28 टिप्पणियाँ

T-21/5 सुनो! हमीं ने किये इश्क़ के दिये रौशन-इरशाद ख़ान “सिकंदर”

सुनो! हमीं ने किये इश्क़ के दिये रौशन
ये और बात है उस वक़्त ख़ुद भी थे रौशन

तुम्हारा अक्स भी अम्बर पे रक़्स करता है
हमारे अश्क भी होते हैं दिन ढले रौशन

तुम्हारे क़ह्र से लेकर हमारे सब्र तलक
ग़ज़ल में हो गये पहलू कुछ अनछुये रौशन

खुली जो आंख तो काली उदास सड़कें थीं
हुआ था शब मिरे ख़्वाबों का हाइवे रौशन

मैं चाहता हूँ ये लम्हे सहेज लूं दिल में
रहें, रहें, न रहें कल ये सरफिरे रौशन

बुझे बुझे मिरी तक़दीर के सितारे थे
तुम्हारे नाम को सुन सब के सब हुए रौशन

मैं इक रदीफ़ के ऐसा सुभाव रखता हूँ
तिरे सुभाव में ढेरों हैं क़ाफ़िये रौशन

इसी लिये तो उसे रौशनाई कहते हैं
है ख़ुद सियाह मगर ज़ह्नो-दिल करे रौशन

वो शायरी भी कोई शायरी है शहज़ादे
जो कर न पाये किसी तौर रतजगे रौशन

वो सारे लोग ही तस्वीर हो चुके हैं अब
जो करते रहते थे होंटों पे क़हक़हे रौशन

तुम्हारे वस्ल के लम्हे तो कुछ दिनों के थे
तुम्हारे हिज्र में हम उम्र भर रहे रौशन

वो गीत इसलिये भी ज़िन्दगी का हिस्सा था
थे उसके मुखड़े से लेकर सब अंतरे रौशन

है तुझमें इल्म तो अब इल्म का दिखा जलवा
“क़लम संभाल अँधेरे को जो लिखे रौशन”

इरशाद ख़ान “सिकंदर” 09818354784

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28 comments on “T-21/5 सुनो! हमीं ने किये इश्क़ के दिये रौशन-इरशाद ख़ान “सिकंदर”

  1. इतनी ख़ूबसूरत ग़ज़ल कि क्या कहा जाए…
    इरशाद भाई,
    एक मुरस्सा ग़ज़ल के लिये बहुत बहुत बधाई !

  2. वो सारे लोग ही तस्वीर हो चुके हैं अब
    जो करते रहते थे होंटों पे क़हक़हे रौशन KHOOB HAI

  3. Bahut hi umda gazal huii hai dada
    puri ki puri gazal pasand aayi

    dili mubarak baad

  4. शेर के बच्चे से शेर जैसा होने की ही उमीद की जाती है। हम लोगों से कम से कम औसत परिपूर्णता की आशा राखी जाती है। इस ज़मीन में रौशन वाली रदीफ़ को आप ने ब-ख़ूबी निभाया है। बढ़िया ग़ज़ल। अनेक अशआर बढ़ते क़दमों को रोकते हैं। बतौरे-ख़ास रौशनाई और अन्तरे वाले शेर। दाद हाज़िर है।

  5. तुम्हारा अक्स भी अम्बर पे रक़्स करता है
    हमारे अश्क भी होते हैं दिन ढले रौशन

    तुम्हारे क़ह्र से लेकर हमारे सब्र तलक
    ग़ज़ल में हो गये पहलू कुछ अनछुये रौशन
    आदरणीय इरशाद साहब ,सभी काफ़ियों ने तसव्वुर के नये चिराग रौशन किये हैं |ढेरों दाद कबूल फरमावें सादर

  6. इरशाद साहब
    महफ़िल लूटना कोई आपसे सीखे

    तुम्हारे क़ह्र से लेकर हमारे सब्र तलक
    ग़ज़ल में हो गये पहलू कुछ अनछुये रौशन
    ग़ज़ल तो शायद इसी का नाम है … !

    खुली जो आंख तो काली उदास सड़कें थीं
    हुआ था शब मिरे ख़्वाबों का हाइवे रौशन
    आय हाय क्या गज़ब ढाया है इन दो मिसरों में ….!

    मैं इक रदीफ़ के ऐसा सुभाव रखता हूँ
    तिरे सुभाव में ढेरों हैं क़ाफ़िये रौशन
    क्या सहज तरीके से कठिन ख्याल को पिरोया है इरशाद भाई कमाल !!!

    तुम्हारे वस्ल के लम्हे तो कुछ दिनों के थे
    तुम्हारे हिज्र में हम उम्र भर रहे रौशन
    उम्दा शेर साहब

  7. इरशाद जी
    माशाअल्लाह क्या खूब ग़ज़ल कही है।
    दिली दाद कुबूल करें।
    सादर
    पूजा भाटिया

  8. तुम्हारे वस्ल के लम्हे तो कुछ दिनों के थे
    तुम्हारे हिज्र में हम उम्र भर रहे रौशन

    subhan allah…behtariin ghazal…daad kaboolen

  9. सुनो! हमीं ने किये इश्क़ के दिये रौशन
    ये और बात है उस वक़्त ख़ुद भी थे रौशन
    ये और बात है उस वक़्त – …….. !! मैं चराग़ से जला चराग़ हूँ // रोशनी है पेश खानदान का – भाई इरशाद ख़ान सिकन्दर के लिये इस रदीफ मे बहुत सम्भावनाये हैं !!
    तुम्हारा अक्स भी अम्बर पे रक़्स करता है
    हमारे अश्क भी होते हैं दिन ढले रौशन
    काइनाती मनाज़िर !!!–सूरज और सितारे है !!इनको पसमंज़र मे रख कर भी शेर पढा जा सक्ता है गो कि ज़रूरी नही कि शाइर के जेहन मे भी ठीक वही पहलू हो –लेकिन शेर का मफ़्हूम बहुत साफ है कि महबूब खूबतर है और हम कमतर !!!
    तुम्हारे क़ह्र से लेकर हमारे सब्र तलक
    ग़ज़ल में हो गये पहलू कुछ अनछुये रौशन
    एक स्ट्रीम है शाइरी की .. तुम्हारे क़ह्र से लेकर हमारे सब्र तलक.. इस दायरे की शाइरी यकीनन रौशन होती है !!
    खुली जो आंख तो काली उदास सड़कें थीं
    हुआ था शब मिरे ख़्वाबों का हाइवे रौशन
    “हाइवे” शब्द का इस्तेमाल बहुत खूबसूरती से किया गया है ख़्वाब और हकीक़त का फर्क शेर मे बताया गया है !!
    मैं चाहता हूँ ये लम्हे सहेज लूं दिल में
    रहें, रहें, न रहें कल ये सरफिरे रौशन
    क्षण जी लेना एक कला है और स्मृति इस जिये हुये क्षण की ताबिन्दगी को मद्धम न करें इसलिये अपने वर्तमान को जी लेना चाहिये !! शेर का सानी मिसरा बेहद सुन्दर है !!! और गिरह शानदार है !!
    मैं इक रदीफ़ के ऐसा सुभाव रखता हूँ
    तिरे सुभाव में ढेरों हैं क़ाफ़िये रौशन
    काबोले गौर बात ये है कि रदीफ स्थिर है ( शादे मे दूल्हे के साथ सहबोला को भी रदीफ कहते है ) काफिये परिवर्तंशील है !! इसलिये मेरा मिज़ाज तो अपरिवर्तनीय है लेकिन उसका अन्दाज बदलता है !!!
    इसी लिये तो उसे रौशनाई कहते हैं
    है ख़ुद सियाह मगर ज़ह्नो-दिल करे रौशन
    सियाही और रोशनाई शब्द अपनी आवृत्ति से भी बहुत कुछ कहते है – बहुत सुन्दर शेर कहा है !!
    वो शायरी भी कोई शायरी है शहज़ादे
    जो कर न पाये किसी तौर रतजगे रौशन
    बिन माँगे मिल गये मेरी आँखो को रतजगे
    जब से मै एक चाँद का शैदाई हो गया -कतील
    तुम्हारे वस्ल का लम्हा तो कुछ एक दिन का था
    तुम्हारे हिज्र में हम उम्र भर रहे रौशन
    खूब और खूबसूरत !!!
    है तुझमें इल्म तो अब इल्म का दिखा जलवा
    “क़लम संभाल अँधेरे को जो लिखे रौशन”
    एक पुकार एक चौनौती और एक ललकार अदीबो के लिये इस शेर मे निहित है !!
    भाई इरशाद को “सिकंदर” कहना जाइज ही नही जरूरी भी है !! –मयंक

  10. जिस ग़ज़ल का इन्तज़ार था वो आ गई

    तुम्हारे वस्ल के लम्हे तो कुछ दिनों के थे
    तुम्हारे हिज्र में हम उम्र भर रहे रौशन

    हाय! !!!

    बुझे बुझे मिरी तक़दीर के सितारे थे
    तुम्हारे नाम को सुन सब के सब हुए रौशन

    अहा! !

    तुम्हारा अक्स भी अम्बर पे रक़्स करता है
    हमारे अश्क भी होते हैं दिन ढले रौशन

    क्या कहने भैय्या वाह

    अब कहां तक तारीफ की जाए जब अभी ऐसे ऐसे शेर बाक़ी है ???

    खुली जो आंख तो काली उदास सड़कें थीं
    हुआ था शब मिरे ख़्वाबों का हाइवे रौशन

    मैं चाहता हूँ ये लम्हे सहेज लूं दिल में
    रहें, रहें, न रहें कल ये सरफिरे रौशन

    मैं इक रदीफ़ के ऐसा सुभाव रखता हूँ
    तिरे सुभाव में ढेरों हैं क़ाफ़िये रौशन

  11. वाह… वाह..। इरशाद भाई आनंद आ गया ग़ज़ल पढ़ कर। बहुत उम्‍दा।
    दिल दाद दिल तक पहुंचे।
    शुक्रिया।

  12. वाह !
    क्या सुन्दर ग़ज़ल कही है साहिब
    लाजवाब पेशकश

    इसी लिये तो उसे रौशनाई कहते हैं
    है ख़ुद सियाह मगर ज़ह्नो-दिल करे रौशन

    तुम्हारे वस्ल के लम्हे तो कुछ दिनों के थे
    तुम्हारे हिज्र में हम उम्र भर रहे रौशन

    ये 2 शेर कईं बार पढ़े!!
    बहुत खूब

    Regards
    Nakul

  13. बहुत खू़ब इरशाद भाई। बहुत उम्‍दा कलाम हमेशा की तरह।

  14. खुली जो आंख तो काली उदास सड़कें थीं
    हुआ था शब मिरे ख़्वाबों का हाइवे रौशन

    लाजवाब ग़ज़ल है इरशाद भाई! भरपूर दाद !

  15. इरशाद आप और स्वप्निल अब तक़रीबन फ़ारिग़ुल-इस्लाह हैं. ख़ुद नौमश्क़ शाइरों को रौशनी की राह दिखा रहे हैं। ज़ाहिर है आप लोगों की ग़ज़ल ऐबों से पाक और भरपूर जगमगाती होनी ही चाहिये। और ये ग़ज़ल ऐसी ही है। वाह वाह दाद क़ुबूल फ़रमाइये

  16. खुली जो आंख तो काली उदास सड़कें थीं
    हुआ था शब मिरे ख़्वाबों का हाइवे रौशन

    मैं चाहता हूँ ये लम्हे सहेज लूं दिल में
    रहें, रहें, न रहें कल ये सरफिरे रौशन

    बुझे बुझे मिरी तक़दीर के सितारे थे
    तुम्हारे नाम को सुन सब के सब हुए रौशन

    इसी लिये तो उसे रौशनाई कहते हैं
    है ख़ुद सियाह मगर ज़ह्नो-दिल करे रौशन
    kya badhiya ghazl kahi hai dada ..wahh wahhh..sadar
    -Kanha

  17. लाजवाब ग़ज़ल कही है आपने इरशाद भाई! भरपूर दाद लें!

  18. खुली जो आंख तो काली उदास सड़कें थीं
    हुआ था शब मिरे ख़्वाबों का हाइवे रौशन

    मैं चाहता हूँ ये लम्हे सहेज लूं दिल में
    रहें, रहें, न रहें कल ये सरफिरे रौशन

    मैं इक रदीफ़ के ऐसा सुभाव रखता हूँ
    तिरे सुभाव में ढेरों हैं क़ाफ़िये रौशन

    kaise acche acche she’r hue hain irshad bhai.. waah waah.. poori ghazal umda hai.. daad qubulen…

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