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ग़ज़ल:- हवाओं के मुक़ाबिल हूँ-पूजा भाटिया

हवाओं के मुक़ाबिल हूँ
चराग़ों की वो महफ़िल हूँ

ख़ुदा जाने कंहाँ हूँ मैं
न बाहर हूँ न शामिल हूँ

मिरे कांधे पे वो बिखरे
हैं मौज इक वो मैं साहिल हूँ

ये चादर, सलवटें, तकिया
बताते हैं, मैं ग़ाफ़िल हूँ

मैं जो चाहे वो पा लूं, पर
अभी ख़ुद ही से ग़ाफ़िल हूँ

यहां सच बेसहारा है
सहारा दूँ? मैं बातिल हूँ

उमीदें तुम से रखती हूँ
कहो तो कितनी जाहिल हूँ

जुआ है ज़िन्दगी जैसे
जो जीते उसको हासिल हूँ

रहे ज़द में जुनूँ जिसके
उसी को फिर मैं हासिल हूँ

पूजा भाटिया 08425848550

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3 comments on “ग़ज़ल:- हवाओं के मुक़ाबिल हूँ-पूजा भाटिया

  1. आज भी कोई ख़लिश हैं जहन में
    भरा गिलास भी आज खाली सा हैं

  2. मिरे कांधे पे वो बिखरे
    हैं मौज इक वो मैं साहिल हूँ

    ये चादर, सलवटें, तकिया
    बताते हैं, मैं ग़ाफ़िल हूँ

    Chhoti bahar men sher kehna rassi pe ek paanv se chalne jaisa hai , jra sa santulan bigda ki gire ,lekin aapne to sarpat daud hi laga dali hai…subhan allah…maza aa gaya…meri duaayen aapke sath hain…likhti rahen.

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