8 टिप्पणियाँ

मैं भी गुम माज़ी में था -प्रखर मालवीय कान्हा

मैं भी गुम माज़ी में था
दरिया भी जल्दी में था

एक बला का शोरो-गुल
मेरी ख़ामोशी में था

भर आयीं उसकी आँखें
फिर दरिया कश्ती में था

एक ही मौसम तारी क्यों
दिल की फुलवारी में था ?

सहरा सहरा भटका मैं
वो दिल की बस्ती में था

लम्हा लम्हा ख़ाक हुआ
मैं भी कब जल्दी में था ?

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8 comments on “मैं भी गुम माज़ी में था -प्रखर मालवीय कान्हा

  1. छोटी ज़मीन की बड़ी ग़ज़ल. जियो कान्हा

  2. लम्हा लम्हा ख़ाक हुआ
    मैं भी कब जल्दी में था ?

    वाह ! बहुत खूब…
    बार बार पढने को जी चाहा…

  3. वाह्ह प्रखर वाह्ह्ह

    Alok

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