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T-20-तरही महफ़िल का समापन

साहिबो तरही में इस बार शायर हज़रात ने बहुत उम्दा काम किया. कई दोस्तों ने तो ग़ज़ल कई-कई बार दुबारा कही. शुरू में कई साथियो को ज़मीन कठिन लग रही थी मगर बाद में राह आसान लगने लगी. यूँ तो सब ठीक-ठाक रहा मगर कुछ ग़लतियां भी हुईं. बहरहाल मैं बिना शायर का नाम इस्तेमाल किये उन अशआर को एक ग़ज़ल की शक्ल में पोस्ट कर रहा हूँ जो मेरे नज़दीक शिल्प, कहन, ज़बानो-बयान की चुस्ती, नोक-पलक हर तरह से भरपूर हैं. ख़ाकसार की कोशिश है कि अच्छे शेर एक जगह आ जायें. हो सकता है मुझसे कुछ शेर छूट गये हों मगर कोई शेर भर्ती का न रहे इसकी कोशिश की गयी है. तुफ़ैल चतुर्वेदी

वार पर वार है, हर वार संभाले हुए हैं
मोर्चा सरफिरे दो चार संभाले हुए हैं

मानी-ओ-लफ़्ज़ का पिन्दार संभाले हुए हैं
हम ये गिरती हुई दीवार संभाले हुए हैं

मुनहनी जिस्म है कुहसार संभाले हुए हैं
हम भी हर हाल में किरदार संभाले हुए हैं

यादगारे-गुलो-गुलज़ार संभाले हुए हैं
ज़र्द पत्तों का इक अम्बार संभाले हुए हैं

राग दीपक हो के मल्हार संभाले हुए हैं
साज़े-जां तेरा हरिक तार संभाले हुए हैं

मौसमे-हिज्र का हर वार संभाले हुए हैं
हम तिरी याद की बौछार संभाले हुए हैं

रुख़ हवा का भी ख़रीदार संभाले हुए हैं
इश्तिहारों ने ही अख़बार संभाले हुए हैं

एक नोविल हैं कभी पढ़ तू हमें फ़ुर्सत में
तने-तन्हा कई क़िरदार संभाले हुये हैं

हम मुहब्बत के तले काँप रहे हैं ऐसे
जैसे दरकी हुई दीवार संभाले हुये हैं

भेस धरना है हमें दूसरा हर अगले पल
खेल में हम कई किरदार संभाले हुए हैं

उनको मैदान में आने की ज़रूरत ही नहीं
मोर्चा उनके तरफ़दार संभाले हुए हैं

बाद जिसके न कोई जीत हमें जीत सकी
ख़ुद में हम ऐसी भी इक हार संभाले हुए हैं

एक इक करके निकलती गयी हाथों से ज़मीं
मुहतरम लफ़्ज़े-ज़मींदार संभाले हुए हैं

उस तरफ उनपे जो गुज़रेगी वही जानेंगे
मेरे आंसू मुझे इस पार संभाले हुए हैं

आह उस शख्स ने कितनों को सम्हाले रक्खा
आज कांधे पे जिसे चार संभाले हुए हैं

टूट जाए न भरम अक्स के बनते बनते
वो सरे-आइना किरदार संभाले हुए हैं

आज भी इनसे मुहब्बत की महक आती है
हम जो ख़त आपके दो-चार संभाले हुए हैं

आपके नाम सा कुछ जिसमें नज़र आया था
अब तलक हम वही अख़बार संभाले हुए हैं

हम से ही लड़ता-झगड़ता है ये बूढा सा मकां
हम ही गिरती हुई दीवार संभाले हुए हैं

मेरी ख़ामोश तबीयत की मुहाफ़िज़ आँखें
इन दिनों ज़िम्मा-ए-गुफ़तार संभाले हुए हैं

लोग पत्थर लिये हाथों मैं शिकस्ता घर के
यादगारे-दरो-दीवार संभाले हुए हैं

शाख़ पर उनको हरा पत्ता बुरा लगता है
ज़र्द पत्‍तों का जो अंबार संभाले हुए हैं

इश्क़ एक ऐसी अदालत है जिसे जनमों से
उस के अपने ही गुनहगार संभाले हुए हैं

दिल का गाहक न मिला है न मिलेगा मालूम
हम तो बस तुहमते-बाज़ार संभाले हुए हैं

गिर के टूटेगी अभी एक छनाके के साथ
इक हंसी जिसको ये रुख़सार संभाले हुए हैं

इक ख़ज़ाना सा तहे-आब दबा है जानां
दीदा-ए-तर तिरा दीदार संभाले हुए हैं

जाने किस वक़्त ये गिर जाए मकाँ मिट्टी का
हम फ़क़त जिस्म की दीवार संभाले हुए हैं

अम्न के दरिया को मसमूम बनाने का फ़र्ज़
कुछ तो इस पार कुछ उस पार संभाले हुए हैं

अब चुनाव आये तो इस पर ही रखेंगे ऊँगली
एक मुद्दत से हम इनकार संभाले हुए हैं

हम से आलम के अनासिर को फ़राहम है असास
हम वो नुक्‍़ते हैं कि परकार संभाले हुए हैं

कोई वीराना बसाना तो बहुत आसां था
हम तिरे शहर में घर-बार संभाले हुए हैं

क़द्र अब कोई नहीं करता शराफ़त की यहाँ
आजिज़ी हम तुझे बेकार संभाले हुए हैं

शौक़ तो उनका भी है अम्न की बातें करना
हाँ, मगर हाथ में तलवार संभाले हुए हैं

चन्द ख़ैरात के अशआर का मतलब ये नही
आप अब मीर का दरबार संभाले हुए हैं

यह जो आवाज़ों का जमघट है हमारे अन्दर
ख़ुद में हम कितने ही किरदार संभाले हुए हैं

ये न होते तो तरस खाता तू किस पर या रब
तेरी रहमत को गुनहगार संभाले हुए हैं

अश्क मोती हैं, सजावट हैं मिरी आँखों की
आप कहते हैं,”ये बेकार संभाले हुए हैं”

डूबते वक़्त ये हँसते हुए सूरज ने कहा
चाँद तारे मिरा किरदार संभाले हुये हैं

ज़िंदगी इतना हमें पीछे नहीं छोड़ कि हम
भागते-दौड़ते रफ़्तार संभाले हुए हैं

अब न थम पायेगा आहों का ये दरिया हमसे
कब से हम ज़ब्त की दीवार संभाले हुए हैं

बदहवासी में गुज़र जाते कभी के हद से
आबले पांव के रफ़्तार संभाले हुए हैं

ख़ुद को होने न दिया ठीक किसी भी सूरत
अब तलक हम तिरा पिन्दार संभाले हुए हैं

कुछ तिरे लोग भी करते हैं तिरा ज़िक्र बहुत
कुछ तिरी साख को अख़बार संभाले हुए हैं

सूखे पत्तों की तरह कब का बिखर जाता मैं
मेरे बच्चे मिरा पिन्दार संभाले हुए हैं

हाय वो आँखें, वो रुख़सार, वो सीने की उठान
इक बदन में कई तलवार संभाले हुए हैं

रो पड़े लोग लतीफ़े जो सुनाये मैंने
ये भी शायद मिरे आज़ार संभाले हुए हैं

ज़िन्दगी तेरी उदासी की सड़क लम्बी है
और तलवों को मिरे ख़ार संभाले हुए हैं

एक मुद्दत से पलक पर नहीं लगती है पलक
मेरी आँखें शबे-बेदार सम्हाले हुए हैं

आप आवाज़, मिरी साँसों की सुन पाइएगा ?
‘‘आप ज़ंजीर की झंकार संभाले हुए हैं’’

था तो मौक़ा ये क़फ़स तोड़ के उड़ जाने का
‘‘आप जंजीर की झंकार संभाले हुए हैं’’

अब ग़ज़ल चांद-सितारों से परे जा निकली
”आप ज़ंजीर की झंकार सम्हाले हुए हैं”

तोड़ डाला है क़फ़स जोशे-जुनूँ में हम ने
“आप ज़ंजीर की झंकार संभाले हुए हैं”

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5 comments on “T-20-तरही महफ़िल का समापन

  1. तुफै़ल साहब,

    मेरा इरादा भी जयपुर में इसी तरह की ग़ज़ल तैयार करने का था। आपने जो गुलदस्‍ता तैयार किया है, यक़ीनन वो क़ाबिल-ए-दाद है। मुझे बहुत ख़ुशी होती है जब नई पीढ़ी के शा’इरों के ख़ूबसूरत अशआर पढ़ने सुनने को मिलते हैं। आप और लफ़्ज़ नौजवानों की रहनुमाई और हौसला अफ़ज़ाई कर रहे हैं, तारीफ़ के मुस्‍तहक़ हैं।

  2. tarahi mushayre me shamil hone ka kya tareeka he

  3. तरही की इतनी सारी खूबसूरत ग़ज़लों में से चुनिंदा शेर छांटनेका काम ऐसा ही है जैसे लोगों को आज तक खेले गए सभी क्रिकेटर्स में से चुन कर सर्वश्रेष्ठ क्रिकेट टीम बनाने को कहा जाए , हर व्यक्ति अपने हिसाब से खिलाडियों का चुनाव करेगा और ये चुनाव एक सा कभी नहीं हो सकेगा। इसी तरह आपके द्वारा चुने शेर अच्छे हैं लेकिन हमारे द्वारा चुने शेर शायद भिन्न हों। पसंद अपनी अपनी ख्याल अपना अपना। बहरहाल जो सब से अहम बात है वो ये कि इस तरही में लाजवाब ग़ज़लें पढ़ने को मिलीं और ढेरों शेर चौंकाने वाले। इस मामले ये बहुत ही सफल तरही कही जाएगी। सभी शायर दाद के अधिकारी हैं।

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