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ग़ज़ल:- दश्त की थी धूप मैं, था शाख़ पर मकाँ मिरा-पूजा भाटिया

दश्त की थी धूप मैं, था शाख़ पर मकाँ मिरा
चुभ रहा था तीरगी को कब से आशियाँ मेरा

किस तरह से पायेगा निजात ग़म से दिल मुआ
जब मुझे यक़ीन ये, मकीं मिरा मकां मिरा

मेरी तिश्नगी को पी न जायें ये सराब और
मंज़िलों की चाह में सफ़र हो रायगाँ मिरा

बाँटने चला था जो मुझी से मुझको देखिये
बंट के रह गया वही, बचा रहा जहां मिरा

पूजा भाटिया 08425848550

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4 comments on “ग़ज़ल:- दश्त की थी धूप मैं, था शाख़ पर मकाँ मिरा-पूजा भाटिया

  1. Bahut achhi ghazal hui hai Puja ji..matla aur dusra she’r khas tour pe pasand aaye
    -Kanha

  2. उम्दा

    यक़ीनन बेहतरीन

    बधाई

  3. किस तरह से पायेगा निजात ग़म से दिल मुआ
    जब मुझे यक़ीन ये, मकीं मिरा मकां मिरा

    अहाहा —दिल मुआ — क्या बात कही है , वाह. बहुत खूबसूरत ग़ज़ल। मतले के मिसरा -ऐ-सानी में भी मेरा की जगह मिरा कर लें।

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