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एक ग़ज़ल दादा तुफ़ैल चतुर्वेदी की नज़्र- स्वप्निल तिवारी

जो इक पत्ता था मेरी ख़ामुशी का
वो आख़िर हो गया बहती नदी का

वहीं बैठी मिली आवाज़ मेरी
जहां तालाब है इक ख़ामुशी का

उजाले से महक उट्ठी हैं आँखें
खिला है फूल कोई रौशनी का

वो तकती ही नहीं है मुड़के वर्ना
बहुत सामान पीछे है नदी का

वहाँ से सरसरी कैसे गुज़रते
वो पूरा शह्र था तेरी हंसी का

ख़ुद इक तन्हाई के जंगल में हैं हम
किसे क़िस्सा सुनाएँ मोगली का

जहां से हम सदायें दे रहे थे
कुआं था वो हमारी तिश्नगी का

तिरी यादों के सय्यारे पे जानां
कोई इम्काँ नहीं है ज़िन्दगी का

लगी है ख़ाब में सीलन की दीमक
करें तो क्या करें आँखें नमी का

पता जब से ख़ुशी का पा गया है
ठिकाना ही नहीं दिल की ख़ुशी का

जलाओ चाँद की वो शम’अ ‘आतिश’
इलाक़ा आ चुका है तीरगी का
-8879464730

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9 comments on “एक ग़ज़ल दादा तुफ़ैल चतुर्वेदी की नज़्र- स्वप्निल तिवारी

  1. वहीं बैठी मिली आवाज़ मेरी
    जहां तालाब है इक ख़ामुशी का

    वो तकती ही नहीं है मुड़के वर्ना
    बहुत सामान पीछे है नदी का

    वहाँ से सरसरी कैसे गुज़रते
    वो पूरा शह्र था तेरी हंसी का

    ख़ुद इक तन्हाई के जंगल में हैं हम
    किसे क़िस्सा सुनाएँ मोगली का

    kya behatreen ghazal hai dada..baar baar padhne ko jee kar raha hai..daad qubule’n..pranam
    -Kanha

  2. वाह्ह वाह्ह्ह वाह्ह . .
    क्या ही उम्दा गज़ल है भैया

    दिली मुबारकबाद

    Regards
    Alok

  3. स्वप्निल क्या ख़ूब अच्छी ग़ज़ल है। बहुत ख़ूब। ढेर सारी दुआयें। आप की शान में एक शेर

    मैं सूरज तक कभी जा ही न पाया
    मेरी ख़ातिर तो बस आतिश है सूरज
    नवीन

  4. जीते रहिये, किसी की ज़मीन में शेर कहे जायें तो ऐसे कहें जायें। मैं इज़्ज़तयाब हुआ. खुश रहिये बहुत खुश रहिये

  5. वो तकती ही नहीं है मुड़के वर्ना
    बहुत सामान पीछे है नदी का

    वाह ! क्या बात है स्वप्निल भाई……

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