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तरही-21/1 हुए हैं फिर से अंधेरों के हौसले रौशन-नवनीत शर्मा

हुए हैं फिर से अंधेरों के हौसले रौशन
‘क़लम संभाल अंधेरे को जो लिखे रौशन’

ये सूखी झीलें थीं इनमें कहाँ से आई बाढ़
हमारी आंखों में हैं किसके तजरुबे रौशन

ये और बात हवा ने बुझा दिए काफ़ी
तुम्‍हारी याद के लेकिन हैं कुछ दिये रौशन

तुम्हें चमकना है तो लिक्खो हमको सफ़हों पर
हमारे होने से होते हैं हाशिये रौशन

उदास शाम है और सारे बैंच ख़ाली हैं
कोई ज़माना था होते थे क़हक़हे रौशन

ज़रा सी देर को साये में उनके आया था
यक़ीन जानो, हुए सारे ज़ाविये रौशन

मेरे क़रीब कोई खा़ब कैसे आ पाता
कि मुझमें रहते हैं बरसों से रतजगे रौशन

अब उनपे धुंध, क़यामत की धुंध तारी है
तुम्‍हारे साथ जो होते थे मरहले रौशन

हक़ीक़तन उसे देखा कहां है मुद्दत से
हैं जिसकी दीद के खा़बों में वाक़ये रौशन

गिरे जो याद की जैकेट पे याद के फा़हे
अंधेरे दिल में हुए ख़ूब वलवले रौशन

किया मुआफ़ जो इक-दूसरे से दूर रहे
क़रीब आये, हुए सारे फ़ासले रौशन

मैं तीरगी सही लेकिन कभी कभी मुझमें
हुजू़र कोई तो पहलू निकालिये रौशन

मैं गा़रे-ज़ब्‍त में कब तक छुपा रहूं साहब
मेरी फि़राक़ में रहते हैं मसअले रौशन

ये उसके काम के हैं अब न मेरे काम के हैं
हुए जो दिल की कचहरी में फ़ैसले रौशन

हज़ारों गांव की पगडंडिंयों पे फैली हुई
लुटी चमक तो हुए देख हाइवे रौशन

नवनीत शर्मा 09418040160

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29 comments on “तरही-21/1 हुए हैं फिर से अंधेरों के हौसले रौशन-नवनीत शर्मा

  1. वाह वाह वाह बढ़िया ग़ज़ल। मुबारकबाद कुबूल करें नवनीत।

  2. ये सूखी झीलें थीं इनमें कहाँ से आई बाढ़
    हमारी आंखों में हैं किसके तजरुबे रौशन

    ये और बात हवा ने बुझा दिए काफ़ी
    तुम्‍हारी याद के लेकिन हैं कुछ दिये रौशन

    तुम्हें चमकना है तो लिक्खो हमको सफ़हों पर
    हमारे होने से होते हैं हाशिये रौशन

    ज़रा सी देर को साये में उनके आया था
    यक़ीन जानो, हुए सारे ज़ाविये रौशन
    आदरणीय नवनीत भाईसाहब .तमाम मुमकिन काफ़ियों के साथ रदीफ़ को रौशन करते हुये आपने क्या ही नायाब शेर निकाले हैं|हर शेर में सोच के नये ज़ाविये है |बहुत बहुत शुभकामनाएँ और दिली मुबारकबाद
    सादर

    • खु़रशीद भाई। आप हमेशा इतना स्‍नेह देते हैं कि कई बार भावुक होने लगता हूं। आप ख़ुद बहुत अच्‍छे शायर हैं इसलिए आपकी तारीफ़ दिल में सहेज ली है।
      सादर
      नवनीत

  3. मैं तीरगी सही लेकिन कभी कभी मुझमें
    हुजू़र कोई तो पहलू निकालिये रौशन

    Aha ha…kya kamaal ghazal hui hai bhai…dili daad kaboolen

    • आदरणीय नीरज भाई साहब।
      हौसला बढ़ाने के लिए शुक्रिया।
      स्‍नेह बनाए रखें।
      नवनीत

  4. मैं तीरगी सही लेकिन कभी कभी मुझमें
    हुजू़र कोई तो पहलू निकालिये रौशन

    Waah Navneetji… bahut achhi gazal Hui hai…Dili mubaraqbaad 🙂

  5. सभी हज़रात का हौसलाअफ़जा़ई के लिए शुक्रिया।

  6. धन्‍यवादी हूं आदरणीय मयंक भाई साहब। आपकी टिप्‍पणी बहुत आत्‍मविश्‍वास जगाती है।

  7. नवनीत ज़िंदाबाद, पूरी ग़ज़ल मुरस्सा। चुस्त ज़बान, ख़यालों की भरपूर अक्कासी । तरही की शाख़ से पहला फल बहुत मीठा और रसीला उतरा। मुबारकबाद

  8. Tarahi ko kya jabardast shuruaat di hai bhaiya aapne…sare she’r khoob hain…

    ये और बात हवा ने बुझा दिए काफ़ी
    तुम्‍हारी याद के लेकिन हैं कुछ दिये रौशन

    मैं तीरगी सही लेकिन कभी कभी मुझमें
    हुजू़र कोई तो पहलू निकालिये रौशन
    inka jawab nhi’n….dhero’n daad..sadar
    -kanha

  9. निहायत उम्दा ग़ज़ल हुई है नवनीत भाई! दिल से निकली दाद आप तक पहुंचे!

  10. आदरणीय नवनीत जी
    प्रणाम

    बहुत सुन्दर ग़ज़ल से आगाज़ हुआ है इस महफ़िल का |
    सभी शे’र कमाल कर रहे हैं |
    ये शे’र मुझे बहुत ख़ास लगे…

    ये और बात हवा ने बुझा दिए काफ़ी
    तुम्‍हारी याद के लेकिन हैं कुछ दिये रौशन

    गिरे जो याद की जैकेट पे याद के फा़हे
    अंधेरे दिल में हुए ख़ूब वलवले रौशन
    (शिमला के दिन याद आ गए)

    मैं तीरगी सही लेकिन कभी कभी मुझमें
    हुजू़र कोई तो पहलू निकालिये रौशन

    बहुत बहुत मुबारकबाद |
    भवदीय
    नकुल

    • नकुल साहब।
      बड़ा करम। बहुत शुक्रिया।
      स्‍नेह बना रहेगा ऐसी आशा है।
      सादर
      नवनीत

  11. मेरे क़रीब कोई खा़ब कैसे आ पाता
    कि मुझमें रहते हैं बरसों से रतजगे रौशन
    वाह वाह क्या बेहतरीन शेर है।
    ग़ज़ल पर ढेरों दाद क़ुबूल करें।

  12. उम्दा ग़ज़ल कही है नवनीत जी आपने।
    दिली दाद क़ुबूल करें।

    सादर
    पूजा भाटिया

  13. ये और बात हवा ने बुझा दिए काफ़ी
    तुम्‍हारी याद के लेकिन हैं कुछ दिये रौशन

    मैं तीरगी सही लेकिन कभी कभी मुझमें
    हुजू़र कोई तो पहलू निकालिये रौशन

    bahut umda ghazal hui hai navneet bhai.. aur ye do she’r to bahut hi pasand aaye… daad qubulen

    • स्‍वप्निल भाई आपका आभार। कमेंट के लिए भी और मुझे स्‍पैम से निकालने के लिए भी। अब मेरे कमेंट्स दिख रहे हैं।
      शुक्रिया।

  14. तरही मिसरा अपनी भाव भूमि मे एक से अधिक ज़ाविये रखता है इसलिये इसका निर्वाह मुश्किल है !! बाकी “रौशन” रदीफ पर भी शेर बाँधना पसमंज़र की दरकार रखता है इसलिये यकीनन ज़मीन मुश्किल है !!!
    हुए हैं फिर से अंधेरों के हौसले रौशन
    ‘क़लम संभाल अंधेरे को जो लिखे रौशन’
    मतले मे जो लिखे रौशन उस भाव भूमि की स्रष्टि कर रहा है – जैसा कि जिगर ने कहा है –”मेरा पैगाम मुहब्बत है जहाँ तक पहुंचे “” जहाँ तक ??!!!! दोनो अर्थ रखता है !! मतला आपका कामयाब है नवनीत भाई !!!
    ये सूखी झीलें थीं इनमें कहाँ से आई बाढ़
    हमारी आंखों में हैं किसके तजरुबे रौशन
    काफिये का बेहतरीन इस्तेमाल किया है !!
    ये और बात हवा ने बुझा दिए काफ़ी
    तुम्हाबरी याद के लेकिन हैं कुछ दिये रौशन
    तस्लीम!! पुराना ख्याल है !!
    तुम्हें चमकना है तो लिक्खो हमको सफ़हों पर
    हमारे होने से होते हैं हाशिये रौशन
    बहुत सुन्दर शेर कहा है काफिया भी बोल रहा है !!!
    उदास शाम है और सारे बैंच ख़ाली हैं
    कोई ज़माना था होते थे क़हक़हे रौशन
    इस शेर से समाज मे बढती अंतर्मुखी प्रवृत्ति और लोकाचार का अभाव छन कर आ रहा है
    ज़रा सी देर को साये में उनके आया था
    यक़ीन जानो, हुए सारे ज़ाविये रौशन
    ये शेर भी अच्छा है कहन का तसाद अर्थपूर्ण अभिव्यक्ति पर समाप्त हुआ है !!!
    मेरे क़रीब कोई खा़ब कैसे आ पाता
    कि मुझमें रहते हैं बरसों से रतजगे रौशन
    वाह वाह दाद !!! दाद !!
    अब उनपे धुंध, क़यामत की धुंध तारी है
    तुम्हाेरे साथ जो होते थे मरहले रौशन
    मै तेरे साथ सितारों से गुज़र सकता हूँ
    कितना आसान मुहब्बत का सफर लगता है-बशीर
    और तेरे बगैर मरहलों पे धुन्ध तारी है !! वाह !!
    हक़ीक़तन उसे देखा कहां है मुद्दत से
    हैं जिसकी दीद के खा़बों में वाक़ये रौशन
    विप्रलम्भ श्रंगार का सुन्दर पुट है शेर मे !!
    किया मुआफ़ जो इक-दूसरे से दूर रहे
    क़रीब आये, हुए सारे फ़ासले रौशन
    शेर थोडा अस्पष्ट है !! फासले रौशन से सुन्दर अर्थ निकलता है लेकिन सानी मिसरे का निर्वाह किस प्रकार हो पाया है इसमे संशय है !!!
    मैं तीरगी सही लेकिन कभी कभी मुझमें
    हुजू़र कोई तो पहलू निकालिये रौशन
    बहुत खूब वाह वाह !!!
    रात की कोख से सूरज भी नुमाया कर दे
    वक़्त के पास तो जादू की छडी रहती है –मयंक
    मैं गा़रे-ज़ब्ती में कब तक छुपा रहूं साहब
    मेरी फि़राक़ में रहते हैं मसअले रौशन
    इस शेर पर भी भरपूर दाद !!!
    ये उसके काम के हैं अब न मेरे काम के हैं
    हुए जो दिल की कचहरी में फ़ैसले रौशन
    बन्द कमरे मे तिरी तस्वीर रख कर सामने
    ख्वाहिशों संग साँप सीढी खेलता रहता हूँ मै
    &
    मुहब्बत आखिरश ले आई है इक बन्द कमरे मे
    तिरी तस्वीर अब देखूँगा , खुद तस्वीर होने तक
    दिल की कचहरी के फैसले एक्स्क्लूसिव होटल है इसलिये किसी के काम नहीं आते –न मुल्जिम न मुजरिम न मुंसिफ किसी के काम के नही –वाह वाह !!!
    हज़ारों गांव की पगडंडिंयों पे फैली हुई
    लुटी चमक तो हुए देख हाइवे रौशन
    शेर का मफ्हूम भले ही रहतदेह न हो लेकिन फिक्रो फ़न के लिहाज से बेहतरीन कहा है !!!
    नवनीत भाई नशिस्त को सुन्दर आगाज़ देने के लिये बहुत बहुत बधाई !!! –मयंक

  15. मैं तीरगी सही लेकिन कभी कभी मुझमें
    हुजू़र कोई तो पहलू निकालिये रौशन

    वाह हुजूर तहे दिल से दाद हाजिर है…

  16. अब उनपे धुंध क़यामत की धुंध तारी है
    तुम्हारे साथ जो होते थे मरहले रोशन

    वाहह वआह्ह्
    शानदार ग़ज़ल के साथ शानदार आगाज़

    ढेर सारी मुबारकबाद भैया

    regards
    ALok

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