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ग़ज़ल:- नदी की लय पे ख़ुद को गा रहा हूँ-स्वप्निल तिवारी ‘आतिश’

ग़ज़ल
नदी की लय पे ख़ुद को गा रहा हूँ
मैं गहरे और गहरे जा रहा हूँ

मैं ख़ुद को ढूँढने निकला था लेकिन
न जाने और क्या क्या पा रहा हूँ

चुरा लो चाँद तुम उस सिम्त छुप कर
मैं शब को इस तरफ़ उलझा रहा हूँ

वो सुर में सुर मिलाना चाहती है
मैं अपनी धुन बदलता जा रहा हूँ

मुझे ये ख़्वाब आया था कि जग कर
मैं अपनी नींद पर पछता रहा हूँ

पड़ा हूँ ज़िन्दगी के जाम में मैं
मज़ा ये है पिघलता जा रहा हूँ

यही अफ़सोस है..यादों को तेरी
मैं ख़ाली हाथ ही लौटा रहा हूँ

जज़ीरे पर अजब सी गूँज है ये
तेरी ही तरह मैं तन्हा रहा हूँ

छिड़कता जा रहा हूँ याद उसकी
शबे-फुरक़त ! तुझे महका रहा हूँ

न जाने ज़िन्दगी है क़र्ज़ किसका
अदा करते हुए घबरा रहा हूँ

यही मौक़ा है ख़ारिज कर दूँ खुद को
मैं अपने आप को दुहरा रहा हूँ

स्वप्निल तिवारी ‘आतिश’ 08879464730

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8 comments on “ग़ज़ल:- नदी की लय पे ख़ुद को गा रहा हूँ-स्वप्निल तिवारी ‘आतिश’

  1. उस्तादाना काम, वाह-वाह, बेटे अब आप फ़ारिग़ुल-इस्लाह हो गए हैं

  2. bemisal ghazal hai dada..waah waah aur waah..sadar pranam
    -Kanha

  3. Umda ghazal hui hai Swapnil bhaai! Waah! Waah!

  4. स्वप्निल बहुत मुश्किल में डाल देते हो भाई , किस शेर का जिक्र करूँ और किसका नहीं। पूरी ग़ज़ल कमाल है लाजवाब है बेमिसाल है। जियो

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