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ग़ज़ल:- शब ढली उतर गया फिर इश्क़ का नशा मिरा-पूजा भाटिया

शब ढली उतर गया फिर इश्क़ का नशा मिरा
क्या हुआ वो देर तक उसी को ढूंढना मिरा

उलझनें तमाम उम्र ज़ात में रहीं मेरे
काश् मेरे हाथ फिर लगे कोई सिरा मिरा

मुझसे वो सुकून मांगता है, ये भी दिन है इक
जो तमाम उम्र ही बना रहा खुदा मिरा

ज़िंदगी जो जी गयी उदासियों से थी भरी
पैरहन भी था ग़मों के थान से सिला मिरा

मर्सिया जो पढ़ सका न लाश पर मेरी, अभी
गा रहा है महफ़िलों में बन के आशना मिरा

सांस लूँ तो यूं लगे कोई गुनाह कर दिया
अब तो कोई फ़ैसला सुना ही दे ख़ुदा मिरा

पूजा भाटिया 08425848550

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5 comments on “ग़ज़ल:- शब ढली उतर गया फिर इश्क़ का नशा मिरा-पूजा भाटिया

  1. Waaah waah

    Kya baat hai Pooja ji. bahut sunder ghazal hui hai.
    Ye she’r bahut khaal lage

    उलझनें तमाम उम्र ज़ात में रहीं मेरे
    काश् मेरे हाथ फिर लगे कोई सिरा मिरा

    मुझसे वो सुकून मांगता है, ये भी दिन है इक
    जो तमाम उम्र ही बना रहा खुदा मिरा

    Bahut bahut mubaraqbaad

  2. उलझनें तमाम उम्र ज़ात में रहीं मेरे
    काश् मेरे हाथ फिर लगे कोई सिरा मिरा

    मुझसे वो सुकून मांगता है, ये भी दिन है इक
    जो तमाम उम्र ही बना रहा खुदा मिरा

    waah waah waah Pooja Ji itne kam arse men aapne jo oochainyan paayin hain wo hairat angez hain…behtareen ashaar kahen hain aapne…meri dili daad kabool karen aur yun hi likhti rahen.

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