2 टिप्पणियाँ

बाल-दिवस के मौक़े पर एक ब्रज-गजल – नवीन

एक लाइन में आउते बालक
एक लाइन में जाउते बालक

धूर-मट्टी उड़ाउते बालक
मैल मन कौ मिटाउते बालक

लौट सहरन सूँ आउते बालक
जोत की लौ बचाउते बालक

बन सकतु ऐ नसीब धरती पै
देख पढ़ते-पढाउते बालक

रूस बैठी गरूर की गुम्बद
गुलगुली सूँ मनाउते बालक

किस्न बन कें जसोदा मैया कूँ
ता-ता थैया नचाउते बालक

कितनी टीचर कितेक रिस्तेदार
सब की सब सूँ निभाउते बालक

घर की दुर्गत हजम न कर पाये
हँस कें पत्थर पचाउते बालक

और एक दिन असान्त ह्वे ई गये
सोर कब लौं मचाउते बालक

[भाषा धर्म के अधिकतम निकट रहते हुये भावार्थ-गजल ]

आउते – आते हुये, जाउते – जाते हुये – इस तरह से क्रिया शब्दों को पढ़ने की कृपा करें। अन्तिम शेर के मचाउते को ‘कब तक शोर मचाते’ के अभिप्राय के साथ पढ़ें।

एक लाइन में आउते बालक
एक लाइन में जाउते बालक

धूर-मट्टी उड़ाउते बालक
मैल मन कौ मिटाउते बालक

लौट शहरों से आउते बालक
जोत की लौ बचाउते बालक

बन सके है नसीब धरती पर
देख, पढ़ते-पढाउते बालक

रूठ बैठी गरूर की गुम्बद
गुलगुली से मनाउते बालक

किस्न बन के जसोदा मैया को
ता-ता थैया नचाउते बालक

कितनी टीचर कितेक [कितने सारे] रिस्तेदार
सब की सब से निभाउते बालक

घर की दुर्गत हजम न कर पाये
हँस के पत्थर पचाउते बालक

और एक दिन असान्त हो ही गये
सोर कब तक मचाउते [मचाते] बालक
:- नवीन सी. चतुर्वेदी

+91 9967024593

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About Navin C. Chaturvedi

www.saahityam.org 09967024593 navincchaturvedi@gmail.com http://vensys.in

2 comments on “बाल-दिवस के मौक़े पर एक ब्रज-गजल – नवीन

  1. ब्रजभाषा की ग़ज़ल भी समर्थ गज़ल हो सकती है अगर ऐसे ही समर्पित प्रयास किये जायें –गज़ल का एक फार्मेट है और अद्भुत रूप से इस फार्मेट मे हर भाषा पिरोई जा सकती है !!! “बालक” शब्द को यहाँ मनुष्य की संचेतना मान लीजिये !! एक साधारण मनुष्य –जिसे बन्दिशों मे जीना सिखाया जाता है –कभी बहीला ए मज़हब –कभी बनामे वतन इसी से सभी किस्म के अनुशासन और सभी शहादतों की तवक्को की जाती है !!! तो इसी “बालक” रदीफ को ले कर –जोत की लौ बचाउते बालक और हँस के पत्थर पचाउते बालक जैसे दूरगामी भावार्थों वाले शेर भी कहे गये हैं !! नवीन भाई !! आपके कलम को नमन !! आपके कलाम को नमन !! कोई शक नही जब क्षेत्रीय भाषाओं मे गज़ल लोकप्रिय होगी तो इन प्रयासों को भुलाया नही जा सकेगा !! –मयंक

  2. Kya kahne dada
    Braj bhasha me bhi bahut achhii bhaavibhyakti hai
    Waahh

    Regards
    Alok

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