8 टिप्पणियाँ

ग़ज़ल-आसां तो न था धूप में सहरा का सफ़र कुछ-सौरभ शेखर

आसां तो न था धूप में सहरा का सफ़र कुछ
बाफ़ैज़ मगर मिलते रहे मुझको शजर कुछ

पुर्सिश न करो, मुझसे मिरा हाल न पूछो
उखड़ा सा ज़रा रहता है जी मेरा इधर कुछ

सैलाब नहीं हो तो न हो दरिया-ए-दिल में
पानी तो रहे डूब के मरने को मगर कुछ

इतना ही ग़नी है जो समंदर तो कहो वो
साहिल पे बहा लाये कभी लालो-गुहर कुछ

नाज़िल है ये उजला सा अँधेरा जो फ़ज़ा पर
मुमकिन है कि इस शब में हो पैबस्त सहर कुछ

आवाज़ भी लहराई थी, हलचल भी हुई थी
इक पल को तो कुछ उभरा था, आया था नज़र कुछ

शानों का ये ख़म तुझमें नई बात है ‘सौरभ’
आईना कभी देखो, रखो अपनी ख़बर कुछ

सौरभ शेखर 09873866653

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8 comments on “ग़ज़ल-आसां तो न था धूप में सहरा का सफ़र कुछ-सौरभ शेखर

  1. कठिन रदीफ़ में बहुत अच्छी ग़ज़ल. जीते रहिये, बने रहिये

  2. Bahut umdaa ghazal hai bhaiya..badi khubsoorati se ek ek ash’aar nikala hai aapne..waahhhh
    -kanha

  3. عمدہ ہے جناب۔

    اتنا ہی غنی ہے جو سمندر تو کہو وہ
    ساحل پہ بہا لاءے کبہی لعل و گہر کچھ

  4. सैलाब नहीं हो तो न हो दरिया-ए-दिल में
    पानी तो रहे डूब के मरने को मगर कुछ

    वाह वाह वाह बेहतरीन ग़ज़ल कही है सौरभ भाई वाह , हर शेर कमाल है – जियो

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