग से कोट करना बाकी शेरों साथ ना-इंसाफी होगी ” –लेकिन क्या करूँ ये शेर कमबख्त पीछा ही नहीं छोड़ रहे — कुछ भी कहो अपना तो दिन रौशन हो गया जनाब .

  17. मतले से मक्ते तक याने पूरी ग़ज़ल पर स्वप्निल तिवारी की मोहर है — वाह वाह वाह क्या बात है —और कुछ रौशन हो न हो तुम्हारी मौजूदगी से उर्दू शायरी जरूर रौशन हो रही है। कमाल ग़ज़ल कही है भाई , किसी एक शेर को अलग से कोट करना बाकी शेरों साथ ना-इंसाफी होगी — लिखते रहो , मेरी दुआएं आप के साथ हैं।

  18. ऐसी उम्दा ग़ज़ल कि पढ़ कर दिल हो गया रौशन।
    शुक्रिया इतने खूबसूरत कहन के लिए।
    सादर
    पूजा भाटिया

  19. नाम छूट गया था

    अापका

    दिनेश

  20. अाप हर बार हैरान कर देते हैं भैय्या , इस बार तो आपने बुलबुलों से कैमरों तक सब रोशन कर दिया है, तमाम ग़ज़ल रोशनी से भरपूर है, तमाम ग़ज़ल मुरस्सा है, कोई एक शेर चुनना बेहद मुश्किल है, अापकी ग़ज़लो को पढ़ना हर बार एक नया अनुभव होता है ऐसा लगता है जैसे कहीं दूर हसीन वादियो में सैर लगाने चले आए हैं , ऎसा लगता है जैसे ताज़ा हवाओं के इलाके में चले आए हैं, सलामत रहिए 🙂

    आपका

    दिनेश

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