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T-21/3 इबारतें सभी रौशन हैं हाशिये रौशन-शमीम अब्बास

इबारतें सभी रौशन हैं हाशिये रौशन
हैं हर्फ़-हर्फ़ तिरे-मेरे तज़किरे रौशन

चमक-दमक वो बदन की कि आँखें चुंधिया जांय
तमाम दायरे, हर एक ज़ाविये रौशन

उमीदें अब भी दिले-नाउमीद में, गोया
हों दूर-दूर बड़ी दूर क़ुमक़ुमे रौशन

तिरा न होना सबब मेरी शब-बेदारी का
तिरे ही होने से होते हैं रतजगे रौशन

नसीब कैसा ? कहाँ का ? हटाओ, रहने दो
कि हम ही खींचेंगे अब अपने ज़ाइचे रौशन

मज़े की तर्ह निकाली है अब के भाई ‘तुफ़ैल’
रदीफ़ करती रही सारे क़ाफ़िये रौशन

शमीम अब्बास 9029492884

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13 comments on “T-21/3 इबारतें सभी रौशन हैं हाशिये रौशन-शमीम अब्बास

  1. BEHTAREEN GHAZAL HAI, SHAMEEM ABBAAS SAHAB, MUBAARAKBAAD QABOOL KIJIYE

  2. जनाब शमीम अब्बास साहब ग़ज़ल-गोई का एक नया परिचय हैं । कुमकुमे वाला शेर बहुत ही मार्मिक है। बढ़िया ग़ज़ल शमीम साहब। दाद हाज़िर है।

  3. तिरा न होना सबब मेरी शब-बेदारी का
    तिरे ही होने से होते हैं रतजगे रौशन
    आदरणीय शमीम साहब ,उम्दा ग़ज़ल हुई है|दाद हाज़िर है |
    सादर

  4. चमक-दमक वो बदन की कि आँखें चुंधिया जांय
    तमाम दायरे, हर एक ज़ाविये रौशन

    उमीदें अब भी दिले-नाउमीद में, गोया
    हों दूर-दूर बड़ी दूर क़ुमक़ुमे रौशन

    वाह वाह वाह, ऎ सी खूबसूरत गजल सुब्ह सुब्ह पढने को मिल गई मेरा दिन बन गया : भरपूर गजल मुरस्सा गजल …. 🙂

  5. वाह…वाह… बहुत अच्‍छा ग़ज़ल है साहब।
    क्‍या बात…क्‍या बात…।
    दिल से दाद कबूल कीजिए।

  6. अच्छी ग़ज़ल, साथियो ! शमीम अब्बास साहब लखनऊ घराने से हैं। हमारा घराना अपनी साफ़ ज़बान के लिए पहचाना-माना जाता है। आप उस्तादों की सुहबत उठाये हुए शख़्स हैं और अब अपनी क़लम का लोहा मनवाये हुए बजाते-ख़ुद उस्ताद हैं। मुहावरेदार, सलीस ज़बान। बहुत मद्धम आंच पर पकी सौंधी खीर की तरह भरपूर ज़ायकेदार। उन्हें पढ़ना ज़ह्न के जाले साफ़ करने की तरह है।

  7. kya kahne dada…kya khoob ash’aar nikale hain..waahh..sadar
    -kanha

  8. इसे कहते हैं रौशन ग़ज़ल! शमीम अब्बास साहब ज़िंदाबाद!

  9. dada kya hi acchi ghazal hui hai… aur
    चमक-दमक वो बदन की कि आँखें चुंधिया जांय
    तमाम दायरे, हर एक ज़ाविये रौशन

    उमीदें अब भी दिले-नाउमीद में, गोया
    हों दूर-दूर बड़ी दूर क़ुमक़ुमे रौशन

    ye do she’r to qahr hain… waah waah…

  10. पहले जब शब्द चमत्कार बहुत मन मोहता था तब मुझे दाग़ देहलवी बहुत पसन्द थे !! बाद मे इल्म हुआ कि शाइरी between the lines का संवाद है और लहजा इसमे सबसे बडी भूमिका निभाता है !! ख़्याल की नाज़ुकी और इज़हार की नर्मी शेर की ज़ीनत होती है !!! अब असातिज़ा के बयान इसी परिभाषा को प्रगाढ करने के सिलसिले की कडी बनते जा रहे है !!
    शमीम साहब की ग़ज़ल का इस स्टेज पर आना यकीनन आने वालो को बहुत प्रेरणा देगा !!!
    इबारतें सभी रौशन हैं हाशिये रौशन
    हैं हर्फ़-हर्फ़ तिरे-मेरे तज़किरे रौशन
    मेरा नाम तेरे नाम के साथ है इसलिये पूरी दासतान रौशन है !! प्रेम और समर्पण का खूबसूरत रंग !!!
    चमक-दमक वो बदन की कि आँखें चुंधिया जांय
    तमाम दायरे, हर एक ज़ाविये रौशन
    इस शेर को चाहे तूर के जल्वे से जोडिये चाहे महबूब के दीदार से उतना ही खूबसूरत लगेगा !!!
    उमीदें अब भी दिले-नाउमीद में, गोया
    हों दूर-दूर बड़ी दूर क़ुमक़ुमे रौशन
    क्या तश्बीह है वाह वाह क्या बात है !!! क्या मंज़र है और क्या सिमिली है !! बहुत खूब !!
    तिरा न होना सबब मेरी शब-बेदारी का
    तिरे ही होने से होते हैं रतजगे रौशन
    उसके न होने से ही मर्कज़े ख्याल मे तो वही है इसलिये शब बेदारी का सबब भी वही है और उसी के सबब रतजगे रौशन हुये है !! इस शेर मे एक ज़ाविया ये भी है कि ईश्वर का न होना इन्द्रियो का अनुभव है और होना आस्तिक श्रद्धा का -इसलिये– या निशा सर्वभूतानाम तस्यामि जागर्ति संयमी ( समस्त प्राणी जिस नाशवान और क्षनभंगुर संसार मे जब सोते है तो सन्यमी या तत्व्द्रष्टा उसमे जागता है) के भाव की भी व्यंजना इस शेर मे बेहद खूबसूरती से हो रही है !!!
    नसीब कैसा ? कहाँ का ? हटाओ, रहने दो
    कि हम ही खींचेंगे अब अपने ज़ाइचे रौशन
    अना और खुद्दारी की बात है— तकदीर है क्या मै क्या जानूँ मै आशिक हूँ तदबीरों का …
    मज़े की तर्ह निकाली है अब के भाई ‘तुफ़ैल’
    रदीफ़ करती रही सारे क़ाफ़िये रौशन
    एक व्यक्तिगत अन्दाज़ मे मार्के की बात कही है !! इस गज़ल की रदीफ खुद मे एक चराग़ है –जिसकी आँखों मे बीनाई और कलम मे रोशनाई है वो इस पर तब्त आज़माइश करें –वाह वाह !!!!
    शमीम अब्बास साहब !! regards –मयंक

  11. रदीफ़ करती रही सारे क़ाफ़िये रौशन
    वाह वाह वाह कितनी खूबसूरत गिरह बांधी है – सुभान अल्लाह। पूरी ग़ज़ल कमाल है। दाद कबूलें

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