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सात ग़ज़लें – नवीन सी. चतुर्वेदी

हम वही नादाँ हैं जो ख़्वाबों को धर कर ताक पर
जागते ही रोज़ रख देता है ख़ुद को चाक पर

दिल वो दरिया है जिसे मौसम भी करता है तबाह
किस तरह इलज़ाम धर दें हम किसी तैराक पर

हम तो उस के ज़ह्न की उरयानियों पर मर मिटे
दाद अगरचे दे रहे हैं जिस्म और पौशाक पर

हम बख़ूबी जानते हैं बस हमारे जाते ही
कैसे-कैसे गुल खिलेंगे इस बदन की ख़ाक पर

और कब तक आप ख़ुद से दूर रक्खेंगे हमें
अब हमारे घर बनेंगे आप के अफ़लाक पर

आइये अज़दाद की तहज़ीब से माँगें पनाह
कर दिया शबख़ून फिर तिरयाक ने इदराक पर

बात और ब्यौहार ही से जान सकते हैं इसे
इल्म की इमला लिखी जाती नहीं पौशाक पर

उन के ही रू, आब की ख़ातिर तरसते हैं ‘नवीन’
ग़ौर फ़रमाते नहीं जो ज़ह्न की ख़ूराक पर

*

*

हँसते-हँसते गुजार देते हैं हर गुजरते हुये समय के लोग
ख़ामुशी को ज़ुबान देते हैं शोर करते हुये समय के लोग

हम ने साहिल बनाये दरिया पर और आतिश को फैलने न दिया
हाय! क्या-क्या समेट लेते थे उस बिखरते हुये समय के लोग

ऐ तरक़्क़ी जवाब दे हम को बोल किस-किस पे रड़्ग उँड़ेल आयी
इतना बेरड़्ग हो नहीं सकते रड़्ग भरते हुये समय के लोग

जो भी उस पार उतर गये एक बार फिर कभी लौट कर नहीं आये
तैरना भूल जाते हैं शायद पार उतरते हुये समय के लोग

सूर तुलसी कबीर के किरदार हम को ये ही सबक सिखाते हैं
ऊँची-ऊँची उड़ान भरते हैं पर कतरते हुये समय के लोग

स्वर्ग जैसी वसुन्धरा अपनी जाने कब की बना चुके होते
रोक लेते हैं एक तो हालात और डरते हुये समय के लोग

बन्दगी सब से आला कोशिश है और इबादत मशक़्क़ते-उम्दाह
इसलिये ही तो मस्त रहते हैं रब सुमरते हुये समय के लोग

*

*

हम अगर चाहें तो बेबात मचल सकते हैं
और चाहें तो खिलौनों से बहल सकते हैं

उम्र बस इतनी समझ लीजे कि जब चाहें तब
पार्क में जा के फिसलनी पे फिसल सकते हैं

आप का ज़िक्र है सो बोल रहे हैं वरना
लफ्ज़ तो आँखों के रसते भी निकल सकते हैं

थक चुके जिस्म तो अब दौड़ लगाने से रहे
हाँ मगर वक़्त की रफ़्तार बदल सकते हैं

दिल में संयम की अगर बर्फ़ जमा लें तो ‘नवीन’
एन मुमकिन है कि सूरज को निगल सकते हैं

*

*

उठा के हाथ में खञ्जर मेरी तलाश न कर
अगर है तू भी सिकन्दर मेरी तलाश न कर

दरस-परस के सिवा कौन जान पाया मुझे
मुझी से आँख चुरा कर मेरी तलाश न कर

अगर सुगन्ध की मानिन्द उड़ नहीं सकता
तो घर में बैठ बिरादर मेरी तलाश न कर

अभी अँधेरों के दर पर दिये जले हैं कहाँ
हसीन रात के लश्कर मेरी तलाश न कर

मैं वो हूँ जिस को अनासिर सलाम करते हैं
ख़ला के खोल के अन्दर मेरी तलाश न कर

किसी के दिल को दुखाना मुझे दुखाना है
किसी के दिल को दुखा कर मेरी तलाश न कर

मैं ख़ुद ख़ुदा हूँ कहीं भी रहूँ मेरी मरज़ी
तू सिर्फ़ अपनी डगर पर मेरी तलाश न कर

*

*

पहले तो हम को पड़्ख हवा ने लगा दिये
और फिर हमारे पीछे फ़साने लगा दिये

दुनिया हमारे नूर से वैसे भी दड़्ग थी
और उस पे चार-चाँद पिया ने लगा दिये

तारे बेचारे ख़ुद भी सहर के हैं मुन्तज़िर
सूरज ने उगते-उगते ज़माने लगा दिये

ऐ कारोबारे-प्यार ख़सारा ही कुछ उतार
साँसों ने बेशुमार ख़ज़ाने लगा दिये

कुछ यूँ समय की जोत ने रौशन किये दयार
हम जैसे बे-ठिकाने ठिकाने लगा दिये

कमज़ोर याददाश्त को मज़बूत यूँ किया
यादों के इर्द-गिर्द तराने लगा दिये

*

*

ऐसा ठुकराया है किसी की यादों ने
जैसे पिंजड़े खोल दिये सय्यादों ने

उस पत्थर-दिल को शायद मालूम नहीं
लैला को मशहूर किया फ़रियादों ने

दिल टूटे, साँसें उखड़ीं तब राज़ खुला
महल सम्हाले रक्खे थे बुनियादों ने

इश्क़ इसे कहिये या फिर कहिये बैराग
ठण्डा कर डाला है सुलगती यादों ने

राम तो बन गये अवध-नरेश मगर साहब
मन का मन्दर लूट लिया मरयादों ने

*

*

क्षमानुराग सतत वर रहे क्षरण मित्रो
कहीं अनिष्ट न कर दें दुराचरण मित्रो

हमें बस एक दशानन-कथा स्मरण है बस
अनेक बार हुआ है सिया-हरण  मित्रो

समाज-शास्त्र अभिप्राय को तरसता है
कहीं बिगाड़ न दें हम समीकरण मित्रो

स-हर्ष नष्ट करे है विरोध के अवसर
नितान्त नेष्ट नहीं है वशीकरण मित्रो

भविष्य उज्ज्वलतम किस तरह बनायेगा
उदारवाद प्रवर्तित निजीकरण मित्रो

*
:- नवीन सी. चतुर्वेदी

+91 9967024593

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About Navin C. Chaturvedi

www.saahityam.org 09967024593 navincchaturvedi@gmail.com http://vensys.in

One comment on “सात ग़ज़लें – नवीन सी. चतुर्वेदी

  1. इस पोर्टल पर तरही ग़ज़लें आते ही पर्यटकों की भीड़ उमड़ पड़ती है। कमेण्ट देना वैसे भी इतना अधिक महत्वपूर्ण नहीं है मगर क्या हमें non-tarhi ghazalein भी [कम से कम] पढ़नी नहीं चाहिये? इस पोस्ट को बीते 19 दिनों में कुल जमा 27 लोगों ने पढ़ा है जिस में से 2-3 फेरे तो मेरे ही होंगे 🙂

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