6 टिप्पणियाँ

कैसी कैसी ख़ूबसूरत कितनी प्यारी मछलियाँ- स्वप्निल तिवारी

कैसी कैसी ख़ूबसूरत कितनी प्यारी मछलियाँ
जाल में पानी के फँस जाती हैं सारी मछलियाँ

शाम होते ही उदासी चल पड़ी चुनने उन्हें
दिन के साहिल पर पड़ी हैं ग़म की मारी मछलियाँ

दिल के दरिया में जो आई शाम चारा फेंकनें
सत्ह पर आने लगीं यादों की सारी मछलियाँ

अश्क गर सूखे तो सारे ख़ाब मारे जायेंगे
सह नहीं पाएंगी इतनी अश्कबारी मछलियाँ

इक जज़ीरा बस वही सारे समंदर में है पर
ताक में बैठी हुई हैं वां शिकारी मछलियाँ

ख़ुश नहीं हूँ पार करके भी तुम्हे मैं जाने क्यूँ
ओ समंदर ! याद आती हैं तुम्हारी मछलियाँ
-स्वप्निल तिवारी
08879464730

Advertisements

About Lafz Admin

Lafzgroup.com

6 comments on “कैसी कैसी ख़ूबसूरत कितनी प्यारी मछलियाँ- स्वप्निल तिवारी

  1. ! गज़ल की रदीफ “”मछलियाँ”” अनेक अर्थ ले कर इस्तेमाल की गई है –यही शाइर की कुव्वते –गोयाई है जो सारी दाद की हकदार है !! मतले मे मछलियाँ –निर्दोष और निष्कलुष भोले लोगों का चित्र खींचती है !! संसार के जाल मे भोले लोग फंस ही जाते है !!! दूसरे शेर मे ज़िन्दगी की जद्दोजहद से उकताये हुये लोगों की उत्पीडित भावनाओं की नुमाइन्दगी मछलियाँ शब्द कर रहा है !!! कमोबेश इसी का डेरिवेटिव तीस्रा शेर भी है !! चौथा शेर अश्क या जज़बात को महफूज़ रखने की पैरवी कर रहा है क्योंकि दिल गया तो रौनके हयात चली जायेगी और गम गया तो सारी काइनात फना हो जायेगी !! वहीं जज़ीरे पर शिकारी मछलियाँ इस भाव को प्रस्तुत कर रही हैं कि –जिन्दगी मे राहत और तस्कीन के पडाव कम है –लेकिन वहाँ चालाक लोग बहुत हैं !!! राजनीति मे दलाल मन्दिर मे पंडे जैसे किरदार यानी शिकारी मछलियाँ हर उस जज़ीरे पर है जहाँ तस्कीन का कोई साहिल है !!! अंतिम शेर यही कह रहा है कि – संसार की रौनक वक्ते रुख़्सत भी याद रह जाती है –हमने भ्वसागर पार तो कर लिया लेकिन दुनिया से जो लगाव था वो अभी भी कम नही हुआ !! –वाह वाह बहुत खूब स्वप्निल वाह !! –मयंक

  2. Bahut achhii gazal huii hai bhaiya
    Is radiif ko bahut hi khoobsoorati se piroya aapne
    Waahh wahh

    Regards
    Alok

  3. आदरणीय स्वप्निल जी,
    प्रणाम |

    आपके विचारों से लफ्ज़ के माध्यम से जुड़ा रहता हूँ. बहुत प्रभावित हूँ आपकी शायरी से |
    ये ग़ज़ल बहुत ख़ास लगी |
    ये जज़्बात बहुत ख़ास लगे ||

    “जाल में पानी के फँस जाती हैं सारी मछलियाँ”

    दिल के दरिया में जो आई शाम चारा फेंकनें
    सत्ह पर आने लगीं यादों की सारी मछलियाँ

    इक जज़ीरा बस वही सारे समंदर में है पर
    ताक में बैठी हुई हैं वां शिकारी मछलियाँ ||

    क्या बात है|

    Nakul Gautam

Your Opinion is counted, please express yourself about this post. If not a registered member, only type your name in the space provided below comment box - do not type ur email id or web address.

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s

%d bloggers like this: