13 टिप्पणियाँ

T-21/2 हयात जब से हुई मेरी इल्म से रौशन-समर कबीर

हयात जब से हुई मेरी इल्म से रौशन
हवा के सामने मेरा चराग़ है रौशन

जब आँखें हो गयीं मानूस इन अंधेरों से
हमारी राह में किसने किये दिये रौशन

सज़ा मिली है कि बस्ती में रह नहीं सकता
क़ुसूर ये था कि मेरे ख़याल थे रौशन

यही अमल है हर इक रात हम फ़क़ीरों का
तुम्हारे ज़िक्र से करते हैं रतजगे रौशन

ये कमनसीबी हमारी कि हम नहीं पढ़ते
कलामे-पाक का एक एक हर्फ़ है रौशन

भटक न जाऊँ अंधेरों में इसलिये रब ने
ये चाँद तारे मिरे वास्ते किये रौशन

किसी के घर में दिया भी नहीं जलाने को
किसी के बंगले में फ़ानूस हो गये रौशन

कहाँ वो दौरे-ख़राबात की हसीं यादें
हमारे नाम से होते थे मैक़दे रौशन

ये और बात “समर” बुझ गयीं मिरी आँखें
ख़ुदा के फ़ज़्ल से अब तक दिमाग़ है रौशन

समर कबीर 9753845522

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13 comments on “T-21/2 हयात जब से हुई मेरी इल्म से रौशन-समर कबीर

  1. जब आँखें हो गयीं मानूस इन अंधेरों से
    हमारी राह में किसने किये दिये रौशन

    यही अमल है हर इक रात हम फ़क़ीरों का
    तुम्हारे ज़िक्र से करते हैं रतजगे रौशन

    भटक न जाऊँ अंधेरों में इसलिये रब ने
    ये चाँद तारे मिरे वास्ते किये रौशन UMDA ASH’AAR NIKALE HAI’N JANAAB

  2. अच्छी ग़ज़ल पेश की है भाई। बहुत बहुत बधाई।

  3. सज़ा मिली है कि बस्ती में रह नहीं सकता
    क़ुसूर ये था कि मेरे ख़याल थे रौशन

    यही अमल है हर इक रात हम फ़क़ीरों का
    तुम्हारे ज़िक्र से करते हैं रतजगे रौशन
    आदरणीय समर साहब ,सभी अशहार लासानी हुये हैं |इस शेर पर तो जान कुर्बान
    कहाँ वो दौरे-ख़राबात की हसीं यादें
    हमारे नाम से होते थे मैक़दे रौशन
    दिली मुबारकबाद कबूल फरमावें |
    सादर

  4. सज़ा मिली है कि बस्ती में रह नहीं सकता
    क़ुसूर ये था कि मेरे ख़याल थे रौशन

    समर साहब।
    दाद हाजि़र है।

  5. सज़ा मिली है कि बस्ती में रह नहीं सकता
    क़ुसूर ये था कि मेरे ख़याल थे रौशन

    क्या ही अच्छे अच्छे शेर निकाले है आप ने कबीर जी, वाह दिल खुश हो गया 🙂

  6. samar kabeer saheb aapki gazal pari 9 sher sab hi ek se barkar ek es bar ki tarahi main muskil misra tha lekin aapne es muskil zameen main bhi bari aasani se sher nikaal diye yeh aapki ustadi hi ka kamaal hai हयात जब से हुई मेरी इल्म से रौशन
    हवा के सामने मेरा चराग़ है रौशन
    bara achcha matla kha hai ilm ki roshni se jab zindagi roshan ho jati hai to jahaalat ki hawa ke samne ilm ka charg hamesha roshan rehta hai

    सज़ा मिली है कि बस्ती में रह नहीं सकता
    क़ुसूर ये था कि मेरे ख़याल थे रौशन
    schchai liye hua sher hai roshan khayal insaan ko moashara bardasht nahi karta

    यही अमल है हर इक रात हम फ़क़ीरों का
    तुम्हारे ज़िक्र से करते हैं रतजगे रौशन
    khuda ke zikr se fakeer hi ratjage roshan karta hai aaj kal malik ko yaad karne ka insaan ke paas din main bhi waqt nahi hai

    ये कमनसीबी हमारी कि हम नहीं पढ़ते
    कलामे-पाक का एक एक हर्फ़ है रौशन
    is sher main aapne haqeekat bayani ki hai waqahi yeh hamari kamnaseebi hai ke ham is muqaddas kitab ko samajh kar nahi parte varna khuda ne us ke andar har mushkeel ka har pareshani ka hal rakha hai

    भटक न जाऊँ अंधेरों में इसलिये रब ने
    ये चाँद तारे मिरे वास्ते किये रौशन
    khuda ne insaan ke liye hazaroo lakho niyamat roshan ki hai lekin phir bhi banda us se na ummeed ho kar bhatak jata hai sher lajawab hai

    किसी के घर में दिया भी नहीं जलाने को
    किसी के बंगले में फ़ानूस हो गये रौशन
    aajkal mere Hindustan ka yahi haal hai ameer aur ameer ho raha hai gareeb bechara wahi khara hai jha wo khara tha kisi ko us ki phikr nahi aapne is sher ke zariye gariboo ki aawaz uthai hai

    ये और बात “समर” बुझ गयीं मिरी आँखें
    ख़ुदा के फ़ज़्ल से अब तक दिमाग़ है रौशन
    bara khubsurat maqta hai meri khuda se dua hai aapke dimag ki tarah aapki aankhe bhi hamesha roshan rahe
    puri gazal bahut bariya hai aapke ek ek sher ki likhawat main ustadi ki siyahi jhalkti hai meri bahut bahut daad kabool kijiye

  7. भाई क्या ही अच्छी ग़ज़ल कही । पहले तीनों शेर लगातार छक्के हैं। वाह-वाह दाद क़ुबूल फ़रमाइये

    हयात जब से हुई मेरी इल्म से रौशन
    हवा के सामने मेरा चराग़ है रौशन

    जब आँखें हो गयीं मानूस इन अंधेरों से
    हमारी राह में किसने किये दिये रौशन

    सज़ा मिली है कि बस्ती में रह नहीं सकता
    क़ुसूर ये था कि मेरे ख़याल थे रौशन

  8. हयात जब से हुई मेरी इल्म से रौशन
    हवा के सामने मेरा चराग़ है रौशन
    तमसो मा ज्योतिर्गमय !! की भावभूमि की स्रष्टि कर रहा है मतला !! मजबूत शेर कहा है !!
    जब आँखें हो गयीं मानूस इन अंधेरों से
    हमारी राह में किसने किये दिये रौशन
    किसी अनजान फरिश्ते को दुआ दी गई है शेर मे !!ख्याल को पैकर देने का काम पाठक पर छोड दिया गया है !!
    सज़ा मिली है कि बस्ती में रह नहीं सकता
    क़ुसूर ये था कि मेरे ख़याल थे रौशन
    ये हर मंसूर और हर सुकरात के कहानी है !! बहुत खूब शेर कहा है !!
    यही अमल है हर इक रात हम फ़क़ीरों का
    तुम्हारे ज़िक्र से करते हैं रतजगे रौशन
    तस्लीम!!! फकीरो की सदा यही है !! कह गये कबीरदास – वे दिन गये अकारथी हरि सेकियो न हेत // अब पछताये होत का जब चिडिया चुग गई खेत !!!
    ये कमनसीबी हमारी कि हम नहीं पढ़ते
    कलामे-पाक का एक एक हर्फ़ है रौशन
    पवित्र पुस्तक के बारे मे बयान बिल्कुल सही है और अव्वल मिसरा भी बेहतरीन कहा है !!
    भटक न जाऊँ अंधेरों में इसलिये रब ने
    ये चाँद तारे मिरे वास्ते किये रौशन
    कई सितारों को मै जानता हूँ बचपन से
    जहाँ भी जाऊँ मेरे कई साथ साथ चलते है –बशीर
    चाँद सितारे वो ताबिन्दा किरदार हैं जिनसे हमें अन्धेरों मे सफर तय करने की प्रेरणा मिलती है!!!
    किसी के घर में दिया भी नहीं जलाने को
    किसी के बंगले में फ़ानूस हो गये रौशन
    कही कोई कलाई एक चूडी को तरसती है
    कही कंगन के झटके से कलाई टूट जाते है –मुनव्वर
    कहाँ वो दौरे-ख़राबात की हसीं यादें
    हमारे नाम से होते थे मैक़दे रौशन
    ध्यान रहे किसी मंज़िल के फरेब मे आवारगी की लाज न चली जाय !! बहुत बिन्दास शेर है !!
    ये और बात “समर” बुझ गयीं मिरी आँखें
    ख़ुदा के फ़ज़्ल से अब तक दिमाग़ है रौशन
    और ये हासिल भी है ज़िन्दगी का कि सूरत नही सीरत पर आँच नही आनी चाहिये वक़्त की !!
    समर कबीर साहब !! मुबारकबाद कुबूल कीजिये !! ज़बर्दस्त इख्तियार है आपका अपने इज़हार पर !! बहुत खूब !! –मयंक

  9. प्रणाम समर जी,

    क्या बात है !!

    बहुत उम्दा ख्यालों से सजी ये ग़ज़ल

    सज़ा मिली है कि बस्ती में रह नहीं सकता
    क़ुसूर ये था कि मेरे ख़याल थे रौशन

    यही सत्य है, सच्चाई आज के ज़माने में गुनाह है.

    कहाँ वो दौरे-ख़राबात की हसीं यादें
    हमारे नाम से होते थे मैक़दे रौशन
    बहुत खूब ||
    आनंद मिला आपकी ग़ज़ल पढ़ के
    Nakul

  10. सज़ा मिली है कि बस्ती में रह नहीं सकता
    क़ुसूर ये था कि मेरे ख़याल थे रौशन
    badhiya she’r hua hai samar sahab… daad qubulen

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